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उत्तर प्रदेश

पत्रकार कौन; प्रयागराज में पप्पू सिंह की निर्मम हत्या के बाद उठा सवाल!

वीरेन्द्र पाठक-

पप्पू की मौत के बाद कुछ तथाकथित लोगों ने पप्पू को मीडिया कर्मी कहने से ही इनकार कर दिया और यह प्रचारित किया कि वह पत्रकार नहीं था। अति श्रेष्ठता (सूपेरियारिटी कांप्लेक्स) में जीने वाले लोगों के लिए यह लिख रहा हूं।

इस विवादित विषय पर लिखने से पहले मैं अपने बारे में स्वयं लिखना चाहता हूं जिससे आप विषय पर मेरे दृष्टिकोण को समझ सके। वर्तमान में मैं मान्यता प्राप्त पत्रकार हूं। एक प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी का प्रयागराज ब्यूरो चीफ हूँ।

मेरी पत्रकारिता की शुरुआत 80 के दशक में हुई थी। 1990 में दैनिक जागरण का रिपोर्टिंग प्रभारी था। निदेशक व प्रबंधन से कम भुगतान से असहमति थी। उनकी टेबल पर बैठकर रिपोर्टिंग करने से तथा स्थाई रूप से नौकरी से मना कर दिया। क्योंकि ईमानदारी से जीने के लिए, काम करने के लिए पैसे चाहिए और प्रबंधतंत्र काम तो पूरा चाहता है लेकिन पैसा नहीं देना चाहता!!! वह अपना 10 बिजनेस चलाएगा, उसके लिए हमको इस्तेमाल भी करेगा किंतु हमसे अपेक्षा सुचिता की है! इसके बाद 6 साल तक वहां काम किया। क्योंकि निदेशक से कहा था, जब तक आपकी इच्छा हो और जब तक मेरी सहमत होगी मैं काम करूंगा। क्योंकि यह मेरी कमी है कि इतने कम पैसे में काम करूं। और कमी है इसलिए सार्वजनिक जीवन में इस बात का विरोध भी नहीं करूंगा। 1997 मैं जागरण से रुखसत हुआ और उसके बाद कभी भी उस परिसर में अपना पैर दाखिल नहीं किया।

उस दौरान भी आज के विषय का कटु अनुभव हुआ। और यह पता लगा कि इस प्रोफेशन में कुछ लोग कितने गंदे हैं। उस समय आज से ज्यादा *पत्रकार, और पत्रकार नहीं है*, पर गोलबंदी थी।

जिस दिन श्रम विभाग का कोई व्यक्ति पड़ताल करने ऑफिस आ जाता, उस दिन प्रबंधन का हर पुर्जा हिल उठाता। और यहीं से पत्रकार और गैर पत्रकार की लड़ाई मेरे अंतर्मन और बाहर दोनों चल पड़ी।

पत्रकार शब्द ही पत्र और काम करने वाले को मिलाकर बना है। लेकिन जब यह शब्द गढ़ा गया था और आज में बहुत सारा पानी गंगा में बह गया। आज पत्रकारिता नहीं मीडिया कर्मी हैं।

1988 के आसपास यह द्वंद्व पत्रकार और गैर पत्रकार की मान्यता का जोर-जोर से था। मेरे साथ ही कुछ जूनियर लड़के अन्य प्रतिष्ठित अखबारों में काम करते थे। लेकिन उनको भी पत्रकार की *स्वीकार्यता* का सुख नहीं था। पत्रकारिता का हर काम हम करते, लेकिन क्या मजाल जो कहीं हमारे नाम के आगे पत्रकार लग जाए! सीनियर नाराज होते थे।

अधिकतर सीनियर गोलोक वासी हो गए हैं, अतः इस संबंध में लिखना ठीक नहीं। गुटबंदी ऐसी थी कि दुनिया में प्रेस क्लब बनता है, यहां के कुछ पत्रकारों ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए न्यूज़ रिपोर्टर क्लब बनाया। प्रेस क्लब बनता तो उस समय सर्वाधिक अखबार में काम करने वाले अमृत प्रभात और पत्रिका के लोगों को भी शामिल करना पड़ता, और वर्चस्व खत्म हो जाता। ऐसे में इस गुट ने रिपोर्टिंग करने वालों का संगठन बनाया। अब नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका और अमृत प्रभात में रिपोर्टिंग करने वाले लोगों की कुल संख्या अन्य अखबारों के ब्यूरो प्रतिनिधियों से कम थी।

मजे की बात थी कि न्यूज़ रिपोर्टर क्लब बनने के बाद कुछ अखबारों का प्रकाशन इलाहाबाद से शुरू हो गया किंतु मलाई खा रहे यह सीनियर अपने जूनियर को पत्रकार के रूप में समाज में प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे! क्योंकि इससे उनकी मठाधीसी खत्म हो जाती। इसलिए वह समान काम के बाद भी पत्रकार की पहचान से महरूम करते थे।

और यहीं से विरोध शुरू हुआ। कालू दा स्मारक क्रिकेट टूर्नामेंट हम लोगों ने शुरू कराया। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई की न्यूज़ रिपोर्टर क्लब की सीढ़ियां सब चढ़ने लगे। एकाधिकार टूट गया। नया चुनाव हुआ। मेरे कंप्यूटर पर अकाउंट बना। कुछ दिन पत्रकारिता का पत्रकारों का अच्छा दिन था। लेकिन अगर किसी संस्थान का गर्भाधान ही गलत हो और कम योग्यता वाले मलाई का दोना पा आ जाएं, तो किसी को देना नहीं चाहते। फिर वही खेल शुरू हुआ पत्रकार है, नहीं है।

लगभग 40 साल बाद आज भी इस सवाल से जूझ रहा हूं कि पत्रकार कौन? क्या बड़े प्रकाशन समूह में एक छोटी सी नौकरी करने वाला ही पत्रकार कहलाए जाने का अधिकारी है? या सरकार जिस व्यक्ति पर ठप्पा लगा दे वही पत्रकार है? या, चौथे स्तंभ के रूप में उसके मानकों के अनुसार सामाजिक सरोकारों को लिए हुए अपने विचार को अलग-अलग मीडियम में रखने वाला व्यक्ति पत्रकार कहलाने लायक है, भले ही वह बड़े प्रकाशन में नौकरी ना करके कुछ अन्य कार्य कर रहा हो?

आज सोशल मीडिया का बोलबाला है। अखबार में छपने से जिन मसलों पर कार्यवाही नहीं होती। सोशल मीडिया में आने के बाद उसे पर कार्यवाही हो जा रही है। कौन ताकतवर है। पप्पू भी एक ऐसा नाम है जिसके अंदर पत्रकारिता का या कहें पत्रकार जैसा सम्मान पाने का जुनून था। ध्यान रखिए पप्पू यहां उदाहरण है लेकिन पप्पू जैसे आपके पास बहुत सारे ऐसे व्यक्ति होंगे इसलिए यह विचार उन सब को समर्पित है।

मुख्य मीडिया में पप्पू सीधे तौर पर नहीं रहे, लेकिन छुआता मीडिया में सदैव जुड़े रहे। बड़े-बड़े चैनल के, स्टोरी बेस (जो खबर चलेगी उसका पैसा मिलेगा) तथा कथित पत्रकार पप्पू से कवरेज कराते रहे। उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई फुटेज चैनलों पर चली। डिश चलाने वाले पप्पू इसी बात से खुश थे कि उनके विजुअल चैनलों पर चल रहे हैं। जो फुटेज का उपयोग करते रहे, वह पत्रकार कहलाए। जिसने मेहनत की वह गैर पत्रकार हो गया ! क्योंकि वह आगे बढ़कर किसी मीडिया समूह से सीधे रूप में नहीं जुड़ पाया। यही कृतघ्न मीडिया कर्मी पप्पू की मौत पर चुप हैं। बल्कि वही सवाल उठाने लगे की पप्पू पत्रकार नहीं था।

मैंने बहुत सारे ऐसे लोग देखे हैं जो किसी बड़े अखबार में काम करके ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करते हैं कि उन्होंने *जग जीत* लिया। जब प्रकाशन समूह ने उन्हें निकाल दिया तो , ढींग हांकते हैं, यहाँ वहाँ,,,,, छोटे पब्लिकेशन में जुड़ जाते हैं।

90 के दशक में भी पत्रकारिता के लिए संघर्ष किया। ऐसे पत्रकारों के लिए भी एकजुट करने की कोशिश की। जो वास्तव में मन से पत्रकार थे। और आज भी यही रुख है कि सामाजिक सरोकार और साहित्यिक अभिरुचि रखने वाला व्यक्ति अगर कहीं भी लिख पढ़ रहा है, तो वह मेरी नजर में पत्रकार है। भले ही पारिवारिक जिम्मेदारी चलाने के लिए कोई भी काम क्यों न कर रहा हो।

2007 में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब का गठन किया। हर साल उसके पदाधिकारी बदल जाते हैं। चुने जाते हैं। सदस्यता सहज है। और पत्रकारिता पर जब भी सवाल हुआ तब हम सब एक साथ खड़े रहे।चाहे छोटा पब्लिकेशन हो या बड़ा। अगर किसी व्यक्ति के अंदर कुछ कमियां भी है तो उसे सुधारने का पत्रकारिता के सिद्धांत समय-समय पर बात कर चलने का आग्रह करता हूं।

कम योग्यता, द्वेष और ईर्ष्या इस पेशे के अधिकतर लोगों में कूट-कूट कर भरी है। प्राय: यह अधिकारियों के यहां बैठे मिल जाएंगे। ट्रांसफर पोस्टिंग इनका मुख्य कार्य होगा, जजमानों के यहां खाना खाते मिल जाएंगे। जब भी मीडिया में कुछ खास लोगों की खबर बड़ी चढ़ी और बार-बार देखे तो समझ ले यह व्यक्ति यजमान है। मीडिया में इस तरह के उदाहरण के लोग कम है। लेकिन माहौल इतना खराब किया है कि दूसरे लोग भी इसी परंपरा पर चलने लगते हैं।

अगर पत्रकार की आज की परिभाषा मान्यता प्राप्त पत्रकार है तो यह समझ लीजिए की 10 प्रतिशत ही लोग पत्रकार कहलाने योग्य हैं। इन 10 प्रतिशत में भी यह आरोप लगाता रहा कि अखबार के मलिक का ड्राइवर, चपरासी भी मान्यता को प्राप्त कर चुके हैं! तो क्या हम सिर्फ ऐसे लोगों को ही पत्रकार स्वीकार करें?

या बड़े मीडिया संस्थानों में काम करने वाले कुछ लोगों को ही पत्रकार माना जाए? या सामाजिक सरोकारों से भरपूर ऐसे उत्साही लोग जो छोटी-छोटी घटनाओं पर भी घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं और सामाजिक सरोकार निभाते हुए उसकी खबर, उसका वीडियो बड़े चैनल के पत्रकारों को देते हैं, सोशल मीडिया पर डालते हैं। जिससे कई बार लोगों को न्याय मिल पाता है?

अनियंत्रित और असामाजिक तत्व भी इस पेशे को बदनाम कर रहे हैं ! मैं इनका समर्थन नहीं करता। लेकिन यह भी जान लीजिए कुछ स्थापित चैनलों में काम करने वाले अपराधी और ब्लैक मेलर मानसिकता के लोग माफिया से गाजोड़ कर पत्रकारिता की आड़ में पूरी मीडिया को बदनाम करते हैं।

आप अपने दिमाग से यह भी निकाल दें कि इस तरह का काम स्थानीय व्यक्ति ही कर रहा है ! इस खेल में मीडिया को संचालित करने वाले लोग भी शामिल है। लगभग 10 साल पहले अनजाने में एक जिलाधिकारी ने मुझे कुछ ऐसी बात बताई कि मेरा सिर शर्म से झुक गया कि मैं एक व्यक्ति को कितना अच्छा समझ रहा था! जिलाधिकारी ही अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहा था कि वह रिपोर्टर और उसका बॉस उसे ब्लैकमेल कर रहा है ?

अतीक अहमद माफिया था, जरा पता करिए कौन-कौन पत्रकार उससे हर माह कितना उपकृत होता रहा ! उसके द्वारा दान की हुई संपत्ति का कौन उपयोग कर रहा है । पत्रकार कहना आसान है, और पत्रकारिता के सिद्धांत पर चलना बड़ा कठिन है। अब आप पर यह छोड़ता हूं कि आप किसे पत्रकार माने या ना माने।

हां मैं साफ सुथरा काम करने वाले , सामाजिक सरोकार को प्राथमिकता देने वाले को ही पत्रकार मानता हूं, मानता रहूंगा। मेरे लिए पत्रकारिता का धर्म निभाने वाला गांव का छोटा से छोटा पत्रकार भी पत्रकार है।

मूल खबर…

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