
प्रभाकर मणि तिवारी-
धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगे लोग
घुमक्कड़ीऔर कुछ पारिवारिक व्यस्तताओं की वजह से कुछ महीनों से यह कालम लिखना नहीं हो सका था.
गुवाहाटी से छपने वाले हिंदी दैनिक पूर्वांचल प्रहरी में बीतते समय के साथ लोगों की आवाजाही भी बढ़ने लगी थी. कुछ लोग सेंटिनल में चले गए तो कुछ दूसरी जगहों से आए भी. अखबार का एक साल पूरा होने के बाद कांट्रैक्ट रीन्यू नहीं होने की वजह से संपादक कृष्णमोहन अग्रवाल बोरिया-बिस्तर समेट कर अपने पैतृक आवास गोरखपुर रवाना हो गए थे. उनको यहां से हटवाने में दो लोगों की भूमिका अहम थी. उनमें से एक अब दिवंगत हैं और दूसरे सज्जन भी पत्रकारिता से दूर हैं.
अखबार अपनी मंथर गति से चल रहा था. इस बीच, मेरी ड्यूटी भी बदलती रही. खेल. वाणिज्य और पूर्वांचल के पेज के बाद अब पहले पेज पर आ गया था. वाणिज्य पेज पर काम करने के दौरान भी कई दिलचस्प वाकये हुए. रविवार को चूंकि खबरें नहीं होती थी. इसलिए एनएनएस के फीचर से वह पेज पहले ही बन जाता था. मैं सोमवार से ही रोजाना कुछ-कुछ मैटर अतिरिक्त कंपोज करा कर अपने पास रख लेता था. रविवार को बस एकाध घंटे में पेज बन जाता था. यह लोगों को खटकने लगा. मालिक-संपादक तक भी बात पहुंची. लेकिन किसी को यह नजर नहीं आया कि मैं रोजाना अतिरिक्त काम करता हूं.
इसी तरह पेज एक पर काम करने के दौरान एक दिन संपादक (मालिक) जी.एल.अग्रवाल ने बुलाया. तब तक संस्थान से एक अंग्रेजी और एक असमिया अखबारों का प्रकाशन भी शुरू हो चुका था. उनमें से एक के संपादक थे जाने-माने असमिया साहित्यकार होमेन बरगोहांई. जाते ही जी.एल. अग्रवाल ने कहा कि अखबार का लेआउट द हिंदू की तरह होना चाहिए. बरगोहांईजी कह रहे हैं. मुझे उनकी सोच पर हैरत हुई. मैंने कहा कि पहले बरगोहांई जी अपने अंग्रेजी अखबार को तो द हिंदू जैसा बना दें. पूर्वांचल प्रहरी तो हिंदी अखबार है.
इसकेअलावा अखबार का लेआउट पेज इंचार्ज नहीं, पेज आर्टिस्ट या डिजाइनर बनाता है. यह कह कर मैं लौट आया. वह बात वहीं रह गई.
वर्ष 1990 में बाहर से गुवाहाटी आने वाले पत्रकारों का पलायन भी शुरू हो गया दिल्ली की ओर. संडे मेल और दिनमान टाइम्स समेत कई साप्ताहिक अखबार निकलने लगे थे या निकलने की तैयारी में थे. इस तरह पुराने लोगों का साथ धीरे-धीरे छूटता रहा. लेकिन मैं जमा रहा. वैसे भी मैं एक जगह टिक कर काम करने का आदी रहा हूं. कभी संपादक बनने की लालसा नहीं पाली. ठकुरसुहाती या चापलूसी की ए बी सी डी नहीं जानता था तो संपादक बन भी नहीं सकता था. यही वजह है कि जिन लोगों ने मेरे अधीन रहकर काम सीखा उनमें से कई बड़े संपादक और अंतर्राष्ट्रीयस्तर के पत्रकार बन गए.
खैर, असम में सब कुछ लाहे-लाहे यानी धीरे-धीरे चलता है. इसी तरह वहां अपना जीवन भी लाहे-लाहे चल रहा था. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि इस अखबार और गुवाहाटी शहर को छोड़ना होगा. लिखने-पढ़ने की आजादी थी. जनसत्ता से धर्मयुग से लेकर हिंदुस्तान और साप्ताहिक हिंदुस्तान तक नियमित लिख रहा था और पैसे भी खूब मिल रहे थे. उन दिनों जनसत्ता के खोज-खबर और खास खबर कालम में नियमित लिखा. तब ज्योतिर्मय नामक सज्जन इसे देखते थे. उनसे कभी मिला नहीं था. बस लिखा और डाक से भेज दिया. एकाध हफ्ते में वह छप जाता था. भूटान में अंगड़ाई लेते लोकतंत्र पर जनसत्ता के रविवारी में कवर स्टोरी भी उसी दौर में छपी थी.
उसी दौर में अंतिम सांसें गिन रहे स्थानीय अखबार उत्तरकाल से एक सज्जन को लाकर मेरे ऊपर बिठा दिया गया. कहां मैं प्रमोशन की उम्मीद कर रहा था. सत्यानंद पाठक (अब दिवंगत) ने बताया कि विनोद रिंगानिया जी ने कहा है कि तिवारी जी की भाषा ठीक नहीं है. इसलिए उनका प्रमोशन नहीं किया गया. तब यही दोनों लोग अखबार के सर्वेसर्वा थे. उसके बाद मन उचटने लगा. फिर भी मैंने कहीं हाथ-पांव नहीं मारे. हां, हिंदुस्तान के तत्कालीन संपादक हरि नारायण निगम के कहने पर नियमित वहां खबरें भेजने और छपने लगा. यह एक अलग कहानी है, फिर कभी.
वर्ष 1991 के असम विधानसभा चुनाव के समय मैं जनसत्ता को नियमित रूप से खबरें भेजने लगा. मेरे ऊपर बिठाए गए वह सज्जन भी वहीं खबर भेजने लगे. बाद में वह तो थक गए. लेकिन मैंने जारी रखा और कई खबरें बाइलाइन भी छपी. उसके कुछ समय बाद ही जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रकाशन की चर्चा होने लगी और स्थानीय हिंदी अखबारों के तमाम पत्रकारों में वहां नौकरी पाने की होड़ मच गई.
फिर क्या हुआ….यह अगली कड़ी में.
पिछला भाग…
जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-6) : रिटायरमेंट से 2 साल पहले क्यों छोड़ा जनसत्ता?


