ओपी सक्सेना-
ये वाकया भी अस्सी के दशक का ही है। मैं मेरठ में नया-नया रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा बना था। मंगल जायसवाल जी हमारे संपादकीय विभाग के इंचार्ज थे। गजेंद्र सिंह हमारे फोटोग्राफर थे। आजकल वो कानपुर में निवास करते हैं। वो भी नए-नए अखबारी दुनिया का हिस्सा बने थे। उस समय हमारा वेतन मात्र 600 रुपए मासिक था। एक दिन रात में जब हम लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, मंगल जी ने हम दोनों को अपने केबिन में बुलाया और अपने सामने पहले से बैठे एक सज्जन से हमारा परिचय कराया।
उन्होंने बताया की ये शहर के बड़े पेट्रोलियम और होटल व्यावसायी हैं। साथ ही राष्ट्रीय लोकदल से भी जुड़े हुए हैं। कल शहर में लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह जी का रोड शो है जिसकी कवरेज तुम दोनों को करनी है। रोड शो की सारी व्यवस्था इन्हीं के द्वारा की गई है। तुम दोनों की मुलाकात इस लिए कराई है की किसी तरह की दिक्कत हो तो इनसे संपर्क कर लेना।
मंगल जी के इस तरह परिचय कराने का कारण उस समय ना तो मैं समझ पाया और न ही गजेंद्र, क्यों की इससे पहले कभी भी किसी नेता के रोड शो से पहले उसके आयोजक से हमारा परिचय नहीं कराया गया था। ऐसे में हम दोनों ने इसे एक औपचारिक मुलाकात के तौर पर ही लिया और वापस अपने काम में लग गए।
अगले दिन मैं और गजेंद्र अपने समय से रेलवे रोड चौराहे पहुंच गए। यहीं पर चौधरी अजित सिंह जी का स्वागत होना था। अभी कुछ ही समय बीता था की वो नेता जी जिनसे रात में हमारा परिचय कराया गया था हमारे पास आए और हमारे कंधे पर हाथ रख कर बताने लगे की उन्होंने वहां क्या-क्या व्यवस्था की है। फिर वो पहले मुझसे बात करते हुए मुझे सड़क के दूसरे किनारे पर ले गए और मेरे शर्ट की ऊपरी जेब में हाथ डालते हुए आगे बढ़ गए… जरा ध्यान रखिएगा ओ पी भाई।
उनके जाते ही मैंने अपनी जेब को टटोला यह जानने के लिए की इसने मेरी जेब में हाथ क्यों डाला। पता चला की मेरी जेब में सौ रुपए का एक नोट पड़ा था। इसी बीच गजेंद्र भी भागता हुआ मेरे पास आया। उसके हाथ में भी सौ रुपए का एक नोट था। हम दोनों एक दूसरे को सवालिया नजरों से देख रहे थे.. अबे, ये क्या है?
इससे पहले हमें ये तो पता था की किसी भी राजनीतिक आयोजन में पत्रकारों के लिए वाहन और भोजन की व्यवस्था संबंधित पार्टी की ओर से किए जाने को पत्रकारिता की दुनिया में रिश्वत नहीं माना जाता। इस तरह पैसे भी मिलते हैं ये पहली बार पता चला। जो भी हो उस समय हम दोनों ने तय किया की हम दोनों ये पैसे मंगल जी को सौंप देंगे।
ऑफिस पहुंचते ही हम दोनों मंगल जी के केबिन में गए और नेता जी द्वारा दिए गए सौ-सौ के दोनों नोट उनकी टेबल पर रख दिए और उन्हें पूरा किस्सा बता दिया। हमारी बात सुनकर मंगल जी मुस्कुराए और वो नोट वापस हमारे हाथ पर रख दिए और बोले…इसे अपने पास रखो और जाकर खबर लिखो।
मंगल जी केबिन से बाहर आकर हम अपने-अपने काम में लग गए लेकिन इस कहानी का क्लाइमेक्स और भी मजेदार रहा। सुबह जब अखबार आया तो पता चला की खबर में ना तो नेता जी का नाम छपा और ना ही फोटो। मंगल जी ने छान बीन की तो पेस्टर ने बताया की रात में पेज पर विज्ञापन बढ़ जाने के चलते पेज पर लगे दो फोटो में से एक को हटाना पड़ा और न्यूज में से भी दो पैराग्राफ काटने पड़े। बस इसी में नेता जी का फोटो और नाम खबर से गायब हो गया। बाद में नेता जी और मंगल जी के बीच काफी समय तक नाराजगी का माहौल रहा।
कुल मिलाकर इस वाक्ये के काफी सालों बाद ये बात समझ में आई की अखबार की दुनिया में संपादक के माध्यम से डेस्क इंचार्ज और रिपोर्टर कोई मौद्रिक लाभ पाते हैं तो ये बेईमानी की श्रेणी में आता है और यही मौद्रिक लाभ विज्ञापन के रूप में अखबार मालिक के खाते में जाता है तो वह बेईमानी नहीं है?
सिर्फ इतना ही नहीं आजकल जब मैं अपने साथ या दूसरे अखबारों में वर्षों तक काम कर चुके या काम कर रहे अपने पत्रकार साथियों को सत्ता प्रतिष्ठान अथवा किसी राजनीतिक दल से उपकृत और सम्मानित होते देखता हूं तो मुझे उनके चेहरों पर अदृश्य रूप से सौ रुपए का नोट चिपका नजर आता है। कमाल की बात तो ये मीडिया मालिकों के चेहरों पर चिपके इन नोटों का रंग कुछ ज्यादा ही गहरा है लेकिन इन्हें कुछ नहीं कह सकते, इनका तो धंधा है ये। पहले भी था आज भी है।
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता के रोचक संस्मरण (पार्ट 1): पहली ही ख़बर से अखबार मालिक के घर पथराव हो गया!


