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बिहार

नीतीश के बेटे का उपमुख्यमंत्री बनना परिवारवाद नहीं, राजनीति के क्षेत्र में अधिग्रहण की शुरुआत है!

अजय प्रकाश-

20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद से बेदखली की गयी है, जिसके मुआवजे के तौर पर बेटे निशांत के लिए उपमुख्यमंत्री पद दिए जाने की बात हो रही है और उनको दिल्ली पलायन करना पड़ रहा है। इस घटना को परिवारवाद कहना बदल चुकी राजनीति को नहीं समझ पाने जैसा है। परिवारवाद राजनीति की वह प्रक्रिया है जिसमें पिता अपनी राजनीतिक ताकत को अपने बेटे—बेटियों में बांटता है, वह किसी डिक्टेशन से संचालित नहीं होता और न ही वह किसी बेचारगी में होता है। सत्ता हस्तांतरण को तय वह परिवार करता है जिसका लायक—नालायक बेटा राजनीतिक सल्तनत संभालता है। पर यहां ऐसा हो नहीं रहा है, यहां दिया जा रहा है और लगभग हालत यह है यह ले लो, इसी में भलाई है।

ऐसे में बिहार में जो हो रहा है उसे समझने के लिए आप जमीन अधिग्रहण में क्या होता है उसे याद कीजिए!

आज से तीन दशक पहले जब प्राधिकरण या सरकार जमीन अधिगृहित करती थी तो वह किसानों को बदले में मुआवजा देती थी। सिर्फ मुआवजा। फिर किसान होशियार हो गए तो मुआवजे के साथ उनको जमीन का थोड़ा टुकड़ा, उनके बच्चों को फैक्ट्रियों में रोजगार आदि भी मिलने लगा या वादे किए जाने लगे। जाहिर है किसानी उजड़ने के बाद उनमें से ज्यादातर उजड़ते गए और बहुतेरे आबाद भी हुए, लेकिन इसमें बड़ी बात क्या थी। बड़ी बात यह थी कि जमीन उनकी बिकेगी, क्यों बिकेगी, किसको बिकेगी, उनको बेचना ही क्यों है, वह नहीं बेचें तो क्या होगा और बेच दिया तो उनको उतना ही क्यों मिलेगा जितना सरकारा या कॉरपोरेट चाहते हैं आदि सवालों करने का उनको कोई अधिकार नहीं था और न आज भी है। यानी उनकी जमीन की संपत्ति के बदले जो कैश की संपत्ति मिली उसे ही अपना विकास माना, भाग्य माना और उसी रास्ते आगे बढ़ गए।

ठीक उसी तरह अब राजनीति में पार्टियों का अधिग्रहण शुरू हो गया है। राजनीति में अब कॉरपोरेट पूरी तरह से काबिज हो गए हैं। यह बिल्कुल कंपनी के तरह संचालित होते हैं। यहां कोई छोटा है और कोई बड़ा, लेकिन ध्यान—ढर्रा सबका एक ही है। सबको हर कीमत पर सफल होना है। कोई राज्य के स्तर राजनीतिक कॉरपोरेट है तो कोई राष्ट्रीय स्तर पर है या बनने की छटपटा रहा है। ऐसे में पिछले एक दशक के भीतर भाजपा सबसे बड़ी टर्नओवर वाली पार्टी बनकर उभरी है। उसने सबसे पहला अधिग्रहण जदयू का कर लिया है। कॉरपोरेट परंपरा के अनुसार उसके कर्मचारी निकाले नहीं जाएंगे, लेकिन उन शर्तों और तरीकों को मानेंगे जैसा राजनीति का सबसे बड़ा कॉरपोरेट चाहता है। अभी जदयू के शेयर भी रखे जाएंगे, लेकिन आने वाले समय में सब बड़ी पार्टी में समाहित हो जाएंगे।

इसलिए मौजूदा राजनीतिक प्रकिया को परिवारवाद कहने वाले लोग ‘राजनीतिक एल्गोरिदम’ के शिकार हैं और वह बदल रही भारतीय राजनीति को उन्हीं पुरानी शब्दावलियों में समझने-समझाने के अभ्यस्त हैं, जबकि हकीकत का धरातल बदल चुका है। वह परिस्थितियां नहीं बची हैं कि विश्लेषण के पुराने ढर्रे पर आप कोई सुसंगत राजनीतिक धारणा देश को दे पाएं।

ध्यान रहे कि उत्तर भारत में परिवारवाद की आखिरी घटनाएं दशक—डेढ़ भर पहले हुईं जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, चिराग पासवान जैसे लोग आए, जो अब बिल्कुल बंद हो चुकी है। पिछले 10 वर्षों में मामूली लोगों को खूब मुख्यमंत्री बनाया गया है जिसकी उम्मीद भारतीय राजनीति में कोई नहीं कर सकता था। उससे पहले के जो भी मुख्यमंत्री बने उन्होंने देश की राजनीति को प्रभावित किया, पर मौजूदा काल के मुख्यमंत्री अपना मंत्री तक नहीं तय कर पाते हैं, जो कॉरपोरेट मुखिया कहते हैं, उसको अगले दिन बिठा दिया जाता है।

क्या इसमें कोई बहस बची है कि जो मामूली लोग मुख्यमंत्री बनाए गए उनको प्यादे की तरह रखा गया और जिनका मुख्यमंत्री पद पर बैठकर कोई स्वतंत्र रुतबा नहीं बन पाया। इस बीच विधायक—सांसद लगभग किसी कॉरपोरेट के कर्मचारी की तरह बर्ताव करते रहे और दूसरे कॉरपोरेट पार्टियों को नुकसान पहुंचाने के लिए अनैतिकता के घृणिततम तरीकों का इस्तेमाल करते रहे, जो कॉरपोरेट कल्चर में दशकों से आम बात रही है। जैसे कुछ कॉरपोरेट देश में तेल बेचते हैं, कुछ हवाई जहाज चलाते हैं, कुछ हथियार बेचेते हैं, कुछ अस्पताल चलाते हैं, कुछ स्कूल चलाते हैं, कुछ सड़क बनाते हैं, कुछ बिजली बनाते हैं, कुछ संचार—इंटरनेट चलाते हैं, कुल रेल चलाते हैं, कुछ सिक्योरिटी के धंधे में हैं वैसे अब कुछ कॉरपोरेट देश में पार्टियां चलाते हैं।

असल में इसकी शुरुआत उस समय से ही हो गयी थी ​जब पार्टियों में जमीनी नेताओं को पिछली कतार मिलने गली। यह परिवर्तन 90 के दशक में शुरू हो गया जब हमारे देश में निजीकरण को स्वर्गलोक की तरह परोसा जाने लगा और हमारे नेतृत्कर्ताओं ने मान लिया कि विकसीत भारत की कृपा निजीकरण के ही गुरुमंत्र में ही अटकी हुई है। निजीकरण को हमने विकास के नए अवसर की जगह विकास के मूल विकल्प के रूप में ​गढ़ दिया। फिर क्या था राजनीति में रणनीति टेक्टनोक्रेट या कॉरपोरेट दुकानों से बेरोजगार हुए या अनफिट हुए लोग बनाने लगे और आंदोलनों से निकले युवा उनको मुंह बा कर सुनने लगे।

अब हम 30-35 साल बाद उसका साफ और स्पष्ट असर देख रहे हैं। अब उसे सिर्फ आप-हम होते हुए देख सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते। ठीक उस किसान की ही तरह जैसे सरकार और कॉरपोरेट के चाहने पर जमीन से बेदखल होना ही उसका आखिरी विकल्प होता है। बेदखली, उजड़ना और अपनी मिट्टी से दूर होना उसकी नियती और ​अधिगृहित होना उसकी राजनीतिक गति। उसी गति को फिलहाल नीतीश कुमार और उनकी पार्टी प्राप्त होते हुए दिख रही है। यह प्रक्रिया आगे भी अन्य दलों के साथ जारी रहेगी, आप समय का चक्र देखते रहिए। सबका मालिक एक होगा!

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