उर्मिलेश-
हाल में दो “न्यूज चैनलों” के स्टूडियो में हिंसक झड़पें हुईं! ये दोनों घटनाएं अत्यंत निंदनीय हैं. पर ये सब न्यूज चैनल में नहीं होता! ऐसे कथित चैनलों का न्यूज और जर्नलिज्म से कोई रिश्ता नहीं रह गया है. ये मीडिया के मंच नहीं, ‘एकतरफा प्रोपेगेंडा’ के टूलकिट भर हैं! देखते रहिये; आगे और क्या-क्या होता है!
चार दशक से पत्रकारिता कर रहे हम जैसे लोग ऐसे हालात पर दुखी और मायूस ही हो सकते हैं!
अतुल कुमार राय-
कुंभ बीत गया लेकिन अभी तक समझ नहीं आया कि नशे में आईआईटी वाले बाबा हैं या भारत के न्यूज़ चैनल?
टीआरपी की चरस फूँकक़र धर्म का धुआं छोड़ रहे पीत पत्रकारिता के ये पहरेदार अब धीरे-धीरे स्टूडियो को मोहल्ले का वो नाबदान बना चुके हैं। जहां से नाक दबाकर निकलने में ही अपनी भलाई है। लेकिन कब तक?
कल तो ग़जब ही हुआ। एक चर्चित चैनल के न्यूज रूम में एक महिला पत्रकार को एक दूसरी महिला गेस्ट ने चरित्र प्रणाम पत्र देते हुए कहा कि मुझे पता है रे तू दुबई का करने जाती है? क्या बेचती है?
महिला पत्रकार ने भी मिसाइल छोड़ते हुए बोल दिया कि चल-चल बड़ी आई तू, पहले एक वड़ा पाव बेचकर दिखा न…
कसम वड़ा पाव की जब ये वीडियो देखा तो मेरा दिल मिसल पाव की तरह बैठ गया और फिर गांव की उस लछमिनिया फुआ और भागमानो फुआ की याद आ गई, जो झगड़ा कर-करके पूरे गांव का करेक्टर सर्टिफिकेट सबके सामने रख देती हैं।
कल मुझे लगा कि भारत ने तरक्की का सारा पैमाना क्रॉस कर लिया है…जो चीज गांव में है, वही चीज शहर में है।
वही चीज अमरीका में है…ये झगड़ा अगर अगर ट्रम्प और जेलेंस्की देख लेते तो उनको आयुष्मान कॉर्ड बनवाकर मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाना पड़ जाता।
खैर… न्यूज इतना ही है कि इन न्यूज चैनलों से जितना हो सके बच जाइये।
भारत की मीडिया को सोशल मीडिया पूरी तरह लील चुका है। वो दिन दूर नहीं जब बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल एक यू ट्यूब चैनल बनकर रह जाएंगे और कोई एआई से बना पत्रकार मुंह लटकाकर मौसम का हाल बताएगा और जाकर सो जाएगा।
पत्रकार भाइयों से माफी सहित।
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