
संजय कुमार सिंह
“पुलवामा हमले का खुलासा न होने, शेर-ए-कश्मीर मेडल से सम्मानित डीएसपी दविन्दर सिंह के आतंकियों के साथ पकड़े जाने, बाला कोट में 300 आतंकियों के मारे जाने, कश्मीर चुनाव से पहले आतंकवाद खत्म कर दिये जाने के दावे के बाद 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम हमला निश्चित रूप से चौंकाने वाला था। उसके बाद जो सब हुआ उसमें कुछ भी इस आश्चर्य को कम करने वाला नहीं रहा। ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर भारत सरकार का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ देना, उसे लक्षित हमला कहना और पाकिस्तान से इसे न बढ़ाने के लिए कहा जाना फिर भी पाकिस्तान के हमले से जम्मू में जान-माल का भारी नुकसान होना, उसे स्वीकार नहीं करने (या महत्व नहीं देने) का दिखावा और हाव-भाव तथा अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणा के बाद युद्ध विराम होना कम संदिग्ध नहीं था। पर बात इतनी ही नहीं थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने युद्ध विराम करवाया और भारत सरकार ने ना तो इसका खंडन किया ना इसपर टिप्पणी की। प्रधानमंत्री ने एक बार अमेरिका का निमंत्रण ठुकराने का दावा जरूर किया पर प्रतिनिधिमंडल तो गया ही। इन तमाम बातों के बावजूद संसद में ऑपरेशन सिन्दूर पर जो चर्चा हुई उसमें युद्ध छेड़ने और उसे अचानक खत्म करने का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। जो कारण बताया गया वह युद्ध छेड़ने के मकसद और इरादे को ही गंभीर बनाता है। खासकर इन आरोपों के मद्देनजर कि इस युद्ध में पाकिस्तान को चीन का साथ मिला। चीन के उपकरणों का परीक्षण हुआ। इस स्थिति में अमेरिकी राष्ट्रपति का बार-बार यह दावा कि युद्धविराम उन्होंने कराया, मायने रखता है। ऐसे में राहुल गांधी की चुनौती गंभीर थी और नाम लेकर कह दिया जाता तो बहुत सारी आशंकाएं खत्म हो जातीं।
ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे, सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की चुनौती को ‘धूर्तता’ कहा गया और श्रीनगर, कश्मीर के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेंहदी को बोलने नहीं दिया गया। वे कश्मीर के लोगों का दर्द बता रहे थे। देश को दिखा रहे थे। तभी किसी माननीय ने कहा कि गलत क्या है और फिर उन्हें रोक दिया गया…कन्क्लूड भी नहीं करने दिया गया। ….जम्हुरियत का ढोंग क्यों? संसद में उनके आखिरी शब्द थे। क्विन्ट हिन्दी ने एक्स पर लिखा है, लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेकेएनसी) के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान से पहले सरकार ने कश्मीरियों को निशाना बनाया। मेहदी ने दावा किया कि इस हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने करीब 2,000 कश्मीरी युवाओं को गिरफ्तार किया, और सिर्फ संदेह के आधार पर कश्मीर में 12 घरों में विस्फोट किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि देश के कई राज्यों में कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों पर 11 से अधिक हमले हुए हैं। उन्होंने संसद में सवाल उठाया कि ये गिरफ्तारियां और कार्रवाई किस कानून के तहत की गई हैं। पहलगाम हमले के जवाब में ऑपरेशन सिन्दूर और उसके तहत की गई कार्रवाई पर यह आरोप पर्याप्त गंभीर है लेकिन संसद में एक सांसद को इस पर बोलने नहीं दिया गया। भाजपा के सत्ता में रहते हुए पार्टी के एक सांसद दूसरे दल के सांसद को खुलेआम गालियां देकर जलील कर चुके हैं। लोकसभा अध्यक्ष कह चुके हैं, “माननीय प्रतिपक्ष के नेता अपने सदस्यों को समझाइए कि जनता ने पर्चियां फेंकने और तख्तियां लाने के लिए नहीं भेजा है।”
तब एक सांसद को अपना, अपने इलाके के लोगों का दर्द बताते हुए कहा गया, इसमे गलत क्या है। वे जवाब देने में उलझ गये और अपनी बात पूरी नहीं कर पाये। इस व्यवस्था में उनके आरोपों के जवाब की उम्मीद तो नहीं ही थी आज यह खबर भी पहले पन्ने पर नहीं है। वह भी तब जब उन्होंने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर कश्मीरियों को परेशान करने का गंभीर आरोप लगाया था और यह 370 हटाने के बाद राज्य और वहां के निवासियों के प्रति सरकार के रुख का वर्णन करता है। वैसे भी, टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज अमित शाह को यह कहते हुए लिखा है, अनुच्छेद 370 को खत्म किये जाने से जम्मू-कश्मीर में आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो गया है। अब आतंकवादियों को पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर भेजा जाता है क्योंकि कश्मीर में कोई स्थानीय आतंकवादी नहीं है। इसके बावजूद पहलगाम के आतंकियों का पता लगाने के लिए 2,000 कश्मीरी युवाओं को गिरफ्तार करने और 11 घरों को विस्फोट से उड़ाने का आरोप है। कोई जवाब नहीं है। ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा में राहुल गांधी की चुनौती का भी जवाब अपेक्षित था लेकिन जो जवाब है वह सरकार का दावा है, डोनल्ड ट्रम्प जो कर रहे हैं उसपर टिप्पणी या उनके किये का जवाब नहीं है। उन्होंने कहा और आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, दुनिया के किसी नेता ने ऑपरेशन सिन्दूर को रोकने के लिए नहीं कहा। इसीलिये सवाल है कि रोका क्यों गया और ट्रम्प यह दावा क्यों कर रहे हैं। पर जो जवाब दिया गया वह और लचर है। ‘पाकिस्तान गिड़गिड़ाने लगा’ – क्या उससे यह कहने कि उम्मीद की गई थी कि तुम्हारे गिराये बम नहीं फटे या हमला बेअसर रहा आओ, फिर आओ कुछ बिगाड़ नहीं सकोगे। सरकार से यह सब पूछने की बजाय अखबार बता रहे हैं और अमर उजाला का उपशीर्षक है – कांग्रेस पर तीखा हमला, वह पाकिस्तान की भाषा बोल रही…. मुद्दों के लिए वह पड़ोसी देश पर निर्भर। मुझे लगता है कि यह बेहद गैर जिम्मेदार पत्रकारिता है और हिन्दुत्व या सरकार की भक्ति में है तो देशहित में इस भक्ति को खत्म करने के लिए डीऐक्शन (नशामुक्ति) की कार्रवाई जरूरी है। वरना भाजपा को चुनाव से नहीं हराया जा सकेगा और यह बिहार के एसआईआर तथा उसपर सुप्रीम कोर्ट के रुख से भी लग रहा है।
मुझे लगता है कि पहले से ही संदिग्ध और आश्चर्यजनक पुलवामा हमले के बाद की सरकारी कार्रवाई देशहित में तो नहीं ही थी सरकार की राजनीति और छवि बनाने की कार्रवाई थी जो बाद के पोस्टर और बैनर से भी स्पष्ट था। राहुल गांधी ने कहा भी कि सेना का उपयोग इन कामों के लिए नहीं किया जाना चाहिये पर अखबारों में वह मुद्दा लगभग नहीं है। वह भी तब जब 22 अप्रैल को हुए हमले की तारीख केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संसद में गलत बोल गये और कल ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा के दौरान उन आतंकियों के मारे जाने की सूचना संसद में दी। इस पूरी कहानी में कई झोल हैं और सबसे बड़ा यही कि हमलावर वारदात के तीन महीने बाद उस दिन मारे गये जिसकी घोषणा संसद में चर्चा के दौरान ही की जा सकी। पहले पुष्टि नहीं हुई और खास समय पर घोषणा के लिए बरामद हथियार जब्त करके, उसे चंडीगढ़ भेजकर रिपोर्ट प्राप्त कर ली गई कि हमलावर वही थे। इसमें दिलचस्प यह भी है कि संसद में चर्चा के दिन और सावन के सोमवार को कामयाबी मिलने वाले अभियान का नाम ऑपरेशन महादेव था और शुरुआती खबरों में मारे गये आतंकियों के पहलगाम हमलावर होने की शंका की पुष्टि नहीं हुई थी फिर भी कई अखबारों ने पहले ही उनके मारे जाने की खबर छाप दी थी और पहचान की पुष्टि जिस आधार पर हुई है वह सब पहले नहीं बताया गया था और उनसे मिलान की कोई संभावना नहीं है। विकसित और अमृतकाल के भारत में ही नहीं, पहले भी होता रहा है कि किसी को मार कर कोई और बता दिया। यहां तक कि आम लोग भी किसी को जलाकर खुद मरने की घोषणा कर चुके हैं ताकि बीमा के पैसों पर ऐश कर सकें। अफसोस यह है कि यह सब संसद में दी गई सूचना में मुमकिन होता लग रहा है।
आइये अब देखें कि इन तथ्यों के आलोक में किस अखबार ने किस खबर को कितना महत्व दिया है और किसने कौन सी खबर पहले पन्ने पर रखी या नहीं रखी है। कहने की जरूरत नहीं है कि सभी अखबारों की सभी खबरों की चर्चा नहीं हो सकती है इसलिए मैं खास बातों की ही जिक्र करूंगा और किसी अखबार में किसी खबर के होने की चर्चा नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि वह उसमें नहीं है। बल्कि मैं जो है वही बताउंगा और जो नहीं है वह नाम के साथ बताउंगा कि इसमें नहीं है। जिसका नाम नहीं है उसे आप स्वंय देखें या उसके बारे में इस टिप्पणी के भरोसे न रहें।
1. अमर उजाला
लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं इसलिए सबसे पहले उसी की चर्चा कर लूं। लीड के ऊपर आठ कॉलम की खबर का शीर्षक है, “पहलगाम हमले को अंजाम देने वाले तीनों पाकिस्तानी आतंकियों को मिट्टी में मिलाया : शाह”। इसमें बताया गया है, 22 अप्रैल को हमला हुआ, 23 को सुरक्षा बैठक हुई, (एक महीने बाद) 22 मई को खुफिया ब्यूरो को आतंकियों के होने की सूचना मिली (फिर ठीक एक महीने बाद) 22 जुलाई को मौजूदगी की पुष्टि हुई। सुरक्षा बलों ने घेर लिया और उन्हें 26-27 की रात मारा गया, 28 को खबर छपी, 29 को लोकसभा में पुष्टि की गई। मुझे इस टाइम लाइन के सामान्य होने पर शक है पर वह अलग मुद्दा है। गृहमंत्री से ब्लास्ट कर उड़ाये गये घरों और उनसे संबंध के बारे में तो पूछा ही जाना चाहिये। जो 2000 युवा गिरफ्तार किये गये हैं उनमें कितनों की भागीदारी सुनिश्चित हुई, बाकियों के खिलाफ सभी मुकदमे क्या तुरंत प्रभाव से वापस नहीं लिये जाने चाहिये। जब सांसद को बोलने नहीं दिया गया तो यह मांग मीडिया को करनी चाहिये। आप देखिये कि आपके अखबार ने ऐसा कुछ किया है क्या।
2. नवोदय टाइम्स
ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो टूक (फ्लैग शीर्षक के बाद मुख्य शीर्षक इस प्रकार है) न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग नहीं चलेगी। यहां भी यह बुलेट प्वाइट के रूप में हाईलाइट किया गया है 1) हमें दुनिया से समर्थन मिला लेकिन कांग्रेस का नहीं। आप जानते हैं और कांग्रेस की ओर से कई बार कहा गया है कि पूरे देश ने सरकार और प्रधानमंत्री की कार्रवाई का पूरा समर्थन किया। सवाल युद्धविराम पर है प्रधानमंत्री उसकी जलेबी बना रहे हैं और मीडिया उसे भाव दे रहा है। उल्टे कांग्रेस पर आरोप बेहद गैर जिम्मेदाराना है। 2) दुनिया में किसी नेता ने नहीं कहा ऑपरेशन रोकने को। ऐसा किसी ने कहा भी नहीं है। सवाल तो युद्धविराम पर है और उससे भी ज्यादा उसकी घोषणा ट्रम्प के करने पर और फिर बार-बार दोहराने पर लेकिन यहां भी जलेबी बन रही है। इस लीड के साथ सिंगल कॉलम में राहुल गांधी की चुनौती है, “हिम्मत है तो बोलें कि ट्रम्प का बयान असत्य है : राहुल”। यह सवाल सिंगल कॉलम में तब ठीक होता जब प्रधानमंत्री का भाषण बाकी होता या उन्होंने ऐसा कह दिया होता। जब प्रधानमंत्री ने नाम नहीं लिया तो चुनौती गंभीर है और भले हिन्दी के एक गुरु संपादक ने उसे धूर्तता कहा है, मैं सहमत नहीं हूं। जहां तक न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग नहीं चलेगी जैसी घोषणा की बात है, मुझे लगता है कि यह काला धन खत्म करने के लिए नोटबंदी, विदेशी नागरिकों की कथित पहचान और लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए घुसपैठिया जैसा मामला है। आप पाकिस्तान के परमाणु सक्षम होने से नहीं डरते तो टारगेटेड अटैक की बात क्यों करते और जम्मू में उसके हमले से नुकसान के बावजूद युद्धविराम क्यों करते और कर ही दिया तो पाकिस्तान के डीजीएमओ ने गुहार लगाई थी (आगे देशबन्धु की खबर) जैसी बात क्यों करते?
3. देशबन्धु
चार कॉलम में प्रधानमंत्री और इतने में ही राहुल गांधी का बयान है। शीर्षक वही है, दुनिया के किसी नेता ने जंग नहीं रुकवाई। उपशीर्षक है – प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, पाकिस्तान के डीजीएमओ ने गुहार लगाई थी। इसपर मैं अपनी टिप्पणी पहले लिख चुका हूं यहां दो बुलेट प्वाइंट हाईलाइट किये गये हैं। पहला है, भारत का हर जवाब पहले से तगड़ा होता है दूसरा, पाकिस्तान आज इस बात को भलीभांति जान गया है। हाईलाइट किया गया तीसरा मुद्दा है, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत ने ऐसा प्रचंड प्रहार किया, जिसकी पाकिस्तान की कल्पना भी नहीं की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह प्रधानमंत्री का दावा है और उसपर कुछ कहना व्यर्थ है। सच यही है कि पाकिस्तान की तबाही भारतीय मीडिया नहीं दिखा पाया और भारत सरकार ने तमाम पाकिस्तानी यूट्यूब चैनल बंद कर दिये थे। अगर पाकिस्तान की तबाही दिख रही होती तो ऐसा कौन करता और बंद करने का कारण समझना मुश्किल नहीं है। इसमें भारत के विमान गिराये जाने की सूचनाएं और उनकी पुष्टि या खंडन नहीं करने का मामला शामिल है। और मामला इतना ही नहीं है, निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया है (टाइम्स ऑफ इंडिया, अधपन्ने का पिछला हिस्सा) 1965 में 45 और 1971 में 71 विमान नष्ट हुए थे। ठीक है कि दुबे जी 2025 में 1965 याद कर रहे हैं पर इसीलिये कर पा रहे हैं कि तब बता दिया गया था और स्वीकार किया गया था। अब क्यों नहीं किया जा रहा है और आप बचाव क्यों कर रहे हैं। राहुल गांधी ने तो कहा ही है कि यह पूरा हमला प्रधानमंत्री छवि बनाने के लिए था और देश के लिए हुआ होता तो नुकसान बताने में दिक्कत नहीं होती जैसे 1965 या 1971 में हुआ। अब आरटीआई के बावजूद नहीं बताया जा रहा है तो कारण समझना मुश्किल नहीं है आप समर्थन क्यों कर रहे हैं यह भी बताना चाहिये।
4. हिन्दुस्तान टाइम्स
चार कॉलम में प्रधानमंत्री और चार में गृहमंत्री अमित शाह। राहुल गांधी की चुनौती वाली खबर नहीं होती तो मैं यही कहता कि हद कर दी। राहुल गांधी की फोटो के साथ उनकी चुनौती तीन कॉलम में है। लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान की परमाणु धमकी नाकाम, किसी नेता ने हमें नहीं रोका : प्रधानमंत्री। यह शीर्षक प्रधानमंत्री के भाषण जैसा ही लचर है और भाषण में कुछ नहीं होगा तो शीर्षक अच्छा कैसे बने। आगे के शीर्षक से पता चलेगा कि हिन्दुस्तान टाइम्स चूक गया या वाकई भाषण ऐसा ही है। अमित शाह के हवाले से छपी सेकेंड लीड का शीर्षक है, पहलगाम हमला करने वाले तीनों आतंकी मारे गये। कल की खबर में मास्टरमाइंड के शामिल होने की बात थी। आज तीनों के मारे जाने की घोषणा है।
5. टाइम्स ऑफ इंडिया
पहला पेज रोज जैसा ही है। ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा और उसकी रिपोर्ट जैसा कुछ खास नहीं लग रहा है। पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड भारतीय मूल के शैलेश जेजुरिकर को प्रॉक्टर एंड गैम्बल का सीईओ बनाये जाने पर है। इस खबर में अखबार ने यह भी बताया है कि प्रॉक्टर एंड गैम्बल जिलेट और ओल्डस्पाइस, क्रेस्ट एंड विक्स, हेड एंड शोल्जर्स और पैनटीन, ओले और ओरल बी, पैम्प्रस और टैम्पैक्स को पीछे छोड़ दिया है। अखबार के पहले पन्ने की लीड का शीर्षक वही है जो कई अन्य संपादकों को पसंद आया है और शायद इसीलिये कहा गया है। यह हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग भी हो सकता है। शीर्षक है, मोदी ने कहा दुनिया के किसी नेता ने ऑपरेशन सिन्दूर को रोकने के लिए नहीं कहा। इसके साथ कांग्रेस पर आरोप औऱ सिर्फ कांग्रेस ने साथ नहीं दिया जैसी बातें नहीं हैं। तीनों आतंकियों को मार गिराने का अमित शाह का दावा इसी खबर के साथ है। खास बातों के बॉक्स में चार नेताओं के बयान हैं। फोटो के साथ यहां जिन नेताओं के बयान छपे हैं वे हैं – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राहुल गांधी और अखिलेश यादव।
6. दि एशियन एज
टाइम्स ऑफ इंडिया ने जिसे पहले पन्ने पर नहीं छापा वह यहां लीड के शीर्षक में है, “पूरी दुनिया ने (ऑपरेशन) सिन्दूर का समर्थन किया लेकिन कांग्रेस ने पाकिस्तान का पक्ष लिया : प्रधानमंत्री”। तीन अन्य दावे बुलेट प्लाइंट के रूप में फ्लैग शीर्षक है। ये हैं, भारत आतंक की धमकी, परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेगा 2) अमेरिकी मध्यस्थता के दावे खारिज किये और सिन्धु जल संधि की आलोचना की। सेकेंड लीड पहलगाम के तीनों आतंकियों को मार गिराने की अमित शाह की घोषणा है। इसका उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री, सेना की प्रशंसा की, पाकिस्तान के ब्लंडर के लिए कांग्रेस की आलोचना की। कुल मिलाकर अखबार प्रधानमंत्री की घोषणाओं का प्रचार उनसे भी तेजी से कर रहा है।
7. द हिन्दू
लीड अमित शाह की घोषणा है। शायद इसका कारण यह है कि खबर अगर कुछ है तो इसी में। सेकेंड लीड प्रेसिडेंशियल रेफ्रेंस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने की खबर है। कल हिन्दुस्तान टाइम्स में इसपर छोटी सी खबर थी और मैंने इस बारे में लिखा भी था। आज सेकेंड लीड सिर्फ हिन्दू में है। लीड का शीर्षक है, “पहलगाम से जुड़े तीन पाकिस्तानी आतंकी मारे गये : केंद्र”। उपशीर्षक में आतंकियों को मार गिराने की घोषित टाइम लाइन का जिक्र है और बताया गया है कि इसके समय को लेकर विपक्ष के सवालों के लिए प्रधानमंत्री ने उसकी आलोचना की। मतलब जवाब नहीं दे पाये या नहीं दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा कि भारत को किसी ने ऑपरेशन सिन्दूर को रोकने के लिए नहीं कहा वह यहां सिंगल कॉलम में है।
8. द टेलीग्राफ
इसका रुख सरकार का समर्थन या प्रचार वाला नहीं है। एक पक्षीय खबर की बजाय अखबार की खबर में सवाल भी है और वह भी जो किसी और अखबार में लीड के आस-पास नहीं है। लीड का मुख्य शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, (ऑपरेशन) सिन्दूर का मुद्दा बाहर आया। इस मुद्दे पर दो खबरें हैं। एक का शीर्षक है, ‘कोई विदेशी हाथ नहीं’ पर मोदी ट्रम्प पर मौन रहे। इसके साथ राहुल गांधी का वह आरोप है जो किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है, प्रधानमंत्री की छवि बचाने के लिए सैनिक अभियान। इसके साथ तीन कॉलम की खबर अमित शाह के खुलासे पर है लेकिन इसका शीर्षक भी दूसरे अखबारों की तरह दंतहीन, सरल नहीं है। अखबार ने लिखा है, (अमित) शाह ने पहलगाम के मारे गये आतंकियों पर ससपेंस खत्म किया।
9. इंडियन एक्सप्रेस
सरकारी लाइन पर चलता हुआ दिख रहा है। लीड का शीर्षक है, पहलगाम के आतंकी मारे गये, पाकिस्तान का हाथ होने के स्पष्ट सबूत, (अमित) शाह ने लोकसभा में कहा। अखबार ने अमित शाह के इस दावे को भी पूरा महत्व दिया है कि बैलिस्टिक रिपोर्ट, गवाहों ने मारे गये तीन लोगों के पहलगाम का हमलावर होने की पुष्टि की। यही नहीं, अखबार ने आतंकियों को घेरने और मारने के पूरे अभियान की जानकारी दी है और ऑपरेशन के महादेव शिखर पर पहुंचने की बात कही है। ऑपरेशन महादेव का नाम सावन के सोमवार को सुनना दिलचस्प था। इंडियन एक्सप्रेस की इस खबर से पता चल रहा है कि यह अभियान (अंतिम दिनों में) जिस जंगल में या जहां चला वह महादेव पीक है। जो भी हो मेरा काम कहानी की सत्यता की पुष्टि करना नहीं है। मैं तो सिर्फ खास बातें रेखांकित करता हूं। इंडियन एक्सप्रेस ने भी प्रधानमंत्री के दावे को सेकेंड लीड बनाया है। इसका शीर्षक वही है जो दूसरे अखबारों में है। इसमें यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान का समर्थन सिर्फ तीन देशों ने किया।
संसद में चर्चा और उसकी आज की रिपोर्टिंग से कुल मिलाकर जो स्थिति बनी है वह यह कि पहलगाम हमला और उसके बाद जो सब हुआ था उससे भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार और सिस्टम की छवि को जो धक्का लगा था उसकी भरपाई करने की कोशिश की गई और इसमें कांग्रेस की आलोचना शामिल है। ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में चर्चा अगर जरूरी थी तो भाजपा उससे किसी तरह निपटने में कामयाब हुई। निष्पक्ष पर्यवेक्षक चाहे जैसे देखें, प्रचारक मीडिया को इसे सरकार की जीत के रूप में ही दिखाना था और प्रधानमंत्री विजयोत्सव मनाने का संदेश और संकेत सत्र के पहले ही दिन मीडिया को दे चुके थे। इस तरह पुलवमा हमले का लाभ उठाकर अगर 2019 का लोकसभा चुनाव जीता जा सका था तो पहलगाम हमले का लाभ उठाने की कोशिश नाकाम हो गई थी। अब उसे लीप-पोत दिया गया है और उसी दिन हमलावरों को मार गिराने का दावा करके मामले को खत्म करने की कामयाब कोशिश हुई लगती है। देखना है आगे क्या होता है और ऊंट किस करवट बैठता है।”


