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आज के अखबार : राहुल गांधी के आरोप और चुनाव आयोग का खंडन छापने या नहीं छापने की ‘पत्रकारिता’

संजय कुमार सिंह

पत्रकारिता का भक्ति काल रोज शर्मिन्दगी का एक न एक उदाहरण देता ही है। कल चुनाव आयोग की विज्ञप्ति को लीड बनाने का मामला था और आज चुनाव आयोग का खंडन छापने या नहीं छापने की पत्रकारिता रेखांकित करने लायक है। 50 दिन में सपनों का भारत बनाने और 100 दिन में काला धन वापस लाने का प्रचार करने और फिर मुकर जाने या तमाम घोषणाओं को जुमला और उनपर स्पष्टीकरण देने वाली सरकार नोटबंदी जैसी ‘जरूरत’ और 370 हटाने जैसी ‘घोषणाओं’ से निपटने के बाद अब ‘काम’ कर रही है। यह काम वैसे ही है जैसे लोकसभा चुनाव से पहले पांच भारत रत्न की घोषणा कर दी गई थी। यह गलत भले न हो और कार्यशैली तो हो ही सकती है कि चुनाव से पहले ही कुछ ‘काम’ याद आते हैं। उसकी घोषणा होती है और प्रचार किया जाता है। उदाहरण के लिए आज अमर उजाला में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, “हर गांव में होगी सहकारी संस्था, 2034 तक 50 करोड़ लोगों को रोजगार : शाह”। उपशीर्षक है, “नई सहकारिता नीति : सहकारी क्षेत्र में 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की क्षमता। 70 साल कुछ नहीं हुआ का रोना रोने वाले प्रधानमंत्री और उनकी सरकार 2047 के भारत के प्रचार में लगी हुई है। इसके लिए इंडिया @100 किताब लिखा जाना और एक सरकारी बैंक द्वारा उसकी 10 हजार प्रतियां खरीदने का ऑर्डर दिया जाना भी बड़ी खबर है। पता नहीं आप जानते हैं कि नहीं, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने प्रकाशित होने से पहले ही इसकी करीब दो लाख प्रतियों खरीदने का फैसला कर लिया था। इन किताबों की कीमत 7.25 करोड़ रुपये थी। यह किताब भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यन ने लिखी है। भारत सरकार ने उन्हें आईएमएफ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के पद से हटाया तो यह राज खुला।

यह सब मुझे दिख जाता है, याद रहता है, समझ में आता है पर संपादकों को नहीं दिखता है और दिखता भी हो तो वे ईमानदार या निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं कर पाते हैं। आज प्रचार और कार्यशैली से संबंधित खबरों को छोड़ दूं तो दो खबरें ध्यान खींचने वाली हैं। पहली, राहुल बोले – धोखाधड़ी के 100% सबूत, ईसी का खंडन। यह खबर आज नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर चार कॉलम में छपी है। इसके अलावा, मेरे नौ अखबारों में यह खबर दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है। अंग्रेजी में शीर्षक भी लगभग यही है। देशबन्धु में यह पूरा मामला खबर की तरह छपा है और चुनाव आयोग का जवाब नहीं है। राहुल गांधी ने कहा है कि उनके पास धोखाधड़ी के 100 प्रतिशत पक्के सबूत हैं तो नवोदय टाइम्स ने लिखा है, ईसी का खंडन। दूसरे शब्दों में इसका मतलब हुआ – हो नहीं नहीं सकता। पर सबूत क्या है जाने बिना यह कैसे कहा जा सकता है। खासकर तब जब हम जानते हैं कि चुनाव आयोग मांगने पर भी कांग्रेस को मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची नहीं दे रहा है। दूसरी ओर, राहुल गांधी के आरोपों और सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध तथ्यों से यह स्थापित हो चुका है कि राहुल गांधी या उनकी पार्टी इसपर गंभीरता से काम कर रही है और चुनाव आयोग (सरकार कहना चाहिये) बचने के लिए कानून तक बदलने को मजबूर है। ऐसे में चुनाव आयोग के खंडन का मतलब यह भी हो सकता है, जब हमने दिये नहीं हैं तो होने का दावा कैसे किया जा सकता है। दूसरी ओर, तथ्य यह है कि चुनाव आयोग, उसके समर्थकों, प्रचारकों और संभवतः सरकार की ओर से भी कहा जा चुका है कि चुनाव के समय मतदाता सूची सबको दी जाती है, काफी कुछ इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है तो चुनाव आयोग से मांगने का क्या मतलब? बाद में राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि वे मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची की मांग कर रहे हैं जो चुनाव आयोग ही दे सकता है और डिजिटल इंडिया में नहीं दे रहा है। उधर पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची के मामले में साबित हो चुका है कि एपिक नंबर हरियाणा के थे। ऐसे में ईसी के इस खंडन का कोई मतलब नहीं है।

अमृतकाल या कंगना रनौत को बताई आजादी मिलने से पहले ऐसी स्थिति में खबर नहीं छपती थी और खंडन करने का मकसद यही होता था। चुनाव आयोग के इस खंडन का भी यही असर हुआ है। आज यह खबर मेरे बाकी छह अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। होती तो वैसे भी नहीं लेकिन खंडन जारी होने से राहुल गांधी के आरोपों को प्रमुखता नहीं देने का बहाना मिल गया और यह हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग लगता है। मैंने कल राहुल गांधी का आरोप सुनने के बाद ही तय कर लिया था कि यह खबर पहले पन्ने लायक है और देखना है कि खबर छपती है या नहीं। मुझे चुनाव आयोग के खंडन की जानकारी नहीं थी फिर भी पहले पन्ने पर होने की उम्मीद नहीं थी। देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर है, चुनाव आयोग के खंडन के बावजूद है और अखबार ने खंडन को नहीं छापा है। आप समझ सकते हैं कि इन दिनों पत्रकारिता कहां-कहां गड़बड़ है। आइये, अब देशबन्धु की प्रस्तुति देखें। यहां खबर की प्रस्तुति ऐसी है कि चुनाव आयोग के खंडन की जरूरत ही नहीं थी। चार कॉलम की इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, राहुल गांधी ने चुनाव आयोग ने फिर घेरा। मुख्य शीर्षक है, लोकतंत्र की हत्या बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसमें एक खबर और है, संसद में एसआईआर को लेकर हंगामा जारी। इस खबर के साथ दो बुलेट प्वाइंट हाइलाइट किये गये हैं। इनमें एक है, बिहार से कर्नाटक तक वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और दूसरा, कांग्रेस नेता ने कहा, हमारे पास सबूत, छोड़ेंगे नहीं। दि एशियन एज में एक कॉलम की इस खबर का शीर्षक चार लाइनों में है और हिन्दी में होता तो कुछ इस तरह होता, “चुनाव आयोग चीटिंग (चोरी) ‘होने दे रहा है’ : राहुल; चुनाव आयोग ने कहा ‘निराधार’ दावा”। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग ने अपने बचाव में जो सब किया है उसी से राहुल गांधी के आरोपों में दम लगता है और चुनाव आयोग के खंडन से डर या घबराहट की बू आती है पर खबरों से पता नहीं चलता है। आज की दूसरी खबर, “….2034 तक 50 करोड़ लोगों को रोजगार” अमर उजाला में है। इसके बारे में पहले ही लिख चुका हूं।         

चुनाव आयोग पर राहुल गांधी का आरोप और उसका खंडन तथा आज इस खबर का प्रमुखता से नहीं छपना बताता है कि महाराष्ट्र में वोट की चोरी पर हमारा मीडिया कितना गंभीर है। आप जानते हैं कि महाराष्ट्र की सरकार कैसे गिराई गई और क्यों गिराई गई। अभी उसके विस्तार में गये बगैर बता दूं कि जिन कारणों से महाराष्ट्र की पिछली सरकार गिराई गई उन्हीं कारणों से और गिराने के तरीकों पर चर्चा या कार्रवाई आदि से बचने के लिए भी जरूरी था कि महाराष्ट्र में चुनाव के बाद भी भाजपा की सरकार बने और उसके लिए क्या सब किया गया वह राहुल गांधी के आरोपों से स्पष्ट है। दूसरी ओर, भाजपा को जिताने की कोशिश में नए चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में बिहार में चुनाव आयोग को लगा दिया गया है। एसआईआर की गड़बड़ियां खबर नहीं रही और अब तो संसद में हंगामा तथा संसद नहीं चलना और लगातार कई दिनों तक नहीं चलना भी पहले पन्ने की खबर नहीं बन रही है। प्रधानमंत्री ऐन मौके पर विदेश निकल गये तब भी। हालांकि विदेशी दौरे की खबरें, उसका प्रचार सब है. संसद की कार्यवाही उसके मुकाबले बहुत कम। ऐसे में आज ईडी ने अनिल अंबानी के परिसरों की तलाशी ली और मुंबई विस्फोट से संबंधित मुंबई हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया – दो बड़ी खबरें हैं।

व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी का पाठ्यक्रम

सुप्रीम कोर्ट वाली खबर को तो कल से प्रचारकों ने व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी का पाठ्यक्रम भी बना रखा है। कारण समझना मुश्किल नहीं है पर वह मुद्दा नहीं है और अब यह नई बात भी नहीं रह गई। मुझे याद आता है कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में उस समय के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पहले ही कह दिया था कि फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी जायेगी। दूसरी ओर, मालेगांव ब्लास्ट का भी मामला है जिसका फैसला आया ही नहीं रहा है और खास तरह के नाम वाले अभियुक्तों को मिले लड्डुओं की ढेरों कहानी है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की मूल खबर के साथ आरोपियों के बयान की भी एक खबर है, ‘फिर लड़ेंगे और जीतेंगे’। पर सरकार से मुकदमा लड़ना कितना थकाऊ, ऊबाऊ और हताश करने वाला है इसका अंदाजा हो तो समझा जा सकता है कि जो फंसते हैं कितना परेशान किये जाते हैं। अगर वह परिवार का मुखिया हुआ तो परिवार और खासकर बच्चों को बिना बात सजा मिलती है। वे अच्छी शिक्षा से वंचित रहते हैं और वकीलों की फीस भले न लगती हो पर कमाने वालों के बिना परिवार कैसे चलता होगा यह तो समझा ही जा सकता है। ऐसे अभियुक्तों को निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ना और जीतना या हार भी जाने पर यह माने लेना कि वह दोषी है, असल में आर्थिक ताकत की लड़ाई हारना है। काश, सरकार ने आम नागरिकों के लिए इस दिशा में कुछ किया होता। उल्टे इस सरकार ने ज्यादा लोगों को फंसाया है। भले ही यह दिखाया और समझाया जा रहा है कि वे दूसरे धर्म के हैं, सच्चाई तो यही है कि खराब न्याय व्यवस्था का खामियाजा पूरा समाज भुगतता है।

निजी बैंक के लिए अनिल अंबानी पर ईडी का छापा

अनिल अंबानी के परिसरों पर छापे की खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, “बैंक लोन ‘फ्रॉड’ (की) जांच ईडी ने अनिल अंबानी से जुड़े लोकेशन की तलाशी ली”। शीर्षक में ‘फ्रॉड’ बता रहा है कि मामला साधारण नहीं है। खबर में बताया गया है कि बैंक के जिस कर्ज से संबंधित यह कार्रवाई हो रही है वह 2017 और 2019 में दिया गया था। अभी यह भी जांच की जा रही है कि बैंक से कर्ज लेने के लिए अधिकारियों को रिश्वत दी गई थी कि नहीं। दिलचस्प यह है कि संबंधित बैंक सरकारी नहीं है और एफआईआर सीबीआई की है। कायदे से अगर निजी बैंक को ठग गया हो या उसका पैसा वापस नहीं आ रहा हो तो बैंक पुलिस को शिकायत करेगा और त पुलिस जांच कर सकती है लेकिन निजी बैंक के मामले में सीबीआई की एफआईआर वैसे ही है जैसे एनडीटीवी के खिलाफ जो मामला था वह आईसीआईसीआई बैंक का था और जब जांच चल रही थी तब भी कहा गया था कि आईसीआईसीआई बैंक के पैसों के लिए सरकारी एजेसियां क्यों परेशान हैं। ठीक है कि पैसा सब जनता का ही होता है और सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि किसी को ठगा लूटा नहीं जाये पर प्राथमिकतायें तो सरकार ही तय करेगी और इसमें गड़बड़ का मकसद दिख रहा है। कहा जाता है कि जिन कंपनियों की जांच हुई उन्हें (उनमें से कइयों को) बाद में अदाणी ने खरीद लिया। एनडीटीवी जैसे मीडिया संस्थान के साथ यही हुआ है। ऐसे में छोटे अंबानी का मामला वैसा न भी हो तो पुराना है ही और सरकारी एजेंसियों की जांच के लिहाज से सामान्य नहीं है। मुझे लगता है कि यह सब खबर, शीर्षक या उपशीर्षक में बताया जाये, जरूरी हो तो अलग से हाईलाइट किया जाना चाहिये ताकि इनसे हो सकने वाला प्रचार भी न हो। रॉर्ट वाड्रा का मामला भी ऐसा ही है। अगर उसकी इन खासियतों को खबर में हाईलाइट किया जाये तो रॉबर्ट वाड्रा की बदनामी नहीं होगी, सरकार को अनुचित लाभ नहीं मिलेगा संदेश यह नहीं जायेगा कि सरकार बड़ी ईमानदार है किसी को नहीं छोड़ती है। सच्चाई यही है कि सरकार विरोधियों को नहीं छोड़ती है बाकी के लिए वाशिंग मशीन है और इस तरह परेशान करने का मकसद समझौते के लिए मजबूर करना भी हो सकता है। अधिकारियों से जबरन करवाया जाता हो या नहीं, अरविन्द केजरीवाल और हेमंत सोरन को गिरफ्तार करने वाले अधिकरी नौकरी छोड़ चुके हैं। अब तो खबर है कि प्रधानमंत्री को उपराष्ट्रपति का काम पसंद नहीं आया तो उन्हें भी नौकरी छोड़नी पड़ी या इस्तीफा देना पड़ा। हिन्दुस्तान टाइम्स में टॉप की खबर बताती है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई होगी। आप जानते हैं कि केंद्र सरकार उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होते ही घायल हो चुकी है और दूसरी ओर यह सुनवाई है। देखना है कि होता क्या है।

संविधान में समाजवादऔर पंथनिरपेक्ष

द हिन्दू में आज एक खबर बड़ी सी छपी है। कानून मंत्री की फोटो के साथ चार कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक है – कानून मंत्री ने राज्य सभा में कहा, संविधान से ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की योजना नहीं है।  हालांकि, सरकार ने यह भी कहा है कि, सुप्रीम कोर्ट भी इन संशोधनों को वैध करार दे चुका है। आप समझ सकते हैं कि इस घोषणा को इस समय इतनी प्रमुखता से छापने का मकसद या मजबूरी क्या हो सकती है। मैं सिर्फ खबर और उसे मिली प्रमुखता को रेखांकित कर रहा हूं क्योंकि यह असामान्य है। सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्यसभा में इस संबंध में सवाल किया था। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को लिखित जवाब में बताया कि ‘सरकार का आधिकारिक रुख यह है कि संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों पर पुनर्विचार करने या उन्हें हटाने की कोई योजना या मंशा नहीं है। प्रस्तावना में संशोधनों के संबंध में किसी भी चर्चा के लिए गहन विचार-विमर्श और व्यापक सहमति की जरूरत होगी, लेकिन अभी तक सरकार ने इन प्रावधानों को बदलने के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं की है।’   

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