
रंगनाथ सिंह-
पिछले कुछ दिनों से भूपेन्द्र यादव का नाम भाजपा अध्यक्ष पद के लिए तेजी पकड़ रहा है। पिछले सारे अनुमान पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। हालाँकि राजनीतिक परिवेश में कई बार किसी का नाम बाहर करने के लिए ही मीडिया में चला दिया जाता है अतः भूपेन्द्र जी की दावेदारी तब तक डगमग करती रहेगी जब तक कि कोई अध्यक्ष नियुक्त नहीं हो जाता। पिछले कुछ समय के घटनाक्रम को देखें तो पार्टी अध्यक्ष भारत की दलगत राजनीति की दुखती रग बन चुका है।
पिछले तीन-चार दिन में कई प्रदेशों के भाजपा अध्यक्ष नियुक्त होने की तरफ बढ़ गये हैं। उनके नाम कैसे और किसने फाइनल किये यह अनुमान लगाने के लिए हम सब स्वतंत्र हैं। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे जी द्वारा आलाकमान की दुहाई देने से यह शब्द चर्चा में आ गया। कांग्रेस में आलाकमान की महिमा उच्च कोटि की रही है। आलाकमान की मर्जी के खिलाफ अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के कारण शशि थरूर का राजनीतिक करियर गड्ढे में फँस गया था मगर ऐसा कोई दल नहीं है जिसमें आलाकमान न हों। फर्क बस रिवाल्विंग चेयर और स्टैटिक चेयर का है।
राजद का जीवन परम्परागत ग्रामीण भारतीयों की तरह ही सीधा सरल है जिसकी ऐंठन दूर से नहीं दिखती है इसलिए लालू यादव गम्भीर रूप से बीमार होते हुए भी सीधे सरल तरीके से फिर राजद के अध्यक्ष चुन लिए गये हैं। कांग्रेस ने भी करीब दो दशक तक सोनिया गांधी को अध्यक्ष पद देकर उन्हें कांग्रेस पार्टी के इतिहास में मोहनदास गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी इत्यादि से बड़ा अध्यक्ष बना चुकी है। समूचा नेहरू परिवार जितने साल कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहा उससे लगभग दुगुना समय तक सोनिया जी कांग्रेस अध्यक्ष रहीं।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बारे में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि वे आजीवन अपनी पार्टी के अध्यक्ष रहेंगे। स्टालिन, ममता, पवार, ठाकरे इत्यादि नेताओं का हाल भी ऐसा ही है। कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी इस मामले में ज्यादा अलग नहीं है। कम्युनिस्टों में परिवारवाद नहीं है मगर वहाँ भी महसचिव पद पर जो जम गया सो जम गया का हिसाब है। भाकपा-माले के दीपांकर भट्टाचार्य और लालू यादव केवल चुनावी जोड़ीदार नहीं बल्कि पार्टी के शीर्ष पद पर कब्जे के मामले में भी दोनों समानधर्मा हैं।
देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी माकपा (सीपीएम) के ज्यादातर महासचिव के बराबर का कार्यकाल जेपी नड्डा भी भाजपा अध्यक्ष के तौर पर नहीं अर्जित कर पाए हैं। अभी तक किसी भी भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल एक बार में 6 साल (3+3) से आगे नहीं गया है। आलाकमान बनने के बाद उस कुर्सी पर टिक जाने की बीमारी कम्युनिस्ट पार्टी में भी गम्भीर स्तर पर रही है।
भारत में लोकतंत्र की जड़ें दशक दर दशक मजबूत होती जा रही हैं मगर राजनीतिक संगठनों के अन्दर का सिस्टम ऐसा है कि जो ऊपर बैठ गया वह मनमर्जी करता है जबकि उसके लिए जमीन पर काम करने वाले मुँह देखते रह जाते हैं। मेरे ख्याल से अब वक्त आ गया है कि अमेरिका और ब्रिटेन की तरह भारत में भी सभी राजनीतिक दल अपने पंजीकृत समर्थकों के बीच चुनाव की व्यवस्था को अपनाएँ। टेक्नोलॉजी ने यह काम बहुत आसान कर दिया है। बीजेपी या कांग्रेस के आधिकारिक ऐप के माध्यम से यह काम आसानी से किया जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि किस दल के पास कितने पंजीकृत समर्थक हैं यानी जो आधिकारिक तौर पर खुद को किसी दल का समर्थक मानते हैं।
भले ही राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व इसे अपने लिए खतरा मानें मगर अंततोगत्वा यह पहल उनके संगठन के लिए हितकारी साबित होगी। जो कार्यकर्ता संगठन को दरवाजे-दरवाजे ले जाते हैं, उनकी राय अंतिम निर्णय में शामिल करने से संगठन मजबूत ही होंगे, कमजोर नहीं।


