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न्यूज़18 का रिपोर्टर किस तरह एमपी के ‘घंटा’ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को मक्खन लगा रहा है, देखिए

रिपोर्टर: मैं देख सकता हूँ सर, आप बहुत परेशान हैं। आपने दो दिनों से नींद नहीं ली है।

कैलाश विजयवर्गीय: कौन सो सकता है? उस त्रासदी के बाद मैं देख रहा हूँ कि आपने भी नींद नहीं ली है।

यह पत्रकारिता का स्वर्ण युग है, जहाँ मीडिया और भारत सरकार आपसी मिलीभगत में काम कर रहे हैं।

देखें वीडियो-

https://x.com/zoo_bear/status/2007054195405578462?s=46

https://x.com/manjultoons/status/2007007641726558686?s=46

https://x.com/suryapsingh_ias/status/2006989501097468077?s=46

https://x.com/kanchanyadav000/status/2006967837441880333?s=46

https://x.com/kaankit/status/2006994384659853714?s=46

https://x.com/drnimoyadav/status/2006957689088463047?s=46


दीपक गोस्वामी-

हक़ीक़त यह है कि शब्द विजयवर्गीय के जरूर थे, लेकिन उन शब्दों को आवाज देने वाले मध्य प्रदेश के ही पत्रकार थे या कहूं कि देश भर की पूरी पत्रकार… उप्स सॉरी… ‘पत्तलकार’ बिरादरी।

जो ज्यादातर #पत्रकार इस घटना की निंदा कर रहे हैं (या कहूं कि निंदा करने का दिखावा कर रहे हैं), उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।

जब एक पत्रकार किसी नेता के साथ फोटो खिंचवाना अपनी शान और उपलब्धि समझता है, जब एक पत्रकार अपनी किताब का विमोचन एक नेता से करवाता है, जब एक पत्रकार नेता के साथ मंच साझा करने को सम्मान मानता है, तब एक नेता ख़ुद को खुदा समझता है और पत्रकार उसकी नजर में होता है एक भाड़े का टट्टू, जो ‘जी भाईसाहब, जी भाईसाहब…’ करते हुए नेताओं की दलाली खाकर उनकी नमकहलाली करता है।

पत्रकारों ने बार-बार अपनी हरकतों से ये साबित भी किया है। पत्रकार को नेता झुकने बोलें तो वह लेट जाता है। जब नेता जी के घर से शादी का कार्ड आ जाता है तो पत्रकार फूला नहीं समाता। उसे लगता है कि उसकी पत्रकारिता सफल हुई।

अनुराग भैया से बदतमीजी की गई, वो साहसी थे तो इसका जवाब मौक़े पर ही दे दिया, लेकिन ज्यादातर पत्रकार डब्बू बनकर रह जाते हैं।

वो दिन दूर नहीं जब ये नेता और उनके समर्थक पत्रकारों को पीटा करेंगे, लेकिन तुम पत्रकार लोग अपने लक्ष्य पर डटे रहना। और लक्ष्य यह है कि अपनी किताबों का विमोचन नेता जी से कराना, संसद और विधानसभा में नेताजी दिख जायें तो भाईसाहब कहकर उनके साथ एक फोटो भी खिंचवा लेना, फिर उस फोटो को इस तरह सोशल मीडिया पर पोस्ट करना कि मानो आपकी पत्रकारिता को पुलित्जर अवार्ड मिल गया हो।

वास्तव में ये #पत्रकारिता नहीं, ‘पत्तलकारिता’ है और ये पत्रकार नहीं, ‘पत्तलकार’ हैं। दुमछल्ले बनकर नेताओं के आगे-पीछे घूमने वाले कई पत्तलकारों के पोस्ट मैंने इस घटना पर देखे। उनके नाम नहीं लूंगा लेकिन नेताओं के साथ फोटो डालना, उनसे अपनी किताबों का विमोचन कराना, उनके साथ मंच साझा करना ये सब मैं उनकी सोशल मीडिया फ़ीड पर देख चुका हूं।

आज ये इस घटना की निंदा कर रहे हैं, कुछ दिन बाद विजयवर्गीय मीडिया में अगर गिफ्ट बांटने लगे तो सारे के सारे दुमछल्ले गिफ्ट बटोरने के लिए एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे।

यही वो पत्रकार हैं जिनके चलते नेता ख़ुद को उनका खुदा मानता है। उसे लगता है कि हर पत्रकार ‘पत्तलकार’ होता है। इसी ग़लतफ़हमी में वह गधे और घोड़े में फ़र्क़ नहीं कर पाता और सबको एक जैसे हांकने लगता है। इन्हीं पत्तलकारों की हरकतों का ख़ामियाज़ा अनुराग द्वारी जैसे पत्रकारों और पत्रकारिता को भुगतना पड़ता है।

पत्रकारिता की रेस में ज्यादातर गधे दौड़ रहे हैं और एक नेता के लिए पत्रकारिता की पहचान यही गधे होते हैं, फिर उसका पाला घोड़े से पड़ता है तब उसे समझ आता है कि असली पत्रकार क्या होता है।

अनुराग भैया वही घोड़े हैं, जिस पर सवार होने की कोशिश में ‘विजय’वर्गीय अपनी इज्जत हार गए हैं।

अनुराग भैया ने जिस तरह विजयवर्गीय को लताड़ा, उसके बाद मेरे मन में उनके प्रति और अधिक सम्मान बढ़ गया।

salute to this man


इंदौर में पानी नहीं, ज़हर बंटा और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में रहा।

घर-घर मातम है, गरीब बेबस हैं – और ऊपर से BJP नेताओं के अहंकारी बयान। जिनके घरों में चूल्हा बुझा है, उन्हें सांत्वना चाहिए थी; सरकार ने घमंड परोस दिया।

लोगों ने बार-बार गंदे, बदबूदार पानी की शिकायत की – फिर भी सुनवाई क्यों नहीं हुई?

सीवर पीने के पानी में कैसे मिला?
समय रहते सप्लाई बंद क्यों नहीं हुई?
जिम्मेदार अफसरों और नेताओं पर कार्रवाई कब होगी?

ये ‘फोकट’ सवाल नहीं – ये जवाबदेही की मांग है। साफ पानी एहसान नहीं, जीवन का अधिकार है। और इस अधिकार की हत्या के लिए BJP का डबल इंजन, उसका लापरवाह प्रशासन और संवेदनहीन नेतृत्व पूरी तरह ज़िम्मेदार है।

मध्यप्रदेश अब कुप्रशासन का एपिसेंटर बन चुका है – कहीं खांसी की सिरप से मौतें, कहीं सरकारी अस्पताल में बच्चों की जान लेने वाले चूहे, और अब सीवर मिला पानी पीकर मौतें। और जब-जब गरीब मरते हैं, मोदी जी हमेशा की तरह खामोश रहते हैं।

-राहुल गांधी


पत्रकार अनुराग द्वारी ने इंदौर में दूषित पानी पीने से कई गरीब लोगों की हुई मौत के हवाले मुआवजे को लेकर भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से
कुछ सवाल किया. मंत्री ने जवाब देने की बजाय बदजुबानी की.अनुराग ने विजयवर्गीय की बदजुबानी का कड़ा प्रतिकार किया. हर पत्रकार को ऐसा ही करना चाहिए.
पर आज के दौर में ऐसा नहीं होता इसलिए यह प्रकरण ‘बड़ी खबर’ बन गया! किसी मंत्री या जिम्मेदारी के पद पर बैठे किसी भी पदाधिकारी द्वारा ऐसी बदजुबानी और दबंगई दिखाने पर अगर आज के ज्यादातर पत्रकार अनुराग द्वारी जैसा प्रतिकार नहीं करते तो मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि वे ‘पत्रकारिता की नौकरी’ भले कर रहे हों पर वे पत्रकार नहीं होते!
—और हां, इस घटना से एक और बहुत दिलचस्प बात सामने आ गई. इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता रहा है. इसके लिए शहर के प्रशासन को बाकायदा सम्मानित किया जाता है. जहां तक याद है, पिछले साल(2025) में भी इंदौर ही ‘सबसे स्वच्छ शहर’ घोषित हुआ था. अपने नागरिकों को स्वच्छ पेय जल उपलब्ध कराये बगैर कोई शहर ‘सबसे स्वच्छ शहर’ कैसे बन जाता है! निश्चय ही अनुराग और विजयवर्गीय संवाद-प्रतिवाद प्रकरण के राष्ट्रीय फलक पर आ जाने के बाद अब ‘सबसे स्वच्छ शहर-इंदौर’ का मिथक भी टूट गया!

-उर्मिलेश


मैंने कल रात को ही लिख दिया था कि भजपैया कैलाश विजयवर्गीय को मा’फ़ी मांगनी पड़ेगी..कैलाश ने मा’फ़ी मांग ली है..लवडेन भोजयम

कैलाश ने अदाणी के रिपोर्टर के साथ बदतमीज़ी की थी..अदाणी कभी भी यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि कोई भी भजपैया NDTV पर बदतमीज़ी करे..ईगो की बात है..

जिस अदाणी के एक इशारे पर मोदी काम करता है उस अदाणी के सामने कैलाश या किसी भी भजपैया की क्या औक़ात है?

अगर कैलाश ने मा’फ़ी नहीं मांगी होती तो शायद मंत्री का ‘ओहदा नहीं रहता..पार्टी में भी साइड कर दिया जाना मुमकिन था..

कैलाश ने और किस किस से मा’फ़ी मांगी होगी या किस ने कैलाश को मा’फ़ी मांगने पर मजबूर किया इस बात का सिर्फ़ अंदाजा लगाया जा सकता है..समझे

कैलाश ने पूरी ज़िंदगी बीजेपी को दे दी..मगर आज अदाणी के रिपोर्टर के सामने झुकना पड़ा..कैलाश ने दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखा होगा

इस वक़्त पूरे भारत में सिर्फ़ राहुल गांधी हैं जो अदाणी, अंबानी और भ्रष्ट उद्योगपतियों को बेख़ौफ़ खुली चुनौती देते हैं..

अदाणी के ख़िलाफ़ बोलने पर राहुल गांधी की सांसदी, घर छीन लिया गया था..मगर राहुल गांधी नहीं झुके..ये याद रखा जाएगा..

राहुल गांधी भ्रष्टाचार, भारत लूट के ख़िलाफ़ हैं..राहुल गांधी 140 करोड़ भारतीयों की आवाज़ हैं..”एयरपोर्ट तुम्हारा और चंदा हमारा” वाली स्कीम के ख़िलाफ़ हैं..

भजपैया भ्रष्ट उद्योगपतियों के सामने नतमस्तक हैं..राहुल गांधी देश की ‘अवाम के सामने नतमस्तक हैं..राहुल गांधी देश के लिए सर उठा कर बोलते हैं..राहुल गांधी की लड़ाई में हमारा हर क़दम उन के साथ रहेगा..जय हिंद..

-कृष्णन अय्यर


अनुराग द्वारी ने मंत्री को उचित नसीहत दी। आम जन के साथ पत्रकार-जगत का ख़ुश होना वाजिब है।

लेकिन पत्रकार अक्सर ख़ुश तो हो लेते हैं, बोलते नहीं हैं। कितने पत्रकारों ने नेताओं — वे किसी भी दल के हों — के श्रीमुख से गाली या अशिष्ट शब्द झड़ने पर टोका या लिखा-बोला? तुरता प्रतिक्रिया ज़ाहिर की?

और तो और, द्वारी के चैनल ने अपने ही पत्रकार (कार्यकारी संपादक) की दो टूक प्रतिक्रिया को जगह-जगह इतना ब्लीप कर दिया कि दूसरे चैनल टटोलने पड़े।

केवल ताली बजाने से गाली को लगाम कैसे लगेगी।

चैनलों या अख़बारों में साहस हो तो पत्रकार भी जहाँ बोलना हो, बोलेंगे। साहसिक द्वारी का प्रसंग अपवाद समझिए।

-ओम थानवी

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