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नीतीश ने पत्रकारों पर निकाली भड़ास, दिखाया बाहर का रास्ता

पटना। सत्तारूढ़ जदयू के अंदर सत्ता की जारी जंग में सारे दांव उल्टा पडऩे की खीज निकालते हुए कवरेज को गए पत्रकारों को पार्टी नेता नीतीश कुमार ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।  नीतीश कुमार पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने की जद्दोजहद के साथ ही अपने निवास पर कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण वर्ग चला रहे हैं।  मंगलवार को छात्र जदयू के कार्यकर्ताओं के सम्मेलन की कवरेज के लिए मीडियाकर्मी बुलाए गए थे, लेकिन नीतीश ने सभी को बाहर चले जाने की नसीहत दे डाली।

पटना। सत्तारूढ़ जदयू के अंदर सत्ता की जारी जंग में सारे दांव उल्टा पडऩे की खीज निकालते हुए कवरेज को गए पत्रकारों को पार्टी नेता नीतीश कुमार ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।  नीतीश कुमार पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने की जद्दोजहद के साथ ही अपने निवास पर कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण वर्ग चला रहे हैं।  मंगलवार को छात्र जदयू के कार्यकर्ताओं के सम्मेलन की कवरेज के लिए मीडियाकर्मी बुलाए गए थे, लेकिन नीतीश ने सभी को बाहर चले जाने की नसीहत दे डाली।

अपने रुख और फैसलों से लगातार पार्टी और सरकार पर नियंत्रण में असफल होते जा रहे नीतीश कुमार की बौखलाहट इसके साथ ही सार्वजनिक हो गई। इस दौरान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को मंत्रियों से रिश्ते सुधारने की सलाह दे डाली। वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि मंत्रियों से रिश्ते सुधारना मुख्यमंत्री का दायित्व है। ऐसा नहीं संभव होगा तो पार्टी और सरकार की छवि बिगड़ती जाएगी। इस तरह पार्टी ने पहली बार माना कि सरकार में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा। पार्टी यह भी साफ कर दिया कि सरकार में उठा-पटक से पार्टी की छवि बिगड़ी तो इसकी जिम्मेवारी मांझी पर होगी।

जदयू के अंदर जारी घमासान और सत्ता की छीनाझपटी के ये दोनों वाकये असल में राजनैतिक रूप से खासे महत्वपूर्ण हैं और ये स्पष्ट करने के लिए काफी हैं कि नीतीश कुमार का सत्ता पर नियंत्रण नहीं के बराबर रह गया है और पार्टी में बेहद असहज स्थितियां उभर आई हैं। लोकसभा चुनावों के बाद अब तक नीतीश के फैसले सिलसिलेवार उन्हीं पर भारी पड़ते दिखे हैं। मांझी के खिलाफ पार्टी और सरकार में मुहिम छेड़ी गई लेकिन दांव उल्टे साबित हुए। नीतीश समर्थक मंत्रियों के घर डिनर डिप्लोमेसी के जरिए मांझी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास भी विफल साबित हुआ। उल्टे मांझी के समर्थक मंत्रियों और विधायकों की संख्या और भी बढ़ती गई। दरअसल नीतीश के रुख अैर तेवर से पार्टी में असहज रहने वाले विधायक-मंत्रियों को मांझी के रूप में एक बड़ा आधार मिल गया।

जदयू और राजद के विलय की बात हवा में झूलने और मांझी को हटाने के प्रस्ताव पर लालू यादव के विरोध से भी नीतीश को मात खानी पड़ गई। सरकार के नीतीश समर्थक मंत्रियों ललन सिंह और पीके शाही ने मांझी के विरोध में मोर्चाबंदी की। मुख्यमंत्री ने इन्हें यह कहकर झिड़क दिया कि अफसरों का तबादला मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।  विभागीय अधिकारियों का काम संतोषजनक नहीं था। दोनों ही मंत्रियों ने तबादलों पर सवाल उठाते हुए मांझी को घेरने की कोशिश की थी। इन्हीं संदर्भों में पार्टी अध्यक्ष की ओर से मांझी को रिश्ते सुधारने की मिली नसीहत नीतीश कुमार खेमे के नए पैंतरे का नमूना है।

मांझी सत्ता-संघर्ष की एक ऐसी धूरि बन गए हैं जिससे नीतीश की भाजपा विरोधी धार निरंतर कुंद और कमजोर होती जा रही है। भाजपा के मांझी के प्रति नरम रूख से भी नीतीश को झटके लग रहे हैं। मुख्यमंत्री के बयानों खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ वाली बातों से नीतीश कुमार की तिलमिलाहट और भी बढ़ती है और यह खीझ मीडिया पर बरसती है। चूकि इन सारे हालात का नकारात्मक प्रभाव सत्तारूढ़ जमात पर सीधा पड़ रहा है, लिहाजा चुनाव से पहले ही भाजपा विरोधी अभियान की हवा निकलने से भाजपा की राहें आसान सी होती दिखाई देने लगी है।

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट.

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