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सुख-दुख

राजेश अवस्थी की आत्महत्या ने मुझे सहारा समय के दुर्दिन याद दिला दिए, जब सात महीने की प्रैग्नेंट मैं रोज कई घंटे साथियों के साथ धरना देती!

Close-up portrait of a South Asian woman with a bindi, nose ring, and earrings, looking at the camera.

निदा रहमान-

ये तस्वीर सोशल मीडिया पर तैर रही है, आप सभी को इस तस्वीर के बारे में पता भी होगा। ये एक पत्रकार की लाश है, जो तथाकथित एक बड़े मीडिया ग्रुप से हारकर अपनी जान लेता है। इस तस्वीर और उसके पीछे के दर्द को मैं और मुझ जैसे सैंकड़ों लोग बखूबी समझ सकते हैं, जिन्होंने इसको नज़दीक से देखा है।

News thumbnail: man lying on pavement while a bystander in gloves offers water as others look on; people outdoors wearing masks in the background.

सहारा समय में नौकरी करते वक्त जब सुब्रत राय सहारा जेल गए तो उसके बाद शुरु हुआ सहारा ग्रुप में काम करने वाले कर्मचारियों, पत्रकारों का शोषण। पहले एक महीने की सैलरी लेट हुई, फिर दो महीने की, फिर कभी कैडर के मुताबिक सैलरी आने लगी, फिर कभी मैनेजमेंट ने तय किया कि आधी ही सैलरी दी जाएगी। थक हारकर कर्मचारी विरोध करते या धरना प्रदर्शन तो झूठे आश्वासन के ज़रिए उन्हें तसल्ली थमा दी जाती।

कभी कोई न्यूज़ चैनल का हेड बदल दिया जाता कभी किसी का। कभी कोई अचानक से नया मैनेजमेंट वाला आ जाता। ये कई महीनों चला। बीच बीच में हड़तालें हुईं और आख़िर में फिर एक लंबी हड़ताल हुई, जिसमें हम लोग कई दिन काम बंद करके कैंपस में ही धरने पर बैठे रहे। सहारा ग्रुप ने अपने कर्मचारियों को भुखमरी के कगार पर पहुंचाया। बीस-बीस साल से नौकरी करने वाले कर्मचारी जिनकी सैलरी पंद्रह बीस हज़ार रुपए थी उनके घर फाके होने लगे। बच्चों को पिलाने के लिए दूध के पैसे नहीं थे, स्कूल की फीस जमा करने के पैसे नहीं थे। कुछ एक तो इलाज ना करवा पाने की वजह से मर भी गए। लेकिन मजाल है किसी के कान पर जूं तक रेंगा हो।

सात महीने की प्रैगनेंट मैं रोज़ कई घंटे अपने साथियों के साथ धरना देती। हालांकि हमारे ही साथ के कुछ लोग जो बॉस के पिछलग्गु थे वो बाकायदा काम कर रहे थे और हम पर दबाव था कि हम भी काम पर लौट आए। हमारी हड़ताल को जो लीड कर रहा था उसके साथ कुछ लोग सहारा श्री से मिलने तिहाड़ जेल गए और पता नहीं क्या डील हुई कि लौटते ही हड़ताल खत्म होने का ऐलान कर दिया। मुझ जैसे लोग जो सिर्फ अपने हक़ के लिए लड़ रहे थे खुद को ठगा हुआ मेहसूस करने लगे और सब्र ऐसा टूटा कि रोने लगे।

हमें समझाया गया और काम पर लौटने को कहा गया, इस बीच किसी भी बाहर वाले को ना तो हमारी तकलीफ़ का एहसास हुआ ना कहीं कोई खबर बनी। हां कभी कभी छोटी मोटी वीएसटी टाइप या सुपर थर्टी में एक खबर आई कि सहारा में कर्मचारी आठ नौ महीने के सैलरी पाने के लिए हड़ताल पर बैठे हैं।

उस समय भी मैंने रवीश कुमार के नाम एक खुला पत्र लिखा था जो वायरल भी हुआ । लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। किसी भी दूसरे मीडिया संस्थान ने जो हमारी कोई खबर नहीं दिखाई ना साथ दिया। हम आख़िर में लेबर कोर्ट पहुंचे, बहुत से साथियों ने केस भी लगाए। लेबर कोर्ट में बीच का रास्ता ये निकाला कि हमें सेल्फ एक्ज़िट लेने को कहा गया। यानि कि जो लोग नौकरी छोड़ना चाहते हैं वो अपना बकाया लें और अपना रास्ता नापें। लेबर कोर्ट ने हमें कोई मुआवज़ा नहीं, कोई दूसरी मदद नहीं दी। हमारा कुछ साल का पीएफ भी सहारा खा गया।

सहारा की मेहरबानी की बदौलत कुछ न्यूज़ चैनल हेड सीट पर काबिज़ रहे और उन्होंने सरकारों के साथ मिलकर जमकर पैसा बनाया। लेकिन इसमें पिसा कौन, हम जैसे लोग। मैं तो फिर भी ठीक थी क्योंकि इरफ़ान की नौकरी थी तो घर में खाने के लाले नहीं पड़े। लेकिन सैकड़ों लोग जिनके घर में सिर्फ़ वो एक कमाने वाले थे उनके घरों में फाके पड़ने लगे। थक हार कर कुछ लोगों ने अपने गांवों, शहरों का रास्ता अपनाया। बहुत से लोगों ने एनसीआर में अपने घर का सपना पूरा करने के लिए ईएमआई पर फ्लैट बुक किए थे। उनकी ईएमआई नहीं जा पाई। वो कर्ज़े में ऐसे डूबे के फिर उबर नहीं पाए।

बरसों बरस बाद ये सब सिर्फ़ इसलिए लिख रही हूं कि जिस तस्वीर पर लोग आंसू बहा रहे हैं, वो आंसू अब दिखावटी लगते हैं। दूसरे के शोषण की आवा़ज़ बनने वाला तथाकथित मीडिया अपने ही साथियों का सबसे बड़ा शोषक रहा है। यहां किसी की कोई सुनवाई नहीं है। छोटे-छोटे कस्बों में काम करने वाले पत्रकार जो आज भी ईमानदारी से काम कर रहे हैं वो मार दिए जाते हैं और उनकी संस्था पल्ला झाड़ लेती है।

मीडिया का जो घिनौंना चेहरा मैंने देखा है, मीडिया में रहकर वो अब किसी से कोई उम्मीद ना रखने के लिए काफ़ी है। गाहे बगाहे कॉस्ट कटिंग के नाम पर भारी संख्या में मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाता आया है। नए नए न्यूज़ चैनल जो कुकरमुत्तों से उगे उन्होंने भी अनगिनत लोगों के कैरियर तबाह किए हैं। गुस्सा नहीं है बस घटिया हो चुके मीडिया की उनके मालिकों की, पत्रकारों की सच्चाई है।

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