
गुवाहाटी से छपने वाले पूर्वांचल प्रहरी अख़बार में वैसे तो कई जगह से लोग आए थे. लेकिन उनमें बिहार और खासकर पटना और भागलपुर इलाके से आने वालों की तादाद ज्यादा था. सत्यानंद पाठक के प्रयासों से मिथिलांचल से भी कई लोग धीरे-धीरे आए थे.
पत्रकारों की यह भीड़ अनेकता में एकता की मिसाल थी. लेकिन इस भीड़ में कई दिलचस्प चरित्र भी थे. बहुत कम लोग ही ऐसे थे जो गुवाहाटी आने से पहले किसी अखबार या पत्रिका में नौकरी करते थे. इनमें इलाहाबाद के माया प्रकाशन से आने वाले प्रीति शंकर शर्मा और कल्याण चंद्र जायसवाल जैसे कुछ वरिष्ठ पत्रकार थे. कुछ लोगों ने पहले भले कुछ अखबारों में फ्रीलांसर के तौर पर किया होगा लेकिन ज्यादातर लोगों की यह पहली नौकरी थी.
यह कहना ज्यादा सही होगा कि पूर्वोत्तर से हिंदी अखबार के प्रकाशन ने कइयों को रोजगार का मौका दे दिया. महीनों तक कुछ लोगों को खर्चा-पानी देकर कुछ और लोगों को बुलाने के लिए बिहार भेजा गया. उनमें से कुछ को अखबार में रखा गया तो कुछ को सप्तसेतु में.
यहां पहुंचे पत्रकारों में से कुछ खुद को तीसमार खां समझते थे तो कुछ सच में बेहद प्रतिभाशाली थे. कुछ लोग ऐसे थे जो लिखने-पढ़ने के नाम पर तो जीरो थे. लेकिन लंबी-लंबी हांकने में माहिर. कुछ लोग जानकार थे लेकिन डींग नहीं हांकते थे. वहीं कुछ ऐसे भी थे जो हमेशा यह जताने से नहीं चूकते थे कि यहां आकर उन्होंने अखबार पर एहसान किया है. वह लोग अक्सर कहते थे कि उनको नौकरी की जरूरत नहीं है, घर मैं सौ बीघे में पुदीने की खेती होती है. वह तो पूर्वोत्तर देखने की ललक के कारण आ गए हैं.
भीड़ में कुछ रंगे सियार भी थे. बाद की खेप में पहुंचे कुछ लोगों को बतौर ट्रेनी रखा गया था. अखबार के शुरुआती महीनों में ही उनमें से दो को रात को कथित रूप से शराब पीकर बवाल काटने के जुर्म में पुलिस ने पकड़ लिया. उन्होंने अखबार का परिचय दिया तो दफ्तर में खबर आई. वहां से कुछ लोगों ने रात को थाने जाकर मामला निपटाया. उनमें से एक तो अब अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पत्रकार, चिंतक और आलोचक बन गए हैं.
चीफ सब एडिटर के पद पर पहुंचे कोलकाता के शर्मा जी उम्रदराज और कुछ दिलफेंक किस्म के थे. लेकिन वह शायद पहले पत्रकार थे जिन्होंने सीधे चीफ-सब के पद पर ज्वाइन किया था. उससे पहले जीवन में कभी कहीं कोई नौकरी नहीं की थी. उस समय पीटीआई और यूएनआई के तार फाड़ कर अनुवाद करना होता था. इसके लिए एक अंडाकार मेज के चारों तरफ उप-संपादक बैठते थे और बीच वाली कुर्सी पर चीफ सब यानी मुख्य उपसंपादक.
तब न्यूज एजेंसी की मशीनों में शुरुआत में पिछले दिन की खबरों की इम्पैक्ट रिपोर्ट आती थी कि कौन सी खबर कहां-कहां छपी है या कितनी चली है. शर्मा जी ने इस इम्पैक्ट रिपोर्ट का छोटा-सा बंडल बना कर प्रीति शंकर शर्मा की ओर फेंका कि इसका अनुवाद कर लीजिए.
अब शर्मा जी कभी उस इम्पैक्ट रिपोर्ट को देखें तो कभी चीफ सब को. काफी भद्द पिटी. लेकिन शर्मा जी ने यह कह कर जान छुड़ाई कि शायद ढंग से देखा नहीं था. खैर, कुछ दिनों बाद ही वहां से उनका बोरिया-बिस्तर बंध गया.
सप्तसेतु पत्रिका के लिए दिल्ली से एक सज्जन आए थे. यहां जानबूझकर नाम नहीं दे रहा हूं. उनको रिपोर्टिंग के लिए मेघालय की राजधानी शिलांग भेजा गया. वहां से लौट कर उन्होंने अपना सोनी का छोटा सा टेपरिकार्डर निकाला और कान में सुनते हुए इस अंदाज में रिपोर्ट लिखते रहे मानो अब मेघालय की सरकार को उखाड़ कर ही मानेंगे. वो अक्सर संपादक के कक्ष में ही बैठ कर रिपोर्ट लिखते थे. कई दिनों तक उनका लिखना जारी रहा. तब हम जैसे लोग हसरत से उनके टेप की ओर देखते रहतो.
हमारे लिए उस दौर में ऐसा टेप खरीदना तो एक सपना ही था.
शुरुआती दौर में उस सज्जन ने भी काफी हवा बनाई थी. बाद में कोई उनके लाचित नगर स्थित घर गया तो वहां घर में कोई महिला नजर आई. उन सज्जन ने बताया कि उनकी मुंहबोली बहन आई है. वह तो कई महीनों बाद पता चला कि वह दरअसल उनकी मुंहबोली पत्नी थी. ऐसे कई और दिलचस्प किरदारों से उस दौर में मुलाकात हुई थी.
अखबार जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, वैसे ही दफ्तर में राजनीति, ईर्ष्या और जलन भी बढ़ने लगी थी. इसकी कहानी अगली कड़ी में..
पिछला भाग….
जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-4) : नवोदित पत्रकार जोड़ों का मैं सलमान खान बन गया


