मनीष दुबे-
चुनाव आते-जाते रहते हैं, हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सवाल तब उठता है जब इस हार-जीत का उत्सव टीवी स्टूडियो के भीतर दिखने लगे—और उसे पेश करने वाला पत्रकार ही उस माहौल का हिस्सा नजर आए।
स्टूडियो सेटअप, “झालमुड़ी” और चुनावी माहौल के बीच Rubika Liyaquat की हालिया तस्वीरें, जिनमें वह स्टूडियो में जश्न जैसे माहौल में नजर आ रही हैं, सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं।
यहीं से शुरू होती है असली बहस। पत्रकार की भूमिका क्या है—सिर्फ खबर दिखाना या उस खबर का हिस्सा बन जाना? क्या स्टूडियो में जश्न का माहौल बनाना एंकर की पेशेवर सीमाओं के भीतर आता है, या यह निष्पक्षता की लकीर को धुंधला करता है?
मुद्दा किसी एक एंकर का नहीं, बल्कि उस लकीर का है जो पत्रकार और पक्षकार के बीच खींची जाती है। जब कैमरे के सामने “सेलिब्रेशन” जैसा दृश्य बनता है, तो दर्शक यह सोचने पर मजबूर होता है—क्या यह सिर्फ प्रेजेंटेशन है या किसी एक राजनीतिक नैरेटिव के प्रति झुकाव?
पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है दूरी—सत्ता से भी, विपक्ष से भी। लेकिन अगर वही पत्रकार किसी एक दल की जीत के साथ भावनात्मक या विजुअल तौर पर जुड़ता दिखे, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाज़मी है। फिर भले ही उसे “फॉर्मेट”, “एंटरटेनमेंट” या “स्टूडियो एक्ट” का नाम दिया जाए।
सोशल मीडिया पर उठ रहे तंज भी इसी बेचैनी का संकेत हैं। लोग पूछ रहे हैं—क्या अब खबर दिखाने और खबर का हिस्सा बनने के बीच की रेखा खत्म हो रही है? अगर ऐसा है, तो फिर एंकर और प्रवक्ता में फर्क क्या बचता है?
हकीकत यह है कि पार्टियों की जीत-हार चलती रहेगी, समीकरण बदलते रहेंगे। लेकिन अगर पत्रकारिता इन उतार-चढ़ाव में खुद को किसी एक पक्ष के साथ खड़ा दिखाने लगे, तो सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का होता है।
और अंत में वही सीधा सवाल— क्या TRP और तमाशे के बीच कहीं पत्रकारिता के मूल मूल्य तो नहीं छूट रहे?
ये एंकर रुबिका लियाक़त हैं. इनकी इस ‘लियाक़त’ के आगे बड़े बड़े पार्टी प्रवक्ता फेल हैं… -खुशदीप सहगल, वरिष्ठ पत्रकार




