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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रकाश का लंग कैंसर फैलकर दिमाग़ में पहुँचा!

रवि प्रकाश-

प्रिय कैंसर,

शुक्रिया तुम्हारा।

जनवरी 2021 में जब तुम मेरे फेफड़ों में आए, मैं घबरा गया था। तुमसे कुछ दिनों की मुहब्बत की गुज़ारिश की। अनुरोध किया कि थोड़ा साथ तुम दो, थोड़ी इज़्ज़त हम देते हैं। साथ रहकर देखते हैं। तुमने मेरी बात मानी। मैं एहसानमंद हूँ तुम्हारा। अंतिम स्टेज के फेफड़ों के कैंसर के बावजूद तुम्हारी दरियादिली की वजह से मैं अपने बेटे को IIT दिल्ली से पास होते देख सका। यह बहुत बड़ी बात है। मैंने तुमसे और ईश्वर से शुरुआती तौर पर बस यही तो माँगा था। आपने यह दिया। इसलिए शुक्रिया।

मैं जानता हूँ कि स्टेज 4 में लंबी गुंजाइश नहीं थी। तुम्हें भी शायद मोनोटोनस लगने लगा हो। तुम फेफड़ों में रहते-रहते ऊब गए थे शायद। इसलिए तुमने मेरे दिमाग में भी घूमने का इरादा किया और अब मेरे दिमाग में भी आ गए हो। इस कारण मुझे रेडिएशन लेना पड़ा है। मेरा स्टेज 4. लंग कैंसर अब ब्रेन में भी मेटास्टेसाइज्ड हो चुका है। नॉन स्मॉल सेल से स्मॉल सेल में बदलकर तुम और आक्रामक हो चुके हो। मुझे तनिक भी शिकायत नहीं। तुमने मुझे बहुत वक्त दिया है। अब कम कष्ट में साथ लिए चलो, तो भी अहसान ही होगा तुम्हारा। मौत से कौन डरता है यहाँ, चलना ही है उस पार।

हाँ, कुछ और वक्त दे दोगे बेफिक्री के, तो मैं अमेरिका घूम आऊँगा। बड़ी इच्छा है वहाँ जाकर अवार्ड लेने की। नहीं दोगे, तो भी शिकायत नहीं। बस यह रहम कर दो कि बिछावन पर नहीं पड़ना पड़े। ऐसे अच्छा नहीं लग रहा है। मुझे एक्टिव रखो प्लीज। मेरी अंतिम साँस तक।

मेरे डॉक्टर लगे हुए हैं। तुमसे बचाने में। वे देवता हैं। हार नहीं मानेंगे। लेकिन, अब मैं ही बहुत रहना नहीं चाहता। हो सकता हो, तो बेफ़िक्री और कष्टरहित कुछ और महीने दे दो। तुम्हारी कृपा होगी।

लव यू और अब तक के साथ का शुक्रिया।

तुम्हारा,
रवि।

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