मनोज अभिज्ञान-
भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नया बदलाव आने वाला है। भविष्य में न्यायालयों में आपको ‘रोबो जज’ दिखाई दे सकते हैं। नाम से लगता है कि मशीनें अदालत में बैठकर इंसानी जजों की तरह फैसले सुनाएंगी, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं है। यह तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हेल्पिंग सिस्टम है, जिसका काम केस से जुड़ी जानकारियां जुटाना, पुराने फैसलों का डाटाबेस तैयार करना और सबूतों का विश्लेषण करना है। यह असली जजों की जगह नहीं लेगी, बल्कि उन्हें तेज और निष्पक्ष फैसले लेने में मदद करेगी।
आंतरिक सूत्रों के अनुसार सबसे पहले ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन और जमीन से जुड़े सामान्य विवाद जैसे सीधे मामलों में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका मकसद अदालतों में लगातार तारीख मिलने की समस्या को कम करना और मुकदमों का निपटारा जल्दी करना है। e-Courts परियोजना के चौथे चरण में एआई और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों को शामिल किया जाएगा। इसके लिए बजट भी तय किया गया है और देशभर की अदालतों में ट्रेनिंग प्रोग्राम चल रहे हैं। अब तक आठ राज्यों की 3,000 से ज्यादा अदालतों में इस तरह का प्रशिक्षण हो चुका है। कई जजों को सिंगापुर और दूसरे देशों में भेजा गया है, ताकि वे वहां की न्याय प्रणाली से सीख सकें।
दुनिया में इस तरह के प्रयोग के उदाहरण पहले ही मौजूद हैं। एस्टोनिया में एआई का उपयोग 7,000 यूरो तक के मामलों के निपटारे में होता है। वहां एआई सबूतों का अध्ययन करके फैसला सुनाता है और अगर किसी पक्ष को आपत्ति हो तो इंसानी जज के पास अपील कर सकता है। चीन में भी एआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है और वहां लाखों मामलों का तेज निपटारा हो चुका है। इन अनुभवों से भारत भी सीख रहा है।
पहले से किए गए परीक्षण बताते हैं कि एआई की मदद से मामलों के निपटान की गति करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ी है और लंबित मुकदमों की संख्या 15 से 20 प्रतिशत तक कम हुई है। यह परिणाम बताते हैं कि सही तरीके से लागू होने पर यह तकनीक अदालतों का बोझ काफी हद तक घटा सकती है। खासकर छोटे मामलों में लोगों को समय पर न्याय मिल सकेगा और न्यायपालिका पर भरोसा और मजबूत होगा। अगर इसे सही ढंग से अपनाया गया तो यह कदम न केवल अदालतों की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाएगा बल्कि आम लोगों के लिए समय पर न्याय की उम्मीद भी मजबूत करेगा।
यहां यह याद रखना जरूरी है कि एआई खुद जज नहीं बनेगा। हर अंतिम फैसला मानव जज ही सुनाएंगे। एआई सिर्फ सुझाव देगा और दस्तावेजों की छानबीन करेगा। नैतिक दृष्टि से भी यह जरूरी है कि इस तकनीक की पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी तरह की गलती या पक्षपात से बचने के लिए मानव समीक्षा हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता पर हो।



