मनीष आजाद-
मऊ की जेल में किसी ने चद्दर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। नतीजा यह हुआ कि लखनऊ जेल में अभियान लिया गया और चद्दर, गमछा, हल्के ओढ़ने वाले शाल और यहां तक कि लंगोट भी जब्त कर लिए गए। इसके विकल्प में उन्हें कुछ नहीं दिया गया। अब गमछा, चद्दर, पतली शाल जैसी चीजें (जिन्हें गले में लपेटा जा सकता है) अवैध हो गई। कोई भी कैदी अगर इन्हें इस्तेमाल करता पाया जाएगा तो उसे जब्त कर लिया जाएगा और उसकी पिटाई भी हो सकती है।
जब मैं जेल में था तो कैदी अदालत से भी खाने-पीने, पहनने का सामान लेकर आते थे। सामान्य चेकिंग के बाद उन्हें ले जाने दिया जाता था। परिवार जनो के लिए भी अदालत में कैदी को सामान देना आसान होता था। नहीं तो यही सामान देने के लिए उसे शहर से 15-20 किलोमीटर दूर जेल जाकर जटिल प्रक्रिया से गुजरकर अपना पूरा दिन बर्बाद करना पड़ता था।
लेकिन जेल प्रशासन की किसी सनक के कारण अदालत से कोई भी सामान अब जेल नहीं ले जाया जा सकता। कल मैंने कोर्ट में राजनीतिक बंदी बिंदा को जेल में बंद अन्य राजनीतिक बंदियों के लिए जाड़े के पहनने वाले कुछ कपड़े दिए।
उसने वो सभी कपड़े उसके साथ अदालत आए अपने साथी कैदियों को पहना दिए। किसी ने सलवार के ऊपर लोअर पहन लिया तो किसी ने स्वेटर के ऊपर लोअर। किसी ने डबल स्वेटर पहना तो किसी को डबल कुलही लगानी पड़ी। और इस तरह ये कपड़े जेल के अंदर जा पाए।
बाद में जेल से फोन पर बिंदा ने हंसते हुए बताया कि सभी कैदी बिना नाप के अतिरिक्त कपड़े पहनकर एकदम कार्टून लग रहे थे और जेल में चेकिंग के दौरान सबका हंस हंस कर बुरा हाल था।
फोन पर बिंदा की बेबाक हंसी सुनकर मुझे ख्याल आया कि नाजी कैंपों में भी चुटकुले बनते थे, हास्य पैदा होता था। आखिर इंसान की बुनियादी विशेषता तो उसकी यही जीजिविषा ही है।
हर हाल में जीने की और कभी न पराजित होने की। जेल भी इस जिजिविषा को खत्म नहीं कर सकता।

तस्वीर में- बिन्दा और कृपाशंकर (जो इस वक्त uapa की कड़ी धाराओं के तहत में जेल में बंद हैं)


