सत्येंद्र पी.एस-
लोकसभा चुनाव का अंतिम चरण है। यह पहला चुनाव है जब मैने इलेक्शन पर कहीं कुछ नहीं लिखा। लिखने का मन ही नहीं किया। अब यह सब जितनी चीज़ें हैं, मोह माया लगती हैं। इनसे मनुष्य जीवन शांत, सुखमय नहीं हो सकता। और आजकल मैं इस पर विचार कर रहा हूँ कि उत्तर कोरिया के उस पागल राष्ट्रपति की तरह कोई न हो, जो दक्षिण कोरिया पर कूड़ा भरा बैलून उड़ाए। रूस में कोई पुतिन जैसा न हो जो अपने ही देश का हिस्सा रहे यूक्रेन के नागरिकों पर बम पाट दे। अगर ऐसा हो रहा है तो क्यों हो रहा है और इन स्थितियों को हम कैसे बदल सकते हैं!
खैर…पूर्वी यूपी को लेकर कुछ न कुछ लिखना बनता है। चुनाव में यहां मुद्दा यह है कि इस महंगाई में घर का खर्च कैसे चले? 20 साल की उम्र में पहली बार वोटर बने लौंडे अब अच्छे दिन का इंतजार करते 30 साल के हो गए हैं, उनको डिलीवरी ब्वॉय, बीमा एजेंट, कॉल ब्याय की नौकरी मिल रही है जिसमें 10 से 15 हजार रुपये मिलते हैं। सरकारी नौकरी ठेके पर हो गई है, अस्पताल से लेकर स्कूल तक। प्लेसमेंट एजेंसी वाले 10 हजार रुपये महीने देते हैं और 12 घण्टे काम करना होता है। गांव में लड़के सुबह सबेरे दौड़ लगाकर सिपाही और फौज में भर्ती होते थे। सिपाही का काम सिन्हा जी की सिक्योरिटी एजेंसी चला रही है, सेना में 3 साल के ठेके पर 20 हजार महीने की नौकरी!
संविधान ने जो सामाजिक सुरक्षा दी थी, वह खत्म कर दी गई। सारा पैसा बड़का सेठों को चला गया और वो सेठ व उनके टॉप के चमचे कारों की सेल बढ़ाए हुए हैं जिनको विकास बताया जा रहा है। मिडिल कास्ट/क्लास वाले ठेका पट्टी, रेस्टोरेंट, दुकान, छोटी छोटी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाकर अच्छे से रोजी रोटी चलाते थे, उनको बत्ती लगी हुई है। कांग्रेस के टाइम लोग अधिकारों की बात करते थे कि कम टैक्स लिया जाए, अब भाजपा सरकार लोगों को कर्तव्य बताती है कि बिजली का पैसा दो पानी का पैसा दो, बैंक से पैसा निकालने का पैसा दो, होटल में खाने पर जीएसटी दो, सब्सिडी मत लो। यानी खुद भिखारी बन जाओ, यह राष्ट्रवाद है।
तो अब लोग ही लड़ रहे हैं, विपक्ष नहीं लड़ रहा है। विपक्ष के लिए तो बस बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा टाइप है, उसने अच्छे कैंडिडेट दे दिए कि जनता के बीच जाओ और चुनाव लड़ो। और वह लड़ रहे हैं, जनता के साथ खड़े हैं।
मैं फिर वही बात कहूँ तो फालतू की बात है। लेकिन उत्तर प्रदेश में इस चरण में जो चुनाव हो रहे हैं, बांसगांव, महराजगंज, देवरिया, पड़रौना, मऊ, आजमगढ़, गाजीपुर, वगैरा में कहीं एकतरफा मामला नहीं है। और यहां तक कि बनारस गोरखपुर में से भी एक सीट भाजपा के हाथ से छटक जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। महराजगंज में वीरेंद्र चौधरी, बांसगांव में सदल प्रसाद को धक्का मारकर दिल्ली पहुँचाइये।
देवरिया की जनता अभी भी वहां के कांडों को नहीं भूली है कि किस तरीके से विधानसभा चुनाव बाद सपा प्रत्याशी को न सिर्फ जातीय गालियां दी गईं बल्कि प्रशासन से लुक आउट जारी करा दिया गया। उस यादव सिपाही के परिवार और नन्हे मुन्ने बच्चे की फैमिली सड़क पर आ गई थी, पूरा परिवार दहशत में था। वह विधवा बोल रही थी कि सरकार बुलडोजर चलवाए, हमको भी उसी बुलडोजर के नीचे मर जाना है। लोग मैसेज करते थे, उस फेमिली का वीडियो भेजते थे कि भैया जिस घर को महल बताया जा रहा है, उसमें प्लास्टर तक नहीं हुआ है कमरों में। आप लोग कुछ कीजिए।
यह सरकार लोगों ने देखी है अभी दो साल पहले। इन सबों ने देवरिया पड़रौना के बाभनो का नाम भी खराब कर दिया, जहां उनकी इतनी इज्जत थी कि कम से कम बाभनो को लोग अच्छा शांतिप्रिय और सबसे मिल जुलकर रहने वाला मानते थे। अब देवरिया।पड़रौना के आम ब्राह्मण को भी इनकी करनी और इनके कांडों के चलते अपराधी के रूप में देखा जा रहा है, जबकि न तो उनको कुछ मिला है, न उनका जीवन स्तर सुधरा। उनको ठेके की नौकरी में पेट भरना और भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि उनको न 5 किलो राशन मिल रहा है न आयुष्मान मिल रहा है क्योंकि उनके पास थोड़ा बहुत खेत है, घर मे पेंशनर हैं!
जनता इतनी जल्दी चीजों को भूलती नहीं है। सरकार में बैठे लोग भले ही कुछ देर के लिए अपने को महामानव समझ लेते हैं कि अब तो अपुन ही भगवान है।
यूपी में रिजल्ट एकतरफा ही रहेगा।
और मेरा अनुमान गलत हुआ तब घण्टा कुछ नहीं होने वाला है मेरा। ऐसे ही फेसबुक पर लिखता रहूंगा और जो भक्त लोग हैं, वह ऐसे ही मेरी पोस्ट पर गिनगिनाते रहेंगे। अपन विपरीत परिस्थिति में जीने का आदती है! लोग गर्मी में शिकंजी पीते हैं अपन पकौड़े तलकर खाता है। लोग गर्मी में बीयर व्हिस्की पीते हैं, अपन को सस्ते रम से भी दिक्कत नहीं होती। 52 डिग्री तापमान का कोई असर नहीं होता।


