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दिल्ली

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जेल को अपना कैम्प कार्यालय बना सकते हैं!

सत्येंद्र पी एस-

अरविंद केजरीवाल की भी अद्भुत राजनीति है। भ्रष्टाचार के खिलाफ नारेबाजी से राजनीति शुरू की। इन्होंने नेताओ की एक लिस्ट बना रखी थी। उसमें आरोपी नेताओ के नाम हुआ करते थे। मंच पर ये उन नामों को गिनाया करते थे।

जनता से हाथ उठाकर पूछते थे कि क्या इन लोगों को जेल में नहीं रहना चाहिए, जो मंत्री बने बैठे हैं? इनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और सरकार चला रहे हैं। जनता भी खुश होकर जोर जोर से तालियां बजाती थी। खुश होती थी कि कितनी महान बात कही जा रही है।

अब आरोप तो छोड़िए। बन्दा खुद जेल में है और जेल से सरकार चलाई जा रही है। भारत के इतिहास में पहली बार यह हो रहा है कि जेल से सरकार चल रही है। इसके पहले यह परंपरा थी कि कोई मंत्री मुख्यमंत्री जेल जाने के पहले इस्तीफा दे देता था। अब भारत में यह नई परंपरा पड़ी है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जेल को अपना कैम्प कार्यालय बना सकते हैं।

संविधान को अंग विशेष पर रखकर घूमने का इससे शानदार उदाहरण क्या हो सकता है?

अगर संविधान बनाने वालों को यह अहसास होता कि कोई ऐसी भी हरकत कर सकता है तो उन्होंने यह प्रावधान निश्चित रूप से किया होता कि जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना होगा। वो केवल इतना ही सोच पाए थे कि प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर होता है तो पदानुक्रम में दूसरे नम्बर का कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री का उत्तराधिकारी होता है। लेकिन जेल जाने की स्थिति में क्या करना है, संविधान में कुछ दिया ही नहीं है!

पंजाबियों ने भी बड़ी क्रांति की। आज पंजाब भयानक रूप से नशीली दवाओं के असर में है। पंजाब से लोग कनाडा भागने के फिराक में इसलिए हैं कि उनकेबच्चों की कम से कम जान बच जाएगी। जो वहां नौकरी करते हैं उनकी डर के मारे हालत खराब है कि स्कूल।में पढ़ने वाला उनका बच्चा कहीं ड्रग एडिक्ट न हो जाए!
खैर..

अपन का क्या? जैसा जनता चाहे! खाने में भी बड़ा खेल है। दिल्लीवाले जानते ही नहीं कि बासमती चावल क्या होता है! यहां का बासमती पानी पी पीकर जबर्दस्ती निगलना होता है या उसमें तेल घी इतना झोंकना पड़ता है कि गले से सरक जाए! लगता है कि देहरादून में आश्रम बनाना ही पड़ेगा जिससे कम से कम बासमती तो शुद्ध मिल पाए!

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