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छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ का कानून : हिंदू पीड़िता से दुष्कर्म और धन वसूली की सजा- आरोपी TI कलीम खान सिर्फ एक साल के लिए डिमोट कर SI बनाया गया!

छत्तीसगढ़ में क्या कानून अलग चलता है? रेप और वसूली के आरोपी पुलिस अधिकारी को सज़ा के नाम पर सिर्फ ‘डिमोशन’!

सुजीत सिंह प्रिंस-

छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग पर चाहे जितने भी गंभीर आरोप लगें, मौजूदा बीजेपी सरकार के दौर में हर दाग़ को ‘धुला हुआ’ दिखाने की कोशिश ज़रूर होती है। सट्टा ऐप से लेकर रेप और वसूली जैसे जघन्य अपराधों तक में पुलिसकर्मियों की संलिप्तता सामने आने के बावजूद, राज्य की ‘सुशासन’ सरकार पुलिस पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं होने देती।

ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें बिलासपुर रेंज के आईजी संजीव शुक्ला ने एक हिंदू पीड़िता से दुष्कर्म और धन वसूली के आरोपी पुलिस निरीक्षक (TI) कलीम खान को सज़ा के तौर पर सिर्फ एक साल के लिए ‘डिमोट’ कर सब-इंस्पेक्टर (SI) बना दिया है।

कानून का सख्ती से पालन कराने और अपराधियों को दंडित करने के बजाय, आईजी साहब ने ऐसा “उदाहरण” पेश किया है जो सिस्टम पर कई सवाल खड़े करता है। जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी आरोपी को सिर्फ पदावनति की सज़ा दी गई। फिलहाल कलीम खान सरगुजा जिले के साइबर थाना में पदस्थ हैं।

बताया जा रहा है कि यह मामला वर्ष 2020 का है जब कलीम खान बिलासपुर में TI थे। उस समय मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलाने के नाम पर तीन ठगों ने एक अभ्यर्थी और उसके परिजनों से 82 लाख रुपये की ठगी की थी। TI कलीम खान ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन सात महीने बाद 2021 में एक आरोपी की पत्नी ने शिकायत दर्ज कराई कि कलीम खान ने केस कमजोर करने और जमानत दिलवाने के बदले उससे पैसे मांगे और शारीरिक शोषण भी किया।

इस गंभीर आरोप की जांच बिलासपुर आईजी द्वारा करवाई गई, जिसमें आरोप सही पाए गए। इसके बाद जो ‘सख्त कार्रवाई’ की गई, वह मात्र डिमोशन थी!

अब सवाल उठता है: क्या ऐसे गंभीर अपराध में सिर्फ डिमोशन ही पर्याप्त सज़ा है? क्या पुलिस सेवा में पद घटा देने के बाद कोई अधिकारी फिर से ऐसे अपराधों के लिए एलिजिबल नहीं होता? पीड़िता को इतने वर्षों तक न्याय क्यों नहीं मिला? क्या भारत के सख्त कानून छत्तीसगढ़ में लागू नहीं होते?

अगर यही मामला किसी अन्य राज्य — विशेष रूप से विपक्षी सरकार वाले — में होता, तो शायद इसे ‘वर्दी जिहाद’ बताकर सड़कों पर प्रदर्शन होते। लेकिन चूंकि यह मामला एक बीजेपी शासित राज्य से जुड़ा है, इसलिए सिर्फ डिमोशन ही ‘कड़ी सज़ा’ मान ली गई है।

धन्य है सुशासन की यह परिभाषा और पुलिस विभाग के वो वरिष्ठ अधिकारी, जो न केवल बहरे हो चुके हैं, बल्कि अंधे भी, जो अपने ही विभाग के अपराधों पर सख्त फैसला नहीं ले पाते।

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