अजीत अंजुम-
यूट्यूब की दुनिया में मोदी सरकार डेढ़ साल में डेढ़ सौ बार गिर चुकी है. नीतीश कई बार तेजस्वी के साथ सरकार बना चुके हैं. नायडू दर्जनों बार मोदी सरकार समर्थन वापस ले चुके हैं. अमित शाह जेल जाने वाले हैं. मोदी झोला उठाकर किसी भी दिन निकलने वाले हैं.
कई रात कत्ल की रात साबित हो चुकी है. अजित डोभाल की नौकरी दर्जनों बार जा चुकी है. गडकरी कई बार पीएम बन चुके हैं. भागवत मोदी को फटकारकर कई बार पैदल कर चुके हैं. योगी और शाह में अनगिनत बार पानीपत की लड़ाई से भी भयंकर लड़ाई हो चुकी है. इत्यादि… इत्यादि… इत्यादि…
नरेंद्र नाथ मिश्रा-
दुखद है इनका भी ऐसा हो जाना होना।
हर दिन सुबह उठते हैं, दोपहर तक सरकार गिरा देते हैं। शाम को फिर माहौल बनाकर अगले दिन फिर सरकार गिराने की तैयारी कर लेते हैं।
एक सशक्त अल्टरनेटिव मीडियम को इनसे भी बचने की जरूरत है। और ऐसा करने की जिम्मेदारी दर्शकों की भी है।
संकेत उपाध्याय-
यूट्यूब में भी टीवी जैसी बैड फिश हैं। वही छिछुरई। कहीं कहीं उससे भी ज़्यादा और अमर्यादित। रोज़ सरकार गिर रही होती है। रोज़ होश उड़ रहे होते हैं। कुछ लोगों की बेवक़ूफ़ियों और एल्गोरिदम के लालच की वजह से रेगुलेशन जैसी बातें उठने लगती हैं। संगठित होकर इसके विरुद्ध बोलना चाहिए।
प्रकाश के रे-
मैं प्रसून जी के प्रवचनों को दुखद या सुखद नहीं मानता हूँ. उनको मैं एक बुलंद आवाज़ और हौसला समझता हूँ. मोदी सरकार से कथित रूप से प्रभावित और परेशान लोगों को वे हर दिन उत्साह से भर देते हैं, जबकि बाक़ी सब बकासुर निराशा बाँटते रहते हैं.
लगे रहिए पुण्य प्रसून जी. बंद घड़ी भी दो बार सही वक़्त बताती है. एक बार आपका रॉकेट साइंस भी काम करेगा.

जब तक ‘प्रोड्यूसर’ लिखकर देता रहा। TP पर सब मिलता रहा। दाल चावल के दाम और महंगाई के बढ़िया ग्राफिक्स मिलते रहे। प्लेट सजी हुई मिलती रही तब तक वो हाथ मसल-मसल कर वाहवाही लूटते रहे। जबसे ‘प्रोड्यूसर’ से जुदा हुए हैं तभी से एक्सपोज हो गए हैं। कंटेंट के नाम पर अब उनके पास सिर्फ 2-4 लाइन ही बची हैं
-आज कुछ बड़ा होने वाला?
-भूचाल तो नहीं आ जाएगा?
-सरकार गिरने वाली है?
-घबराए हुए हैं भागवत?
-हैरान रह जाएंगे मोदी-शाह?-श्याम त्यागी



