मनोज अभिज्ञान-
सदियों से चला आ रहा एक रक्तरंजित इलाज—अब बस पुरानी याद बन सकता है। Polycythemia Vera नाम की यह रहस्यमयी बीमारी, जिसमें शरीर लाल रक्त कणों (RBC) का अति-उत्पादन करता है, वर्षों तक चिकित्सा विज्ञान के लिए पहेली रही है। इसका इलाज? खून निकालना। जी हाँ, आधुनिक अस्पतालों में भी, इस बीमारी के शिकार लोगों को ‘फ्लेबोटोमी’ यानी नियमित रूप से खून निकालवाना पड़ता है, ताकि रक्त का गाढ़ापन और थक्कों का खतरा कम हो सके।
कल्पना कीजिए—हर महीने, कभी-कभी हर हफ्ते अस्पताल जाना, सिर चकराना, थकावट, कमजोरी और साथ में आयरन की कमी। इलाज तो था, लेकिन मध्ययुगीन सा—मानो चिकित्सा विज्ञान कहीं ठहर गया हो। लेकिन अब विज्ञान ने समय को मात दी है। Protagonist Therapeutics और Takeda की एक नई दवा, rusfertide, ने इसे नई दिशा दी है। यह दवा अद्भुत रणनीति पर काम करती है—यह शरीर के अंदर hepcidin नामक हार्मोन की नकल करती है, जो आयरन के उपयोग को नियंत्रित करता है। आयरन को अस्थिमज्जा (bone marrow) तक पहुँचने से रोककर यह दवा लाल रक्त कणों के निर्माण को धीमा कर देती है, और मरीज को फिर से आयरन का भंडार बनाने का अवसर देती है।
“अब जोंकों का जमाना गया,”—ऐसा कहना है डॉ. बार्ट स्कॉट का, जो Fred Hutchinson Cancer Center में इस बीमारी के मरीजों का इलाज करते हैं। और वे अकेले नहीं हैं। अकेले अमेरिका में ही लगभग हर एक लाख में से पचास लोग इस बीमारी से जूझते हैं। अधिकांश मामलों में यह बीमारी 60 की उम्र के बाद और JAK2 नामक जीन में बदलाव के कारण पाई जाती है। खून के थक्के, दिल के दौरे, स्ट्रोक—सबसे बड़ा जोखिम यही है। और दुर्लभ मामलों में यह बीमारी आक्रामक रक्त कैंसर में भी बदल सकती है।
हाल ही में American Society of Clinical Oncology के सम्मेलन में पेश किए गए आंकड़ों ने चिकित्सा जगत को चौंका दिया। 290 मरीजों पर हुए परीक्षण में, जिनमें से कई पहले से कीमोथेरेपी पर थे, आधे को हफ्ते में एक बार rusfertide का इंजेक्शन दिया गया और बाकी को प्लेसबो। 20 से 32 सप्ताह के बीच, 77% मरीजों को रक्त निकालने की जरूरत ही नहीं पड़ी, जबकि कंट्रोल समूह में केवल 33% को ही राहत मिली।
सिर्फ आंकड़े नहीं, अनुभव भी बोले। जिन मरीजों को rusfertide दी गई, उन्होंने कम थकान, कम खुजली, कम पेट दर्द और रात में पसीना आने की शिकायत की, और उनकी ज़िंदगी कुछ हल्की सी लगने लगी। गंभीर दुष्प्रभावों की दर भी कम रही, और नए कैंसर मामलों की संख्या भी।
हालाँकि, इंजेक्शन वाली जगह पर थोड़ी जलन, थकावट और खून की कमी जैसे कुछ दुष्प्रभाव देखे गए, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। प्लेसबो समूह को बाद में दवा दी गई, और अब तीन वर्षों तक इन मरीजों पर निगरानी जारी रहेगी, ताकि दीर्घकालिक प्रभाव और सुरक्षा को समझा जा सके। साल 2026 के वसंत तक 52-सप्ताह के आंकड़े आने की उम्मीद है, और उसके बाद Takeda इस दवा को अमेरिका की FDA से मंजूरी दिलाने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
एक ओर जहां दवा की खोज विज्ञान की जीत है, वहीं यह उन हज़ारों लोगों की आशा की लौ भी है, जिनकी ज़िंदगी रक्त की सूइयों और थकान के पहाड़ में उलझ गई थी। शायद, अब यह बीमारी सिर्फ खून से नहीं, विज्ञान की धार से भी काबू में आ सकेगी।
वॉल स्ट्रीट जर्नल में 10 जून 2025 को प्रकाशित रिपोर्ट (ऊपर)


