सफाई के इस तमाम प्रचार अभियान में सफाईकर्मी ही गायब हैं

आज ही गांधी जी का जन्मदिन है. उनके कामों से और जो भी मतभेद हों पर गांधी जी अपना टॉयलेट अपने बड़े, बहुत बड़े व्यक्तित्व बन जाने तक खुद साफ़ करते थे। आज उन्ही के नाम पर सफाई की बातें हो रही हैं, पर बड़ी सफाई से सफाईकर्मियों के बदहाल जीवन की बातें इसमें बताई ही नहीं जा रही। सफाई के तमाम प्रचार अभियान में सफाईकर्मी का कोई चेहरा नहीं है। ऐसा कैसे हो जाता है! मूल मुद्दा गायब और कास्मेटिक मुद्दा हावी। clean day 640x480

सफाई कर्मियों की ये तस्वीरें भयावह हैं, इनकी तस्वीर तक देखने से जी मिचला जाता है। जो लोग इस गंदगी में उतरते हैं, उनका क्या हाल होता होगा??? सफाईकर्मियों की संख्या बढ़ाए बिना, काम में मशीनों को जोड़ना और वेतन बढ़ाए बिना कैसे कोई भी देश साफ़ रह सकता है?

हमने मंगल पर मशीन पहुंचा दी पर गटर में उतरने के लिए मशीन सफाईकर्मी तक नहीं पहुंचा पाए। सफाईकर्मी क्या इंसान नहीं है? क्या उसे खुशबुएँ बुरी लगती हैं? मैले में काम करना उसकी पसंद है या मजबूरी? क्या हम उसे इंसान का दर्ज़ा नहीं दे सकते?

जो एक दिन के लिए फैशन में झाडू पकड़े हैं वे फोटो शो कर रहे हैं, और जो सफाई करते हुए गन्दगी के दमघोटू माहौल में जान देता रहता है उसकी तस्वीर कहीं नहीं है। सफाईकर्मी, जिसे कभी समय से वेतन नहीं मिलता, और जो मिलता भी है वो बहुत ही कम, बेचारा आज सफाई के फैशन के दिन क्या सोच रहा होगा?

लेखिका संध्या नवोदिता सोशल एक्टिविस्ट और कवि हैं।

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