
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों की एक ही लीड है, अमेरिका ने एच-1बी वीजा की कीमत बढ़ाई। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फ्रेंड, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐसा किया है। आप कह सकते हैं कि अमेरिका ने अपने वीजा की कीमत बढ़ाई हमें क्या? हमें कौन सा अमेरिका जाना है या वीजा महंगा है तो नहीं जाएंगे। इंग्लैंड घूम आएंगे। आदि, आदि। लेकिन मामला इतना ही नहीं है। अमेरिका का एच-1बी वीजा लेने वालों में 71 प्रतिशत भारतीय हैं और इस वीजा के महंगे होने से अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिका में भारतीय मजदूरों (आप सॉफ्टवेयर इंजीनियर या डॉक्टर भी समझ सकते हैं) से काम कराना महंगा हो जाएगा और यह ट्रम्प की अपनी राजनीति है। असल में अमेरिका वालों का कहना है कि भारत के लोग (हमारी प्रतिभायें) वहां सस्ते में काम करते हैं इसलिए वहां के लोगों को कम पैसे मिलते हैं। यह सही भी हो तो अमेरिका में भारतीयों को नौकरी मिली हुई है और इनमें से बहुत लोग यहां अपने घर पैसे भेजते है जिससे यहां उनके मां-बाप का खर्च चलता है और इस खर्च का भारतीय अर्थव्यवस्था में अच्छा-खासा योगदान है। इस वीजा की कीमत बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय मजदूरों या इंजीनियरों से काम करवाना महंगा हो जायेगा और जाहिर है सस्ता मजदूर ढूंढ़ने वाले भारतीयों को नौकरी नहीं देंगे या भारतीयों को कम पैसों में काम करना पड़ेगा। जो भी हो, इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे पहले अमेरिकी टैरिफ बढ़ाकर अमेरिका ने अपने यहां भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ा दी है। यह लागू रह पायेगा कि नहीं, इससे अमेरिका को नुकसान होगा या नहीं और नुकसान होगा तो अमेरिका को ज्यादा या भारत को – अलग मुद्दे हैं। संभव है वहां की अदालत इसे (या वीजा मूल्य और टैरिफ दोनों को) खारिज कर दे। लेकिन सच्चाई यह भी कि इसे ट्रम्प सरकार ने लागू किया है और हमारे प्रधानमंत्री न सिर्फ अबकी बार ट्रम्प सरकार का नारा लगवा चुके हैं उन्हें अपना फ्रेंड भी कहते हैं।
आप जानते हैं कि हाल में कुट्टी भी नहीं हुई तो चीन के पाले में चले गये और भारतीय मीडिया ने मोदी को महान बनाने-बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब ट्रम्प फिर दोस्ती की कहानी सुना रहे थे लेकिन यह नया कारनामा भी कर दिया। प्रधानमंत्री जब युद्ध विराम कराने के दावे पर, उसे कई बार दोहराने पर भी नहीं बोले तो इस पर जब बोलेंगे तो देखा जायेगा अभी तो उसका समय भी नहीं आया है। टैरिफ के नुकसान से बचने के लिए स्वदेशी का राग अलापने लगे हैं और मीडिया उनका बचाव करने में लगा है। हर तरह से। यह सब काफी समय से चल रहा है। आपको पता हो न हो, नई बात नहीं है। नई बात यह है कि राहुल गांधी ने दोबारा कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री कमजोर हैं। इससे पहले 5 जुलाई 2017 को भी राहुल गांधी ने यही बात कही थी। अब उन्होंने कहा है – मैं दोहराता हूं, भारत के प्रधानमंत्री कमजोर हैं। उनकी दोनों पोस्ट एक्स के उनके हैंडल पर पिन की हुई है यानी जो कोई भी उनकी पोस्ट देखने उनकी वाल पर जायेगा, ये वाली पोस्ट जरूर दिखेगी। हमेशा सबसे ऊपर रहेगी। मुझे यह बताना है कि भारत की बेशर्म मीडिया ने इसे भी, आज भी पहले पन्ने पर नहीं छापा है या हल्के में निपटा दिया है। मैं अपने नौ अखबारों की बात करूं तो देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर है। देशबन्धु ने राहुल गांधी के साथ मल्लिकार्जुन करगे को भी छापा है। उन्होंने कहा है, मोदी-मोदी के नारे लगवाना विदेश नीति नहीं है।
टैरिफ पर ‘स्वदेशी’, एच-1बी वीजा पर ‘आत्मनिर्भर’
आधिकारिक तौर पर भारत ने कहा है कि इससे मानवीय समस्याएं पैदा होने की संभावना है। यह घटिया अनुवाद का नमूना है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार, भारत ने अमेरिका के इस कदम पर यह कहते हुए सतर्क प्रतिक्रिया दी है कि इससे परिवारों के लिए मुश्किलें आएंगी और लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। भारत ने यह उम्मीद भी जताई है कि अमेरिकी अधिकारी इन मुश्किलों को उपयुक्त ढंग से दूर कर सकते हैं। कुल मिलाकर, उन्हें समय देने का बहाना है और लगता है जैसे भारत इंतजार करेगा, ‘… तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना’। हालांकि, दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री के हवाले से आत्मनिर्भर होने की जरूरत को ऐसे पेश किया है जैसे बस हम आत्म निर्भर हुए और समस्या खत्म। यह खास मोदी शैली है जिसपर राहुल गांधी की सटीक प्रतिक्रिया, वह भी दूसरी बार अखबारों में कायदे से नहीं छपी। 5 जुलाई 2017 को राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला करते हुए ट्विटर पर लिखा था, “India has a weak PM” (भारत के प्रधानमंत्री कमजोर हैं)। इसके साथ दो खबरें थीं। एक तो यह कि मोदी ट्रम्प वार्ता में मोदी ने एच‑1बी वीज़ा का मुद्दा नहीं उठाया। दूसरा, एक अमेरिकी दस्तावेज़ में ‘भारत अधिकृत जम्मू-कश्मीर’ शब्द का इस्तेमाल हुआ था। इस खबर में कहा गया था कि विदेश मंत्रालय ने इस तरह के अमेरिकी दस्तावेज़ या बयान को स्वीकार किया है, लेकिन बाद में सरकार ने सफाई दी थी कि “भारत अधिकृत जम्मू-कश्मीर” जैसी भाषा का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि यह वाक्यांश कभी-कभार अन्य देशों या मीडिया रपटों में होता है, न कि भारत की आधिकारिक नीति में कोई बदलाव आया है। आप जानते हैं कि देश के प्रधानमंत्री का विदेश दौरा काफी महंगा पड़ता है और इसीलिये होता है कि वे देश हित में काम करेंगे। पर देश हित तो छोड़िये प्रचार यह किया जाता है कि वे रात में विमान में रहते हैं ताकि होटल का पैसा बचे। दूसरी ओर, खबरें आती हैं प्रचार करने और नारे लगाने के लिए हजारों लोग सरकारी खर्च पर बुलाये गये। ऐसी खबरें भारतीय मीडिया तो नहीं ही देता है। इधर उधर से जब चर्चा शुरू होती है तो फॉलो भी नहीं करता। सरकार और सरकारी एजेंसियां इनका फैक्ट चेक भी नहीं करतीं जैसे चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों का किया या मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कांफ्रेंस करके राहुल गांधी के आरोपों को गलत बताया। कुल मिलाकर, मीडिया देश के साथ दगा कर रहा है पर यह आरोप राहुल गांधी पर लगाया जाता है और सरकारी मीडिया के लोग इसे दोहराते भी हैं। पर अभी वह मुद्दा नहीं है।
भारतीय अखबारों में आज इस मामले में जो खबरें होनी चाहिये वह हिन्दी में नवोदय टाइम्स में कायदे से है। कहने की जरूरत नहीं है कि खबरें दो तरह से लिखी और छापी जा सकती हैं। पहली अपने पाठकों को सूचना देने के लिए और दूसरी सरकार या आका को खुश करने के लिए। बाकी खबरों के बारे में आप तय कीजिये, मैं यही कहूंगा कि पाठकों को जो बताया जाना चाहिये वह नवोदय टाइम्स में है और इसमें आवश्यक राजनीति भी है। खबरों के अनुसार, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस कदम के ‘समग्र प्रभावों’ का अध्ययन सभी संबंधित पक्षों द्वारा किया जा रहा है, जिसमें भारतीय उद्योग जगत भी शामिल है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका, दोनों के उद्योगों की ‘नवाचार और रचनात्मकता में हिस्सेदारी है और उनसे आगे के सर्वोत्तम मार्ग पर परामर्श की उम्मीद की जा सकती है। दूसरी खबर है, अमेरिकी प्रशासन, आईटी उद्योग से बातचीत जारी – भारत सरकार एच-1बी मुद्दे पर आगे का रास्ता खोजने के लिए आईटी उद्योग और अमेरिकी प्रशासन के साथ बातचीत कर रही है। सूत्रों ने कहा कि आवेदन शुल्क में वृद्धि अमेरिकी कंपनियों पर और भी ज्यादा असर डालेगी, क्योंकि ये कंपनियां उच्च कुशल पेशेवरों के लिए खासतौर से इस वीजा कार्यक्रम का इस्तेमाल करती हैं। एक खबर यह भी है, विमान से उतरे कई भारतीय। अमेरिकी घोषणा के बाद त्योहारों के लिए स्वदेश जा रहे कई भारतीय पेशेवरों के सैन फ्रांसिस्को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान से उतरने की भी खबरें हैं। आप समझ सकते हैं कि मामला कितना गंभीर है और कितनी त्वरित कार्रवाई हुई है। जाहिर है कि भारत को भी जो करना है, इसी रफ्तार से करना चाहिये लेकिन हमारे प्रधानमंत्री टैरिफ पर स्वदेशी और अब आत्मनिर्भर होने की बात कर रहे हैं। नवोदय टाइम्स में यह सिंगल कॉलम की खबर है, राहुल गांधी की फोटो के साथ। शीर्षक है, देश के पास है एक कमजोर पीएम। यह अंग्रेजी में, इंडिया हैज अ वीक पीएम का घटिया अनुवाद है। नवोदय टाइम्स ने एजेंसी के हवाले से छापा है। जाहिर है कि एजेंसी का यह अनुवाद भी खबर को पहले पन्ने लायक नहीं बनाता है। लेकिन आज के समय में अगर खबर मिलने के बाद भी संपादक ट्वीटर नहीं देखे तो हिन्दी पत्रकारिता का भगवान ही मालिक है।
द हिन्दू में राहुल गांधी का आरोप मुख्य खबर के साथ सिंगल कॉलम में है। मुख्य खबर छह कॉलम में लीड है। दि एशियन एज में भी यह चार कॉलम की लीड के साथ सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, एच-1बी (वीजा) आदेश पर कांग्रेस ने मोदी पर ‘कमजोर’ कहकर हमला किया। द हिन्दू का शीर्षक भी लगभग यही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में कांग्रेस या राहुल गांधी की प्रतिक्रिया तो नहीं है लेकिन भारत की प्रतिक्रिया कायदे से है, उम्मीद कि अमेरिका बाधाओं को लेकर कार्रवाई करेगी। इसके साथ सिंगल कॉलम में प्रधानमंत्री की आधे कॉलम की फोटो के साथ छपी खबर का शीर्षक है, “हमारा भविष्य दूसरों की दया पर निर्भर नहीं हो सकता है : प्रधानमंत्री”। इसके तहत उन्होंने आत्म निर्भर भारत की बात की है और जाहिर है कि यह आम लोगों को बेवकूफ बनाने या समझने की उनकी रणनीति का विस्तार है। देशबन्धु की खबर के अनुसार ट्रम्प के इस निर्णय से दो लाख से ज्यादा भारतीय प्रभावित होंगे। 2023 में एच-1बी वीजा लेने वालों में 1,91,000 भारतीय थे। यह आंकड़ा 2024 में बढ़कर 2,07,000 हो गया था। भारत की आईटी / टेक कंपनियां हर साल हजारों कर्मचारियों को एच-1बी वीजा पर अमेरिका भेजती हैं। अब इतनी ऊंची फीस पर कंपनियों के लिए लोगों को यहां से अमेरिका भेजना फायदेमंद नहीं रहेगा। दूसरी ओर, आप जानते हैं कि यहां साधारण नौकरियां नहीं हैं, जो हैं उनके लिए नियुक्ति की परीक्षा नहीं हो पाती है, जब होती है तो प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं और दूसरे कारणों से परीक्षा रद्द हो जाती है। लाखों पद खाली है। मोदी कह रहे हैं कि आत्मनिर्भर बनना ही उपाय है। यह एक महत्वाकांक्षी योजना है ताकि 50 साल पद पर रहने का दावा किया जा सके। इसमें यह मुद्दा ही नहीं है कि जो काम अभी तक नहीं हुआ वह आगे कैसे होगा और 10 साल में क्या कुछ हुआ। देशबन्धु के अनुसार, नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि विदेशी निर्भरता हमारी सबसे बड़ी दुश्मन है और इसे हराना ही होगा। हराने के लिए या आम देशवासियों के भले के लिए क्या किया या क्या करने की योजना है – ना बताते हैं ना कोई पूछता है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर बताती है कि (भारत) सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ है। भारत की प्रतिक्रिया द टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स में भी है।
आज जब खबर बता रहा हूं तो यह बताना जरूरी है कि मीडिया को पैसे देकर खुश करने या मुंह में हड्डी देकर चुप रखने के लिए देश के प्रधानमंत्री के जन्म दिन को तमाशा बना दिया गया। इसपर न्यूजलौन्ड्री की एक अच्छी रिपोर्ट है। अगर आप अभी तक न्यूजलौन्ड्री को नहीं जानते तो बता दूं कि न्यूजलॉन्ड्री, भड़ास4मीडिया से अलग, एक स्वतंत्र, पेशेवर मीडिया संगठन है, जो भारत में निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता के लिए जाना जाता है। इसकी स्थापना 2012 में हुई थी, एक ऐसे समय में जब मुख्यधारा की मीडिया संस्थाएं कॉरपोरेट और सरकारी दबाव में आती जा रही थीं। न्यूजलॉन्ड्री ने इस चलन को चुनौती दी और एक ऐसा मॉडल अपनाया जिसमें विज्ञापनों पर निर्भरता खत्म कर दी गई। इसकी फंडिंग पूरी तरह से पाठकों और दर्शकों से मिलने वाले सब्सक्रिप्शन यानी ‘चंदे’ से होती है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री अपने लोकप्रिय स्लोगन “पेड न्यूज़ नहीं, पब्लिक न्यूज़” पर खरा उतरता है। इस मीडिया संस्थान की पहचान इसकी निर्भीक और तथ्यपरक रिपोर्टिंग से है। यह सिर्फ खबरें नहीं दिखाता, बल्कि मीडिया की खबर भी करता है — यानी यह खुद मीडिया पर निगरानी रखने का काम करता है। ‘हफ्ता’ इसका साप्ताहिक पॉडकास्ट है, जिसमें पत्रकार, विश्लेषक और विशेषज्ञ मिलकर प्रमुख मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते हैं। इसके अलावा, न्यूजलॉन्ड्री ने मीडिया, राजनीति, शिक्षा और समाज से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जब भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार और कॉरपोरेट के प्रभाव में दिखता है, तब न्यूजलॉन्ड्री जैसे संस्थान लोकतंत्र के लिए एक उम्मीद की किरण हैं — जो पत्रकारिता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने में लगे हुए हैं।
जहां तक प्रधानमंत्री के विदेश दौरे का सवाल है, यह भी याद दिलाना जरूरी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने पत्रकारों को अपने साथ विदेश ले जाना बंद कर दिया। सरकार समर्थकों और भक्तों ने इसका जोरदार समर्थन किया था – मोदी जी को पत्रकारों की जरूरत नहीं है। पहले होता यह था कि विमान की खाली सीट पर पत्रकारों को बैठा लिया जाता था। वे अपने यानी कंपनी के खर्चे पर जाते वहां ठहरते थे। दौरे की रिपोर्ट करते थे। प्रधानमंत्री विदेश से आने के बाद राष्ट्रपति से भी मिलते थे। अब यह सब होता हो या नहीं, पत्रकार साथ नहीं जाते हैं और लौटकर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से मिलते हों, ऐसी खबरें नहीं छपतीं। पत्रकारों को साथ नहीं ले गये पर जिन लोगों को साथ ले जाने की चर्चा हुई उनका खंडन भी नहीं हुआ। जो भी हो, देश में पत्रकारिता की हालत लगातार खराब हुई है। राहुल गांधी जब कोई मामला उठाते हैं तो सरकार और भाजपा का पूरा इको सिस्टम उन्हें डिसक्रेडिट करने में लग जाता है जबकि जीएसटी से लेकर अर्थव्यवस्था और कोविड पर भी उनका कहा सही साबित हुआ है।
इस तरह, संभव है कि एसआईआर से अगर कथित घुसपैठिये निकाले जायेंगे तो एच-1बी वीजा महंगा होने से अमेरिका में नौकरी करने वाले भारतीयों के लिए वहां रहना महंगा हो जायेगा और वहां वही रह पायेंगे जो ज्यादा कमाते हैं। आम भारतीयों का वहां रहना कम होगा ही। इससे पहले अवैध रूप से वहां रहने वालों को बेड़ियों में वापस भेजा जा चुका है। इस तरह, आप कह सकते हैं कि मोदी को सुनने के लिये जुटने और मो..दी, मो..दी करने वालों को वापस भारत भेजने या बुलाने का इंतजाम हो रहा है। टैरिफ की मार अलग से है। ‘फ्रेंड’ जी जो कर रहे हैं उसका मतलब यही होगा कि वोटर वापस आयें और वोट दें, भले बेरोजगार रहें। वहां कमाकर मां-बाप को जो भेजते थे वो नहीं मिलेगा और जो उन्हें वोट नहीं देते हैं वे मतदाता सूची से बाहर हो जायेंगे। राहुल गांधी की छवि अगर पप्पू की बनाई जा सकती है या उसकी कोशिश की जा सकती है तो फ्रेंड की छवि ऐसी बनाई गई हो तो कौन सी बड़ी बात होगी। आइये अब देखें कि आज एच-1बी वीजा की खबर जो सभी अखबारों में लीड है – के साथ किस अखबार ने क्या बताया है और क्या हाईलाइट किया है। राहुल गांधी ने जो कहा है वह किसी अखबार में पहले पन्ने पर वैसे नहीं छापा है जैसे देशबन्धु ने छापा है या ऐसे जैसे सरकारी निगाह से देखने पर दिख जाये। हिन्दुस्तान टाइम्स ने तमाम सूचनाओं के साथ यह भी बताया है कि ट्रम्प के प्रतिद्वंद्वी राजनीतिज्ञों के अनुसार यह आर्थिक विध्वंस की तरह है। दि एशियन एज में शीर्षक के साथ हाईलाइट किये अंश में एक है, अमेरिकी कानून निर्माताओं ने इसे रेकलेस (अविवेचित, अंधाधुंध) कहा। द हिन्दू ने जिन चीजों को हाइलाइट किया है उनमें एक है, आदेश 20 सितंबर को आधी रात से प्रभावी हो जायेगा। आप जानते हैं कि आज इतवार को 21 सितंबर है। 20 सितंबर शनिवार था और इस तरह का आदेश अगर शुक्रवार को भी जारी किया जाये तो शनिवार की रात से प्रभावी होने मतलब समझ सकते हैं। इस मामले में तो इतना समय भी नहीं दिया गया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


