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मनमोहन से मोदी तक; रामनाथ गोयनका अवॉर्ड- सत्ता और मीडिया के बदलते रिश्ते पर कड़ा सवाल

अभिषेक श्रीवास्तव-

यह तस्वीर आज से 19 साल पहले की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से तत्कालीन रिपोर्टर पुण्य प्रसून वाजपेयी पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड ले रहे हैं। यह पहला रामनाथ गोयनका पुरस्कार था। शायद बरखा दत्त, प्रवीण स्वामी, आदि को भी मिला था लेकिन प्रसून जी को मिलने पर मैंने कहीं तंज में लिखा था इसलिए याद आ गया आज।

इस राष्ट्र-राज्य के सबसे बड़े और प्रधान प्रतिनिधि, पत्रकारिता के सबसे चमकदार और विश्वसनीय चेहरों तथा संस्थागत पत्रकारिता के सबसे साहसी माने जाने वाले प्रतिष्ठान के बीच का यह परस्पर रिश्ता कोई नया नहीं है, पैदाइश से है। अंतर बस इतना आया है कि समय के साथ इसमें कॉर्पोरेट भी एक हिस्सेदार बनकर उभरा है। बीते वर्षों में अदाणी, टीवीएस, जेपी समूह, और तमाम उद्योगों ने इस पुरस्कार को प्रायोजित किया है। हर साल इस पर नजर जाती है, हर साल मैं एक टिप्पणी करता हूँ। हर अगले साल इस कुकुरभोज के स्टेकहोल्डर विविध होते जाते हैं।

मनमोहन सिंह से शुरू होकर बीते 19 रामनाथ गोयनका अवॉर्ड और खासकर 6 रामनाथ गोयनका व्याख्यान में जो समावेशी विविधता बढ़ी है, उसके वक्ताओं में प्रणब मुखर्जी, विदेश मंत्री जयशंकर से लेकर रंजन गोगोई, रघुराम राजन और बिल गेट्स तक शामिल रहे हैं। इनमें से ऐसा कौन है जिसे आप कॉर्पोरेट फ़ासिज़्म का डायरेक्ट/इनडायरेक्ट पापी और हिस्सेदार नहीं मानते? फिर, इसकी परिणति यदि मौजूदा प्रधानसेवक पर हो रही है, तो अस्वाभाविक क्या है?

दो साल पहले जब नोएडा के इंडियन एक्स्प्रेस दफ्तर में योगी आदित्यनाथ ने जाकर रामनाथ गोयनका पर फूल-माला चढ़ाई और शहर की प्रमुख रोड अमलतास मार्ग का नया नामकरण किया “रामनाथ गोयनका मार्ग”, तब भी यहीं मैंने टिप्पणी की थी। जो बरसों से हो रहा था, यह उसका स्वाभाविक एक्स्टेन्शन ही था। उस दिन योगी ने मीडिया की आजादी पर खूब बोला था। आज मोदी बोलेंगे।

मनमोहन सिंह यानि स्टेट और अदाणी/जेपी/बिल गेट्स जैसे सुप्रा-स्टेट से पुरस्कार लेने वाले अपने भीतर इतना नमक कहाँ से लाएंगे कि आज मोदी के व्याख्यान और गोयनका पुरस्कार पर कुछ बोल सकें? जिन लोगों ने रामनाथ गोयनका अवॉर्ड पाने को अपनी पेशेवर पत्रकारिता का अंतिम लक्ष्य बना लिया और पा भी गए, क्या उनके पास कुछ कहने को है आज? जिन्हें आगे मिलेगा, उनको तो माफ ही कर दीजिए।

असल में, छोटी-छोटी, निजी, और तुच्छ महत्त्वाकांक्षाएं इस देश के नैतिक जगत को ले डूबी हैं। कॉर्पोरेट और स्टेट की बारी तो बाद में आती है। वो तो आपको अपने पाले में खींच के अपना लाभार्थी बनाना चाहता ही है। सवाल है कि आपको इतनी चुल्ल क्यों मची है कि मौके पर अपने बोल भर पाने का नमक खून में नहीं बचा पाए? दो दिन से बिहार पर स्यापा मचा रहे पत्रकारों को इतिहास की गति में वैचारिक-विपक्ष के व्यक्तिगत पापों और समझौतों को इग्नोर नहीं करना चाहिए, वरना कभी कुछ समझ नहीं पाएंगे।

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