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आज के अखबार : रैली का प्रचार ज्यादातर ने किया है प्रधानमंत्री को काले झंडे दिखाने की ‘खबर’ पी गये!

जानिये कि सोशल मीडिया नहीं होता तो गोदी मीडिया क्या करता और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए सरकार क्या-क्या कर रही है। सरकारी वकील आपके पैसे से आपके खिलाफ कैसे तर्क गढ़ रहे हैं। कहानी गढ़ने वाले को ईनाम के बाद तर्क गढ़ने का ईनाम मिलेगा?  

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल बिहार और बंगाल के चुनावी दौरे पर थे। आज उसकी ‘खबर’ अंग्रेजी के मेरे सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। हिन्दी के तीन में से दो अखबारों में भी है। नवोदय टाइम्स में लीड है लेकिन अमर उजाला में खबरों के दो पहले पन्नों में से किसी पर नहीं है। खास बात यह है कि सोशल मीडिया पर कई खबरें और वीडियो हैं जिनमें बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री को मोतिहारी में काले झंडे दिखाये गये। अखबारों की खबर में यह तथ्य प्रमुखता से नहीं है। न तो हाईलाइट किया गया है, ना फोटो है। दिलचस्प यह भी है कि सरकार समर्थक लोग इसे सुरक्षा में चूक बता रहे हैं। अगर ऐसा ही हो तो भी खबर बड़ी या महत्वपूर्ण है लेकिन छपी नहीं है। ज्यादातर अखबारों में शीर्षक सरकार का प्रचार करने वाला ही है। खबर के तौर पर स्थिति का अनुमान लगाने के लिए मैंने आज सुबह ‘मोतिहारी में प्रधानमंत्री को काले झंडे दिखाये’ गूगल किया तो हिन्दुस्तान की खबर चार घंटे पहले और नवजीवन की खबर 12 घंटे पहले पोस्ट की गई थी। जाहिर है, मीडिया ने इसे खबर नहीं माना और अकेले (हिन्दी में) नवजीवन ने अपने स्रोत या सोशल मीडिया की खबरों से यह खबर की थी। कई घंटों बाद अब यह ‘खबर’ बन रही है। इस तरह यह ‘खबर’ इतिहास में तो दर्ज हो गई वर्तमान में बहुतों ने नहीं पढ़ी। अब के लोग जब इतिहास लिखेंगे तो संभव है कि उन्हें प्रधानमंत्री को काले झंडे दिखाने का इतिहास मालूम ही न हो। इतिहास बदलने या उसमें सुधार करने के प्रयासों के मद्देनजर यह सब जानना-बताना अब जरूरी हो गया है। चूंकि यह ‘खबर’ सोशल मीडिया के कारण ही बन रही है तो खबरों में उसके महत्व या भूमिका को भी समझा जा सकता है। आज एक खबर यह भी हो सकती थी कि सरकार सोशल मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए र क्या सब कोशिशें कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ऑफ कर्नाटक

इस क्रम में आज हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में पहले पन्ने पर और अन्य में छपी खबर के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक्स पर ‘सुप्रीम कोर्ट ऑफ कर्नाटक’ नाम से एक्स अकाउंट बनाया और जज साहब को दिखाकर बताया कि अकाउंट बनाना कितना आसान है। यह खुलासा ऑनलाइन गुमनामी और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। मेहता का यह कदम एक्स कॉर्प की याचिका के जवाब में था, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) के तहत कंटेंट हटाने के सरकारी आदेशों को चुनौती दे रही है। मेहता ने जोर देकर कहा कि एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स धारा 79 के तहत “सेफ हार्बर” का दावा तभी कर सकते हैं, जब वे गैरकानूनी कंटेंट हटाने में सहयोग करें। उन्होंने बताया कि साइबर अपराध 2019 में 26,000 से बढ़कर 2024 में 22.6 लाख तक पहुंच गए, जो डिजिटल नियमन की जरूरत को दर्शाता है। एक्स के वकील केजी राघवन ने इस प्रदर्शन पर आपत्ति जताई, लेकिन मेहता ने स्पष्ट किया कि अकाउंट का इस्तेमाल पोस्टिंग के लिए नहीं, बल्कि खतरे को दिखाने के लिए किया गया। दो घंटे की सुनवाई खत्म होने से पहले एक्स ने इस अकाउंट को डिलीट कर दिया। राघवन ने अदालत से कहा, अकाउंट को निलंबित कर दिया गया है। हम एक जिम्मेदार संस्थान हैं। जाहिर है, फर्जी अकाउंट बनाये जा सकते हैं तो बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है और की जानी चाहिये। शिकायत मिलने पर डिलीट भी किया जा सकता है। इसके लिए अकाउंट बनाना ही मुश्किल कर दिया जाना या डिलीट करना आसान बनाना कैसे ठीक हो सकता है? बहुत से यू ट्यूबर इस परेशानी से जूझ रहे हैं। सरकार को उनकी मदद के बारे में भी सोचना चाहिये।    

मैंने कल यहां लिखा था, “….सरकार ने अदालत में कहा है कि एक्स या ट्वीटर पर अवैध सामग्री लोकतंत्र को खतरे में डालती है तथा इसे चलाने वाली कंपनी आईटी अधिनियम की सेफ हार्बर सुरक्षा प्रावधान का उपयोग करके जिम्मेदारी से बचना चाहती है। अखबार ने इस संबंध में सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया, तुषार मेहता के कथन को हाईलाइट किया है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, सेफ हार्बर की अवधारणा में जबरदस्त जिम्मेदारियां शामिल हैं। इसके तहत मध्यस्थों के लिए आवश्यक है कि नोटिस मिलने पर गैरकानूनी सामग्री को तत्काल और प्रभावी ढंग से हटाये या बेअसर करे…. सेफ हार्बर संवैधानिक स्वतंत्रता नहीं है बल्कि एक वैधानिक विशेषाधिकार है जिसे खासतौर से डिजाइन किया गया है ताकि जिम्मेदार आचरण को बढ़ावा दिया जा सके। पहले की घटनाओं के मद्देनजर सरकार की इस दलील का खेल समझना मुश्किल नहीं है ….।” मोदी है तो मुमकिन है या अमृत काल आने से पहले ऐसी खबरों का फॉलोअप आम या जरूरी होता था। अब सिरे से गायब रहना मुमकिन है। पर वह अलग मुद्दा है। अभी मुद्दा यह है कि कल की रैली के कई घंटों बाद (लिखने के समय से कुछ घंटे पहले) की गई हिन्दुस्तान की खबर का शीर्षक है, पीएम मोदी को मोतिहारी में दिखाए गए काले झंडे, तीन लोग हिरासत में; तेजस्वी ने वीडियो शेयर किया। जाहिर है, खबर तब हुई जब मामला सार्वजनिक हो गया।

सोशल मीडिया और सरकार का प्रचार

यही नहीं, बिहार में एसआईआर से संबंधित घोटाले की खबर भले जाने-माने पत्रकार अजीत अंजुम  कर रहे हों, सच यही है कि जनता तक वह सोशल मीडिया के जरिये ही पहुंच रहा है। इस सरकार ने कॉरपोरेट मीडिया को पंगु बनाकर रख दिया है। अगर कॉरपोरेट मीडिया वेतन-भत्तों और सुविधाओं के मामले में कॉरपोरेट जैसा हो जाये, वेज बोर्ड की सिफारिशें मान ले, सेवा शर्तें बेहतर हो जातीं तो माना जाता कि चलो मीडिया खराब हुआ, नौकरी के लिए तो बेहतर हुआ पर वह भी नहीं हो रहा है। मीडिया में मुसलमान हैं नहीं और यह रोना पुराना है। अगर यहां कुछ भला नहीं हुआ तो वंचित कौन रहे या किनका भला नहीं हुआ, बताने की जरूरत नहीं है। कल रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ ईडी की चार्जशीट को लीड बनाने के बाद अमर उजाला ने आज शराब घोटाले में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य की गिरफ्तारी की खबर को लीड बनाया है। मुझे लगता है कि यह सब सरकार की जबरदस्ती और विरोधियों को परेशान करने का मामला है। राहुल गांधी ने भी कहा है कि सरकार मेरे बहनोई को दस वर्षों से प्रताड़ित कर रही है (नवोदय टाइम्स)। ऐसे में मुझे नहीं लगता है कि अखबारों के लिए यह उचित है कि सरकार के ‘काम’ का प्रचार करें। विरोध नहीं करने की मजबूरी तो समझी जा सकती है पर प्रचार की जरूरत भी आ गई है तो मीडिया को स्वीकार करना चाहिये। वैसे ही जैसे एक टेलीविजन चैनल के पत्रकार ने स्वीकार किया है। हालांकि, वह भी सोशल मीडिया का ही कमाल है।

सरकार के ‘काम’

सरकार के ‘काम’ की बात हो तो आज अमर उजाला की एक खबर का उल्लेख किया जाना चाहिये। इससे साफ है कि दाल में कुछ तो काला है। सरकारी नौकरी से इस्तीफा सामान्य नहीं है और वह भी पेंशन की सुविधा छोड़कर। आज के समय में जब दूसरी नौकरी मुश्किल है और छह महीने, साल भर के निजी काम के लिए कोई नौकरी नहीं छोड़ता है। आप खुद पढ़िये-सोचिये।

बिहार अब जंगल नहीं रहा

प्रधानमंत्री के दौरे, रैली की खबरों के शीर्षक पर नजर डालें तो कोलकाता से प्रकाशित, द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, “मोदी बिहार में : अब जंगल नहीं रहा?” नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव की खबर है, वो आए, बोले लेकिन कुछ कमी रह गई। दो शब्दों का एक विशेषण जिसे वह पहले दोहराते नहीं थकते थे। शुक्रवार को बिहार में अपने चुनावी भाषण में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी “जंगल राज” कहना भूल गए। वर्षों से यह अभिव्यक्ति राजद के खिलाफ मोदी का मुख्य भाषण रही है – यह 1990 से 2005 के बीच उसके शासन काल का संदर्भ है जब बिहार अपहरण और हत्याओं से तबाह हो गया था। लेकिन एनडीए शासित बिहार में हत्याओं की एक श्रृंखला के बाद स्थिति बदल गई है। इसमें राजधानी पटना में एक पखवाड़े में 13 हत्याएं शामिल हैं। मामला गुरुवार को तब तूल पकड़ गया जब पांच बंदूकधारी पटना के एक निजी अस्पताल में घुस गए, एक मरीज की गोली मारकर हत्या कर दी और आराम से चले गए। इसके बाद राजद नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार की भाजपा समर्थित सरकार पर हमला करते हुए “जंगल राज” का अपमान उनपर थोपा। अखबारों और खबरों में अब यह तेवर आमतौर पर नहीं मिलता है। मोतिहारी में शुक्रवार की रैली में उन्होंने खुद को सीमित रखा और राजद पर भ्रष्टाचार व भाई-भतीजा वाद के आरोप ही लगाये।

रैली का प्रचार ऐसे किया गया है

नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड है और इसका फ्लैग शीर्षक है, दो राज्यों के दौरे पर प्रधानमंत्री बोले – (दो मुख्य शीर्षक है) बिहार : फिर एक बार एनडीए सरकार और बंगाल : टीएमसी घुसपैठियों की मददगार। देशबन्धु में इस खबर का शीर्षक है, “पुणे की तरह बनेगा पटना, गुरुग्राम जैसा गया जी : मोदी”। इसमें बिहार के शहर, ‘गया’ को ही शायद गया जी कहा जा रहा है। पर खबर में इसका विस्तार नहीं है। (ढूंढ़ने पर पता चला कि, गया का नाम गयाजी रखने की मांग 55 साल पुरानी रही। भाजपा के सहयोग से चल रही बिहार की नीतीश सरकार ने इस साल मई में बदलाव को को मंजूरी दे दी है।) दि एशियन एज में यह खबर लीड है। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बंगाल में दंगों और विकास बाधित करने के लिए ममता पर निशाना साधा। फ्लैग शीर्षक में दो बुलेट प्वाइंट के साथ दो लाइनों में है। पहली लाइन है, पश्चिम बंगाल में मोदी ने चुनावी बिगुल फूंका, हिन्दुत्व नहीं, निवेश का नारा। दूसरी लाइन है, बिहार में प्रगति के लिए एनडीए की प्रशंसा की और कांग्रेस-राजद कुशासन पर निशाना साधा। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह टॉप पर सेंकेड लीड है। शीर्षक है, तृणमूल (कांग्रेस पार्टी) घुसपैठियों का साथ दे रही है, लेकिन उनकी जांच होगी, बंगाल की पहचान, भारत की सुरक्षा को जोखिम में रख रही है : प्रधानमंत्री। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम की सेकेंड लीड है। दो लाइन का इसका शीर्षक है, “मोदी ने मोतिहारी में कहा, ‘विकसित बिहार’ पूर्वी भारत के विकास की कुंजी है”। द हिन्दू में भी यह चार कॉलम की खबर है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बिहार में 7200 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का खुलासा किया, राजग की सत्ता में वापसी की अपील की। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बिहार के युवाओं के लिए निजी क्षेत्र की पहली नौकरी पर 15,000 रुपये की योजना की घोषणा की। इस खबर के साथ अखबार ने चुनाव आयोग का यह दावा भी हाईलाइट किया है कि बिहार के मतदाताओं में 36 लाख लोग अपने पतों पर नहीं मिले। यह सूचना सही हो सकती है लेकिन खबर यह भी है कि कई लोगों के फॉर्म उनकी जानकारी के बिना या उनके बिना ही भर दिये गये हैं। ऐसे में यह दावा संदिग्ध है।

आतंकवाद और भारत

आज की दूसरी बड़ी खबर पहलगाम हमले में शामिल संगठन टीआरएफ को वैश्विक आतंकी संगठन घोषित किया जाना है। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस के साथ द टेलीग्राफ में भी लीड है। अमर उजाला ने इसे अपने दूसरे पहले पन्ने पर लीड बनाया है। अमेरिका ने इस निर्णय को पहलगाम हमले के न्याय से जोड़ा है। आप जानते हैं कि पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिन्दूर शुरू करके चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की गई थी और घर-घर सिन्दूर भेजने की योजना तक बन गई थी। इससे संबंधित खबर का कई घंटों बाद खंडन किया गया। दूसरी ओर ऑपरेशन सिन्दूर के युद्ध में बदल जाने और उसके बाद जो सब हुआ वह भी कम नहीं है। यह सब इस प्रचार के लिये किया गया कि आतंकवाद पर सरकार का रुख बहुत सख्त है। पुराने तमाम मामले सार्वजनिक होने के बावजूद चुनावी लाभ लेने की कोशिश साफ दिखी और तमाम अनैतिक चालें चली गईं। दूसरी ओर, मुंबई के आतंकी हमले में जिन्दा पकड़े गये अजमल कसाब को नियमानुसार कार्रवाई करके फांसी दी गई थी। उसके जीवित पकड़े जाने से भारत में आतंकी घटनाओं में पाकिस्तान की भागीदारी साबित करने में मदद मिली थी और तभी उसे बिरयानी खिलाने की कहानी गढ़कर व्यवस्था का मजाक उड़ाने की कोशिश भी की गई। उसके सरकारी वकील रहे उज्जवल निकम ने कसाब को फांसी दिये जाने के तीन साल बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि कसाब ने कभी भी मटन बिरयानी नहीं मांगी थी और ना ही उसको बिरयानी दी गई थी। उन्होंने तब यह बात इसलिए कही थी कि उस समय कसाब के लिए कथित रूप से भावनात्मक माहौल बनाने की कोशिश हो रही थी। मीडिया में कसाब पर खूब डिस्कशन हो रहा था। एक बार जब कसाब कोर्ट में रोया तो उसे रक्षाबंधन और बहन की याद से जोड़कर बातें शुरू हो गई थीं। लेकिन बिरयानी वाली बात से माहौल बदल गया था। अब पता चल रहा है आतंकवाद को वैश्विक स्तर पर खत्म करने के लिए अमेरिका पहले की ही तरह काम कर रहा है और 2001 के बाद अगर वहां दोबारा आतंकी हमला नहीं हुआ है तो इसका कारण यह भी हो सकता है कि वहां ऐसे मामलों का उपयोग चुनावी लाभ के लिए नहीं किया जाता है। मीडिया में डिस्कशन रोकने का भाजपाई तरीका भी नहीं आजमाया जाता होगा।

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग की इस कार्रवाई का भारत ने स्वागत किया है और विदेशमंत्री जयशंकर ने एक्स पर इसे भारत अमेरिका सहयोग की मजबूत पुष्टि कहा है। हालांकि, इसके साथ हैशटैगऑपरेशन सिन्दूर भी है। आज की इन खबरों से आतंकवाद को लेकर भारत और अमेरिका के रुख का अंतर भी दिख रहा है। भारत का रुख अजमल कसाब के समय से अलग जरूर है लेकिन अमेरिका का शायद वैसे ही है। भारतीय मीडिया में ऑपरेशन सिन्दूर के मुकाबले इसपर बहुत कम चर्चा होगी। अखबार ने बताया भी है कि भारत 2023 से संयुक्त राष्ट्र के साथ सूचना साझा कर रहा था और एलईटी तथा जेईएम जैसे पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के लिए टीआरएफ की कवर जैसी भूमिका का उल्लेख कर रहा था। अगर ऐसा है तो आप समझ सकते हैं कि मीडिया ऑपरेशन सिन्दूर का प्रचार तो कर रहा था पर इसकी खबर कम से कम मुझे तो नहीं दिखी। दूसरी ओर, अजमल कसाब के सरकारी वकील को भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव का टिकट देकर उपकृत किया और जनता ने खारिज कर दिया तो राज्यसभा में भेजकर उनकी कहानी के लिए ईनाम सुनिश्चत किया।

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