रामधनी द्विवेदी-
कुछ दिनों बाद पता चला कि तीन लोगों का चुनाव हुआ था लेकिन केवल मुझे ही पहले दिन बुलाया गया था। कुछ महीने बाद राजन गांधी को ज्वाइन कराया गया और बाद में वशिष्ठ मुनि ओझा को। राजन ने बाद में नवभारत टाइम्स में ट्रेनी के रूप में ज्वाइन किया और धर्मयुग में खेल संपादक हुए। बाद में कुछ साल बाद उसका कैंसर से देहांत हो गया।
दूसरे दिन 19 जनवरी 1973 को मैं सुबह दस बजे जनवार्ता के काशीपुरा स्थित कार्यालय पहुंचा। फूफा जी मुझे पहुंचा कर शाम को आने के लिए कह कर अपने दफ्तर चले गए। वह नगर निगम के शिक्षा विभाग में शिक्षा अधीक्षक थे। मैं ईश्वरदेव जी से मिला तो वह मुझे लेकर एक संकरे किंतु लंबे कमरे में गए जिसमें कुछ लोग बैठे हुए थे। उन्होंने एक बुजुर्ग से व्यक्ति को मेरा नाम बताते हुए कहा कि इन्होंने आज संपादकीय विभाग में प्रशिक्षु के रूप में ज्वाइन किया है। इन्हें प्रशिक्षण दीजिए। वह महेंद्रनाथ वर्माजी थे जो मेरे पत्रकारिता पहले गुरु हुए। उन्होंने भी एक लंबा इंटरव्यू लिया- क्यों यह नौकरी कर रहे हो, यहां पैसा नहीं है, इस उम्र में मैं ढाई सौ की नौकरी कर रहा हूं, कुछ और कर सको तो कर लो आदि आदि।
बाद में समझ में आया कि यह कुंठा हर उस पत्रकार को होती है जो ईमानदारी और मेहनत से पत्रकारिता करना चाहता है। जो दलाली करते हैं, कमाने का जरिया तलाश लेते हैं, उनकी तब भी पौ बारह थी आज भी है। अब तो पत्रकारों का वेतन काफी कुछ ठीक है लेकिन आज भी दूसरे पेशे की तुलना में काफी कम है और उसमें जीना मुश्किल ही है, बचाना तो संभव ही नहीं। यदि आपकी पत्नी भी कहीं नौकरी नहीं करती तो भले पत्रकार का जीवन कष्टकर ही है। न नौकरी की सुरक्षा न भविष्य का।
वहीं पहली बार श्री त्रिलोचन शास्त्री जी के भी दर्शन हुए। जब वर्माजी मुझे हतोत्साहित कर रहे थे तो शास्त्री जी बहुत ध्यान से दाढ़ी खुजलाते हुए मुझे देख रहे थे और अंत में उन्होंने वर्मा जी को टोंका भी कि क्यों बच्चे का मन तोड़ रहे हैं। लेकिन बाद में इन दोनों ने मुझे बहुत कुछ दिया।
वर्मा जी ने मुझे काफी देर तक बिना बोले निरीह भाव से देखने के बाद एक छोटा सा टेलीप्रिंटर का अंग्रेजी में तार दिया और उसे हिंदी में लिखने के लिए कहा। मैं पत्रकार बनने आया तो था लेकिन पहले ही दिन पेन ही लाना भूल गया था। जब मैंने उनसे बताया तो उन्होंने कहा-जाइए ईश्वरदेव जी से पेन मांग लीजिए। वह शायद ईश्वरदेव जी को यह संदेश भी देना चाहते थे कि देखिए आपने किसे चुना है जो बिना पेन के पत्रकार बनने चला है। वर्मा जी को शायद भविष्य के पेनलेस और पेपरलेस पत्रकारिता का समय आने का अनुमान नहीं था। आज मैं यह सब लैपटाप पर लिख रहा हूं जिसमें न पेन का योगदान है और न ही पेपर का।
खैर, जब ईश्वरदेव जी को पता चला कि मैं बिना पेन लिए आ गया हूं तो वह मुस्कराए और अपने सामने से उठाकर एक पेंसिल उन्होंने दी। मैंने पहले दिन पहली खबर पेंसिल से लिखी। पहले दिन मैने जाना कि खबर में डेटलाइन क्या होती है, उसे कैसे लिखा जाता है और उसका क्या महत्व है। पहले दिन मैने पांच खबरें बनाईं, अधिकतर एक पैरे की, दो-एक दो पैरे की। उन दिनों जनवार्ता दस पैसे का बिकता था। दूसरे दिन मैंने तीस पैसे में तीन अखबार खरीदे क्यों कि उसमें मेरी लिखी तीन खबरें छपी थीं।
दो-चार दिनों बाद मुझे चार छह पन्ने की एक बुकलेट दी गई जो वर्तनी से संबंधित थी। उसमें बताया गया था कि गया, गयी, गये आदि कैसे लिखे जाएंगे और क्यों। इसके अतिरिक्त लगभग 50-60 शब्दों का रूप बताया गया था कि इसे कैसे लिखा जाना चाहिए। जैसे अंतरराष्ट्रीय, धूमपान, परराष्ट्रमंत्री (विदेशमंत्री) स्वराष्ट्रमंत्री (गृहमंत्री) संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रकुल (कॉमनवेल्थ) दीक्षा समारोह और दीक्षांत भाषण, संख्या के लिए भारी न लिखकर बड़ी संख्या लिखने, काररवाई (अब यह शब्द न लिखकर कार्रवाई लिखा जाता है) और कार्यवाही में अंतर, खुदाई और खोदाई कहां लिखा जाए आदि कारण सहित स्पष्ट किया गया था।
यह वर्तनी और नियम आज ने बनाए थे जिसे बनारस के सभी अखबार पालन करते। आज की वर्तनी की यह नियमावली जनवार्ता ने भी छाप ली थी जो अपने पत्रकारों को उपलब्ध कराता था। आज शब्दों के मानकीकरण के प्रति पत्रकारों का आग्रह नहीं है और अलग अलग अखबारों में एक ही शब्द के अलग अलग रूप व्यवहार में लाए जाते हैं। जिन अखबारों ने अपनी वर्तनी तय की है, वे भी इसका कड़ाई से पालन नहीं करते हैं।
मैंने दो तीन महीने वर्मा जी के साथ काम किया। वह जनरल डेस्क की एक शिफ्ट के इंचार्ज थे। दूसरी शिफ्ट के इंचार्ज गणपति नावड़ जी थे। वर्मा जी दिन की और नावड़ जी रात की शिफ्ट देखते थे। मैंने अधिकतर दिन की ही शिफ्ट में काम किया। बाद के दिनों में रात की शिफ्ट में भी काम करने को मिला।
कुछ दिन जनरल शिफ्ट में काम करने के बाद मुझे रिपोर्टिंग में भेज दिया गया। उन दिनों हरिवंश तिवारी चीफ रिपोर्टर थे। उनके साथ वंशीधर राजू थे। मैं तीसरा रिपोर्टर हो गया। रिपोर्टिंग के शुरू में मुझे अस्पताल की खबरों का जिम्मा सौंपा गया। वहां से दुर्घटना, डकैती मारपीट आदि में घायल लोग लाए जाते इसलिए ऐसी दुर्घटनाओं की खबरें वहीं से मिलतीं। ऐसे मामले में लोग चूंकि इमरजेंसी में ही भर्ती होते इसलिए पहले वहीं जाना पड़ता। लोगों से तरह तरह के सवाल करने पड़ते। लोग दुखी और परेशान होते, तो भी उनसे खोद-खोद कर पूछना होता। पहले संकोच होता, फिर आदत पड़ गई।
शुरू में डिटेल न पूछ सकने के कारण हमारी खबर आज से कमजोर होने लगी तो पता चलता कि हमने कहां गलती की और कहां चूक हो गई। वहीं काम के दौरान वरिष्ठ साथियों ने पांच डब्ल्यू और एक एच के बारे में पता चला। किसी खबर के ये शाश्वत अंग हैं। इनमें एक की भी कमी खबर को अधूरा बना देती है। मुझे कभी कभी थानों में भी फोन कर खबरें लेनी होती। पुलिसवालों से कैसे पूरी बात निकाली जाए, यह कला भी रिपोर्टर को आनी चाहिए। नहीं तो वह रुटीन की जानकारी ही देगा। कुछ पत्रकारों का कुछ पुलिसवालों से याराना हो जाता है। वे अपने प्रिय रिपोर्टर को ही खबरें बताते हैं या अतिरिक्त जानकारी देते हैं। ऐसे यार पुलिस वाले सूत्र का भी काम करते हैं। उन्हें कहीं भी कोई सूचना मिलती हो, भले ही वह उनके थाने की न हो, वे अपने प्रिय पत्रकार को इसकी सूचना दे देते हैं और वह उसे डेवलेप कर लेता है।
कोतवाली, कप्तान के दफ्तर में फोन या फैक्स या वायरलेस पर रहने वाले पुलिस वालों के पास ऐसी सूचनाएं पहले आती हैं। यह याराना दोनों के लिए फायदेमंद होता है। पुलिसवाला जहां पत्रकार को खबरें देता है, वहीं पत्रकार जरूरत पर उसे अफसरों के कोपभाजन से बचाता है या उसके गुडवर्क को हाईलाइट कर उसके प्रमोशन का भी मार्ग प्रशस्त करता है। जनवार्ता चूंकि आज से छोटा अखबार था और उसका प्रसार भी कम था, इसलिए पुलिस वालों का झुकाव भी आज की तरफ होता। लेकिन जनवार्ता की लोकप्रियता कम नहीं थी। हमें खबरें निकालने के लिए काफी जूझना पड़ता।
एक प्रकरण याद आता है। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे अहमद हसन उन दिनों बनारस के सीओ प्रथम थे। उन्हें शहर कोतवाल कहा जाता। वह कोतवाली में ही बैठते थे। उनकी आज के चीफ रिपोर्टर राजेंद्र गुप्त से अच्छी पटती थी और वह खबरें पहले उन्हें ही बताते थे। एक दिन वह कोई महत्वपूर्ण खबर उन्हें बता रहे थे। जनवार्ता से हरिवंश जी भी उन्हें फोन मिला रहे थे। उन दिनों आज की तरह स्मार्ट फोन नहीं होते थे। बड़े आकार के काले रंग के फोन होते जिनमें डायल पर दस गोल छेद बने होते थे, जिनके नीचे नंबर लिखे होते। उनमें उंगली डाल कर पूरा चक्कर घुमाना पड़ता था। पांच डिजिट के नंबर होते थे। अर्थात किसी को फोन मिलाने के लिए पांच बार उंगली डाल कर डायल घुमाना पड़ता। ऐसे में फोन प्राय: किसी न किसी नंबर से उलझ जाते।
यह बड़ी रोचक स्थिति होती। दोनों ओर को दोनों की बात सुनाई देती। जब फोन उलझ जाता तो बहुत चाहने पर भी न सुलझता। क्रेडिल पर चोंगा रख देने पर भी कनेक्शन नहीं कटता। तो उस दिन भी कोतवाल साहब से हरिवंश जी का नंबर उलझ गया। जब उन्हें पता चला कि वह किसी से बात कर रहे हैं तो वह बात सुनने लगे। राजेंद्र गुप्त ने उनसे कहा कि यह खबर किसी अखबार को न बताइएगा, जनवार्ता को कतई नहीं। अहमद हसन ने कहा नहीं, अब इस समय उनका फोन भी न आएगा और आएगा भी तो नहीं बताऊंगा। वह छोटा अखबार है, बस यह खबर आज में छप जाए।
खैर, उस समय तो हरिवंश जी ने फ़ोन रख दिया। थोड़ी देर बाद जब दोबारा मिलाया तो कोतवाल साहब ने फोन नहीं उठाया और वह खबर जो शायद कोई शासनादेश था, केवल आज में ही छपा। राजेंद्र गुप्त आज में हमेशा रात की ड्यूटी करते। वह रात साढ़े आठ बजे दफ्तर आते और खबरें या तो अपडेट करते या देर रात की खबरों को देखते। तब खबरों की इतनी मारा- मारी भी नहीं थी। हरिवंश जी ने अहमद हसन की बात दिल पर ले ली और रोज एक खबर कोतवाली पुलिस के खिलाफ, उसकी लापरवाही और कानून व्यवस्था पर छपने लगी।
हर खबर में यह बात लिखी होती कि देर रात कोतवाल का फोन नहीं उठा। एक हफ्ते बाद एक दिन शाम को हम लोग आफिस में बैठे थे कि कोतवाल साहब की जीप कैंपस में रुकी और अहमद हसन सीधे संपादक जी के कमरे में गए। चाय पीने के साथ ही उन्होने उन खबरों की चर्चा की। संपादकजी ने हरिवंश जी को बुलाया और दोनों की आमने सामने बात कराई, तब ईश्वरदेव जी को यह प्रकरण नहीं मालूम था। अहमद हसन ने बात बनाने की कोशिश की और कहा कि भाई जनवार्ता और आज दोनों मेरे लिए समान हैं। आप जब चाहें मुझसे बात कर सकते हैं, मिल सकते हैं। और इस तरह तनाव-शैथिल्य हुआ।
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बनारस के अख़बार में पत्रकारिता की मेरी पहली सुबह!


