गांधी को जन-जन के दिल से निकालने का ये अंदाज कितना ‘स्वच्छ’ है?

…तो क्या ये समझा जाए कि गांधी को लोगों के दिल से निकालने की रणनीति पर केंद्र सरकार कामयाब हो रही है… ये सवाल इस वजह से परेशान कर रहा है क्योंकि सरकार ने गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान की चोचलेबाज़ी पाल ली है जो कि सिर्फ दो अक्टूबर और प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ही याद आती है… मज़ेदार बात तो ये है कि सरकार ने गांधी के नाम को गिराने के लिए भी गांधी का ही सहारा लिया और उनको स्वच्छता की श्रद्धांजलि का ढोंग रचा…

आप समझिए और सोचिए कि दो अक्टूबर को गांधी जयंती की बजाय अब सिर्फ स्वच्छता का राग अलापा जा रहा… कुछ बदलेगा ऐसा दिखाई नहीं देता… क्योंकि लोग जैसे माहौल में हैं, खुश हैं… लेकिन उन्हें राजनीतिक दुख दिखाकर मजबूर किया जा रहा क्योंकि अपना नंबर बढ़ाया जा सके… क्या स्वच्छता दिवस से पहले लोग कीचड़ में रहा करते थे… क्या इस ढोंग से पहले लोग कूड़े के ढेर पर सोया करते थे… क्या इस नौटंकीरूपी कार्यक्रम से पहले लोग नाले में बैठकर काम किया करते थे…

सच्चाई तो ये है कि कोई भी गंदगी में रहना पसंद नहीं करता… ऐसे में सरकार की ये पाठशाला सिर्फ BC (बातचीत) ही दिखाई देती है… टीवी चैनल गदंगी की तस्वीर दिखा कर खींसे बगार दे रहे हैं… और खुद को तुर्रमखां समझ कर दांत चियार रहे हैं… बात सिर्फ इतनी भर नहीं है… बात तो हरियाणा में और बढ़ चुकी है… अब स्वच्छता दिवस की नौटंकी के साथ-साथ ग्राम सचिवालय दिवस की होशियारी भी दिखाई जा रही… और इस पर भी राजनीति कर हंगामा खड़ा किया जा रहा… ताकि कांग्रेस भी गांधी को भूल जाए… और सरकार से ज़ुबानी जंग में उलझा रहे…

आप आरएसएस को अच्छे से जानते होंगे… और ये पूरी सरकार वहीं पर बचपना बिता चुकी है… तो इसे आप और अच्छे से समझ सकेंगे… मतलब यही समझ आ रहा कि गांधी को दिलों से भगाने की कोशिश तेज़ है… कुछ समय बाद 14 नवंबर पर भी किसी तरह का ढोंग रच कर जवाहर लाल नेहरू का नाम मिटाने की कोशिश की जाएगी… आप बस देखते रहिए…

पत्रकार संजय सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : sanjaysingh27sept@gmail.com

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अपनी नाकामी छिपाने के लिए गांधी-जगजीवन की निंदा करते हैं दलित!

-इं राजेन्द्र प्रसाद-

आज गाँधी की निंदा और उनके विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग करने वाले दलित नेताओं और उनके युवा अनुयायियों की संख्या बढ़ रही है। वे अपनी सभी समस्याओं के निदान में बाधक पूना-पैक्ट को मानते हैं। कुछ लोग जोर-शोर से ऐसा ही दुष्प्रचारित भी करते हैं। ऐसे लोगों में से अधिकतर पूना-पैक्ट की धाराओं को न तो जानते हैं और न जानने-समझने की चेष्टा करते हैं। उनका एकमात्र काम दलितों के बीच गाँधी की निन्दा करना होता है। आज गाँधी की निन्दा की बजाय गाँधी के समग्र कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही दलित अपने कथनी-करनी का भी आकलन करें। तभी हम गाँधी का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर सकते हैं। अन्यथा यह एकतरफा गैर-जिम्मेदाराना वक्तब्यों के अलावा और कुछ नहीं है।

गाँधी की आलोचना सकारात्मक होनी चाहिए, केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि कुछ करने के लिए। योजनाएं बनाकर कार्य करने और समाज में उपलब्धि प्राप्त करने के लिए। सिर्फ अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए, अपनी दायित्वहीन प्रवृत्ति को ढंकने के लिए गाँधी की आलोचना करना दलित समाज को नीचे ले जाएगा। यह उसी प्रकार की बात होगी, जिस प्रकार बड़ी जाति वाले अपने सभी दोषों को छोटी जाति वालों के मत्थे मढने का कार्य करते हैं। हमें इसका आत्म अवलोकन करना चाहिए।
    
यह सत्य है कि दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधि पाँच वर्ष के लिए सवर्णों की इच्छा पर ही चुने जाते हैं। इसलिए सवर्णों का दबाव उनपर रहता है। माना कि वोट के लालच या भय से ये गुलामीगिरी करते हैं। अधिकतर बेशर्मीपूर्वक दलित हित के विरुद्ध कार्य करते हैं। लेकिन दलितों के प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर ऐसा कोई दबाव नहीं होता है। वे एक बार नियुक्त होने के बाद सेवानिवृत्ति तक कार्यरत रहते हैं। वे सामान्यतः 30-40 वर्ष तक कार्यरत रहते हैं। फिर क्यों वे अपने समाज के हितों के प्रतिकूल कार्य करते हैं? कुछ अपवाद जरूर है, पर अधिकतर ऐसे ही हैं। सवर्णों के काम उनके भय अथवा प्रलोभन में ये कर देते हैं। उनके गलत कार्यों को भी करने में नहीं हिचकिचाते हैं। लेकिन ये दलितों के सही कामों को करने में भी कई कई बार आगा पीछा सोचते हैं। प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर पूना पैक्ट का कोई दखल नहीं है। इसमें कम्यूनल अवार्ड को जस का तस स्वीकार किया गया था। फिर भी दलित अधिकारी दलितों को न्याय नहीं दे पाते हैं। कारण क्या है?

यह एक ज्वलंत प्रश्न है जिस पर विचार करने की आवश्यकता है। कहीं तो कोई बुनियादी खराबी है। ये 30-40 साल तक सेवारत सरकारी सेवक क्यों नहीं अपने कलम की धार तेज कर पाते हैं? ये बाबा साहब के ‘पे बैक टू सोसाईटी’ के वसूलों पर अमल क्यों नहीं करते हैं? क्या दलितों का भला करने की जिम्मेदारी सिर्फ विधायिका की बनती है और कार्यपालिका केवल अपने परिवार की मौज मस्ती के लिए है? जब आरक्षित वर्ग की कार्यपालिका जिसमें प्रोन्नति में भी आरक्षण दिया गया है, लोभ या भयवश कार्य करती है, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि पृथक निर्वाचन से चुने गए प्रतिनिधि भी लोभ, भय या दबाव में नहीं रहेंगे? अथवा वे अपने उपजाति के लिए अन्य अनुसूचित उपजातियों के हितों की अवहेलना नहीं करेंगे। आज क्यों अनुसूचित जातियों और जनजातियों के केवल चार-पाँच उपजातियों का ही प्रतिनिधित्व हो पाया है? शेष उपजातियां उपेक्षित ही हैं। समाज इस पर मुखर क्यों नहीं हो रहा है?
     
सरकारी सेवाओं में आरक्षण के कारण एक निश्चित संख्या में हिस्सा भी दलितों को मिला। उनके सरकारी सेवा में रहने, पद-प्रतिष्ठा पाने का उन्हें लाभ अवश्य मिला पर उनके पद-प्रतिष्ठा का कोई ज्यादा असर समाज के निचले हिस्से की बेहतरी पर नहीं दिखता है। जो थोड़ा बहुत बदलाव नजर आता है वह वयस्क मताधिकार के ‘एक व्यक्ति: एक मत: एक मूल्य’ की वजह से है जो बाबासाहब और गाँधीजी का दिलवाया हुआ अमूल्य हथियार है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है, उसे दिलवाने में अम्बेडकर और गाँधी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। क्योंकि उस समय सवर्णों के कई लोग षिक्षित और जमीन-जायदात वालों को ही वोट के अधिकार देने की वकालत की थी, साइमन कमीशन के आने पर सबके लिए वयस्क मताधिकार का विरोध किया था। पर गाँधी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया।

डॉ0 अम्बेडकर ने इसी वोट के अधिकार के बल पर दलितों-पिछड़ों को राजसत्ता प्राप्त करने और जातिविहीन समाज के निर्माण का आह्वान किया था और कहा था कि स्वतंत्र भारत में हम शासक होंगे। लेकिन क्या उनके अनुयायी ऐसा कर रहे हैं? यह इसी वोट के अधिकार का प्रतिफल है कि आज अम्बेडकर के धुरविरोधी भी जोर शोर से उनका यशोगान कर रहे हैं। सियासी दल एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर अम्बेडकर के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति प्रदर्शित कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि पहले अधिकतर दलितों को वोट नहीं देने दिया जाता था। उनके नाम पर जबरन दूसरे वोट दे देते थे। लेकिन निर्वाचन आयोग की सख्ती, पहचान पत्र की अनिवार्यता एवं तकनीकी विकास  और जागरुकता की वजह से दलित अब अधिकतर जगह अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगे हैं। जिससे अब दलित का वोट सबके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। सवर्ण राजनीतिज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दल दलित वोट की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। दलितों को यह षक्ति वोट के अधिकार से मिली है। इस वयस्क मताधिकार की शक्ति ने सारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को प्रभावित किया है। इसने दलितों -पिछड़ों की शक्ति को उत्तरोत्तर आगे बढाया है। इसी शक्ति के चलते दलित वर्ग से महामहिम राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष बनाए गए।

जिस प्रकार दलित प्रतिनिधि सवर्णों से भय खाते हैं, उसी प्रकार संगठित दलितों से सवर्णों के प्रतिनिधि भी भयभीत रहते हैं। दलितों के वोट के कारण संगठित दलितों के काम करने को सवर्ण प्रतिनिधि उसी तरह तत्पर रहते हैं, जिस तरह दलित प्रतिनिधि सवर्णों के काम करने के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि दलित समुदाय की सभी उपजातियाँ संगठित हों और अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठावें, अपने दायित्व के प्रति मुखर हों।

गाँधी की निंदा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दलितों के प्रतिनिधि दलित सरोकारों के मामले में तू-तू, मैं-मैं को छोड़कर उसे हल कराने में इमानदारीपूर्वक पहल करें। आज के दलितों के लिए यह आवष्यक है कि वे केवल गाँधी की निंदा करने, उन्हें भला-बुरा कहने की बजाय अपने बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधियों के कार्यकलापों की विवेचना करें। सरकार के कार्यों की समीक्षा करें। अपने कमियों को सुधारने के लिए रणनीति बनावें, दबाव समूह का कार्य करें। उस पर अमल करें। डॉ0 अम्बेडकर के मूल मंत्र ‘‘शिक्षित बनो, संगठित होओ, संघर्ष करो’’ और ‘पे बैक टू सोसाइटी’ पर चलें तो समाज का ज्यादा भला होगा।

दलितों का प्रबुद्ध वर्ग सबसे ज्यादा असंगठित है। वह अम्बेडकर के वसूलों के विरुद्ध आचरण करता है। वह चाहता है कि बाबासाहब के समानता और संघर्ष के मंत्र को दूसरे समझें और आचरण करें। जबकि यह काम उन्हें सबसे पहले स्वयं करना है। जिस दिन यह बौद्धिक वर्ग अपने सुख की परवाह किए बगैर संगठित होकर संघर्ष की ओर बढेगाा, सवर्ण अपने फायदे और पूर्वाग्रह को छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र होगी। आज दलित समुदाय के सेवानिवृत्त कर्मियों की संख्या बहुत बढी है जो सामाजिक कार्यों की बजाय अधिकतर घरों में ही रहते हैं। उन्हें दायित्व के प्रति सक्रिय होना होगा।

उन्हें यह समझना चाहिए कि सतत् परिश्रम और मितव्ययिता के व्यवहार से मनुष्य को जीवन में सफलता मिलती है। बहता हुआ पानी और गुजरता हुआ समय लौटकर नहीं आता है इसलिए उन दोनों का समय पर सदुपयोग हमेशा किया जाना चाहिए। संविधान ने हमें अपने अधिकारों के साथ ही उसे प्राप्त करने तथा अत्याचारों के प्रतिकार के कई उपाय मुहैय्या कराए हैं। यही संवैधानिक तरीके हमें सामाजिक-आर्थिक न्याय,  खाद्य, आजीविका, षिक्षा आदि के अधिकार प्राप्त करने के माध्यम हैं, उसका लाभ लेने के लिए हमें लोगों को जागरुक बनाने और  सामूहिक रूप से संघर्ष करने की जरूरत है।

हमें केवल 1932 के गाँधी को कोसने और उनकी निंदा में व्यर्थ समय गवाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। बल्कि इससे अन्य लोगों कि यह टिप्पणी सुननी पड़ती है कि दलित बैठे बिठाए सब कुछ खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। ये बयानवीर हैं, कर्मवीर नहीं। ये आजीवन विकलांग ही बने रह कर खैराती बनना चाहते हैं। अब दलितों को कोई मदद न करे।  मान्यवर कांशी राम का यह कथन भी प्रासंगिक और विचारणीय है कि हमें पृथक निर्वाचन की माँग की बात पर एक मिनट का भी समय बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि जब ब्रिटिश राज में बाबासाहब जैसे व्यक्ति इसे नहीं प्राप्त कर पाए तो इस हुकुमत में इस पर सोचना भी व्यर्थ है। हमें संघर्ष कर इस लायक बनना है कि हम हुक्मरान बने। हम दाता बनें, याचक नहीं बनें।

सन् 1932 के कम्युनल अवार्ड में पृथक निर्वाचन की आरक्षण व्यवस्था 10 वर्ष के लिए थी। यह सच है कि 1932 में गाँधी के पूना आमरण अनशन ने दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन पद्धति को निश्चित किया। किन्तु इसने अम्बेडकर के कद को बहुत ही ऊँचा किया। अम्बेडकर के मंच को विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिली। अम्बेडकर देश-विदेश में अछूतों और वंचित तबकों के निर्विवाद नेता बने, सामाजिक क्रान्ति के योद्धा कहे गए। साथ ही वे राष्ट्रीय नेताओं की अग्रिम पक्ति में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाए। गाँधी ने सवर्ण हिन्दुओं की अन्तरात्मा को झकझोरा और अछूतों के प्रति उनके द्वारा किए जा रहे पापों को प्रायश्चित करने के लिए प्रेरित किया। सवर्णों में आत्म शुद्धि आंदोलन चलाया। गाँधी के आह्वान पर उस समय अछूतों के उद्धार के लिए कुछ हिन्दुओं ने अपना जीवन समर्पित किया। उनका कहना था कि हिन्दू समाज को हमने गंदा किया है, हम उसे साफ करेंगे। जिससे अछूतों के प्रति देशभर में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्थिति में बहुत जगह परिवर्तन आया। 

आज इतने सुरक्षात्मक कानूनों और जागरूकता के बावजूद दलित बहुत जगह असहाय स्थिति में हैं। तब 90 वर्ष पूर्व, जब उनके सुरक्षा के कानून नहीं थे तब दलित कितने  दयनीय हालत में रहे होंगे? यह कल्पना की जा सकती है। समय के साथ तथा अपने अनुभवों के आधार पर गाँधी बहुत बड़े संषोधनवादी थे। अपनी पुरानी मान्यताओं को बदलने में देर नहीं करते थे। इसलिए गाँधी के पूर्व और बाद के विचारों और कार्यों में विरोधाभाष दिखाई पड़ता है। गाँधीजी द्वारा सन् 1932 के पहले जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था को मानना और फिर कुछ वर्ष के बाद 1942 के आस पास अर्न्तजातीय विवाहों जिसमें एक पक्ष हरिजन हो, का जबरदस्त समर्थक बनना, उनमें से एक था। इस समय उन्होंने किसी भी ऐसे वर-वधु को आशीर्वाद नहीं दिया, जिसने सजातीय शादी किया। अपने परिवर्तित विचारों को गाँधी सत्य का प्रयोग कहते थे। गाँधी से प्रेरित होकर उस समय सवर्णों के अधिकतर प्रबुद्ध लोगों ने अपने से छोटी जातियों के पुरुष-महिला से अन्तर्जातीय विवाह किया था। उतना अन्तर्जातीय विवाह तो दलितों की विभिन्न उपजातियों ने भी आपस में नहीं किया। जबकि बाबासाहब ने जाति तोड़ो और एक अनुसूचित जाति बनों का आह्वान किया था।

गाँधी की हत्या सनातनियों ने क्यों की? पहला अनुसूचित जातियों का पक्ष लेने से वे अन्दर अन्दर गाँधी से चिढ़े हुए थे। उनके अन्दर आक्रोश था, पर दबा हुआ था। दूसरा कारण जब गाँधी ने मुसलमानों के हितों का पक्ष लेना शुरू किया तो वह आक्रोश एक आकार लिया और सुनियोजित तरीके से उनकी हत्या कर दी। आज गाँधी की स्थिति गाँव के पंचायती करने वाले और शादी ब्याह के उस अगुआ की तरह है जो दोनों पक्षों का काम बनवा देता है लेकिन बाद में दोनो पक्षों का अप्रिय बन जाता है। उस व्यक्ति से दोनों पक्ष रुष्ट रहता है, उससे गाली सुनता है। आजादी के बाद गाँधी की भूमिका को उनकी हत्या के बाद उनके अनुयायियों ने न केवल सीमित कर दिया बल्कि उसे धीरे-धीरे दफनाने का भी कार्य किया। गाँधी के नाम पर गाँधीवादी कुछ दिन मलाई खाते रहे, पर कब तक खाते। अत्याचारों के खिलाफ दलितों का गुस्सा गाँधीवादियों के साथ सवर्णों पर होना चाहिए, न कि गाँधी पर। दलित उत्पीड़न के विरुद्ध जाने माने गाँधीवादी या गाँधीभक्त संघर्ष के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जिसका कारण गाँधीवादी आज गाँधी के सद्धान्तों को अपने से अलग कर दिए हैं। वे छद्म- गाँधीवादी बन कर गाँधी का पाठ कभी-कभी अपने निजी फायदे के लिए करते हैं ।

अम्बेडकर ने वंचित लोगों में आत्म सम्मान और मानव अधिकार के लिए संघर्ष करने की ज्योति जलाई। उसके बाद सामाजिक-आर्थिक न्याय का युग शुरू होता है, जिसके प्रतीक अम्बेडकर हैं। यह अभी चल रहा है। पर लगता है उनके अनुयायी कहीं उनका हश्र गाँधी जैसा न कर दें। अम्बेडकर को जितना खतरा अम्बेडकरवादियों से है उतना अन्यों से नहीं है। जिस प्रकार गाँधी को गाँधीवादी समाप्त करते जा रहे हैं, उसी प्रकार अम्बेडकर को अम्बेडकरवादी समाप्त  करने में लगे हैं। वे जितनी जोर से अम्बेडकर के नाम और सिद्धान्त  की माला का जाप करते हैं,उतना ही ज्यादा उनके सिद्धान्तों को तिलांजलि भी देते जा रहे हैं।  उनके कथनी और करनी की खाईं चौड़ी से चौड़ी होती जा रही है। अम्बेडकर की महानता और उनके नाम का इस्तेमाल हमें उनके मिषन को आगे बढाने में किया जाना चाहिए, अपनी अकर्मण्यता को ढकने और नए महंथ या नए पंडा बनने के लिए नहीं ।

गांधी के कार्यों के दूसरे पहलू का अध्ययन किया जाना भी जरूरी है। उल्लेखनीय है कि 1 मई 1946 को डॉ0 अम्बेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिशद (मंत्रिमंडल) से त्याग पत्र दे दिया। वायसराय लार्ड वेवल ने 13 अगस्त 1946 को काँग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम कार्यकारी परिशद का पुर्नगठन किया। 2 सितम्बर 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में नई अंतरिम कार्यकारी परिशद ने पदभार ग्रहण किया। जिसमें डॉ0 अम्बेडकर का स्थान जगजीवन राम ने लिया। काँग्रेस सरकार का दृष्टिकोण 1946 में संकुचित और उदार दोनों हुआ। संकुचित इस अर्थ में कि वे लोग संघर्ष, सिविल नाफरमानी और आंदोलन के खिलाफ हो गए, जबकि इसी के बल पर काँग्रेस लोकप्रिय हुई थी। उदार इस मामले में कि वे अपनी पूर्व की धारणा को बदल कर राष्ट्र निर्माण में सभी विरोधी पक्षों का सहयोग लेने को तैयार हुए।

देश 1947 में आजाद हुआ, पर यह दो टुकड़ों – भारत और पाकिस्तान में बंटा। डॉ0 अम्बेडकर 1946 में पूर्वी बंगाल से केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य चुने गए थे। 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनकी सदस्यता समाप्त होने वाली थी। क्योंकि डॉ0 अम्बेडकर पूर्वी बंगाल के जिस स्थान से चुनकर आए थे, वह भाग पाकिस्तान में चला गया, उनकी सदस्यता पाकिस्तान के संविधान सभा के साथ जुड़ गई। डॉ0 अम्बेडकर भारत के केन्द्रीय विधान सभा (संविधान सभा) की सदस्यता समाप्त होने वाली थी। इसी बीच बम्बई से काँग्रेस के चुने गए सदस्य डॉ0 एम0 आर0 जयकर ने सन् 1947 में केन्द्रीय विधान सभा से त्याग पत्र दे दिया।

उन्हें नए बनने वाले पूना विश्वविद्यालय (वर्तमान सावित्री बाई फूले पूना विश्वविद्यालय) के कुलपति के पद पर नियुक्त किया गया था। बम्बई के उस रिक्त स्थान से सन् 1947 में डॉ0 अम्बेडकर केन्द्रीय विधान सभा (भारतीय संविधान सभा) में निर्विरोध चुन कर आए। काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के विरुद्ध कोई प्रत्यासी नहीं खड़ा किया, काँग्रेस ने अपने प्रत्यासी से नाम वापस करवा लिया।  इसके बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर को पहले संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का सदस्य और फिर संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष और कानून मंत्री बनाया, जिसे डॉ0 अम्बेडकर ने स्वीकार किया। डॉ0 अम्बेडकर ने संविधान सभा में स्वयं यह स्वीकार करते हुए कहा था कि ‘मैं काँग्रेस का घोर विरोधी रहा हूँ इसलिए जब संविधान सभा ने मुझे प्रारूप समिति के सदस्य के लिए चुना तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। मुझे तब और भी आश्चर्य हुआ जब मुझे उस समिति का अध्यक्ष चुना गया।’

डॉ0 अम्बेडकर को यह सब गाँधीजी के कहने पर मिला। यदि गाँधीजी नहीं चाहते तो डॉ0 अम्बेडकर को यह तीनों पद नहीं मिल सकता था। यहाँ हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर दलित समाज के हित में संविधान में जो कुछ भी किए वह गाँधी और काँग्रेस के योगदान के बिना पूर्ण नहीं हो सकता था। वे जो कुछ किए वह गाँधी और काँग्रेस के सहयोग से ही कर पाए, क्योंकि वे अपने दल के एकमात्र सदस्य थे। ब्रिटिश सरकार के चले जाने के बाद अम्बेडकर दबाव बनाने की स्थिति में नहीं थे। आजादी के बाद जो कुछ दलितों को मिला, उसमें गाँधी का योगदान विशेष महत्व का है। यह गाँधी के आत्मशुद्धि आन्दोलन और अम्बेडकर के आत्मसम्मान तथा मानवाधिकार आन्दोलन के कारण सम्भव हुआ। इसमें गाँधी और अम्बेडकर के कार्य एक दूसरे के पूरक की तरह हैं, विरोधी की तरह नहीं। इसे समझा जाना चाहिए। 

जिस तरह आजादी के पूर्व लम्बे समय तक गाँधी-अम्बेडकर के बीच तीखे वाद-विवाद, कटु आरोप-प्रत्यारोप हुए, उसके बावजूद यह गाँधी का बड़प्पन था कि उन्होंने अम्बेडकर को तीनों पद दिलवा कर उदारतापूर्वक व्यवहार किया। राष्ट्र  निर्माण में  अम्बेडकर के योगदान में चार चाँद लगाया। यह गाँधी के दलित उत्थान और डॉ0 अम्बेडकर के प्रति उनके सोच को दर्षाता है। आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर की जो स्थिति बनी थी ,उसमें यदि आज के नेता लोग रहते तो उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर रख देते। ये उन्हें पाकिस्तान में षरण लेने का उपदेश देने से भी नहीं चूकते।

बंगाल के सर जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के ही सदस्य बने रहे। उनका दर्जा पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के बाद का था। वे पाकिस्तान संविधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए थे। बाद में वे पाकिस्तान के कानून और श्रम मंत्री बनाए गए।  लेकिन जिन्ना की मृत्यु के बाद सन् 1950 में जब प्रधान मंत्री लियाकत अली खाँ ने संविधान के विरुद्ध पास्तिान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोशणा की तो उन्होंने खिन्न होकर सरकार से त्याग पत्र दे दिया। 10 पृष्ठों का यह त्याग पत्र पढ़ा जाना चाहिए। बाबासाहब डॉ0 अम्बेडकर के सम्पर्क में 25 वर्ष के लेखक सोहन लाल शास्त्री के शब्दों में अछूतों के लिए डॉ0 अम्बेडकर ने माता की भूमिका अदा किया और गाँधी ने एक उच्च कोटि के कुशल डॉक्टर और नर्स का काम किया।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू देश के संविधान को बनाने हेतु विदेश के विषेशज्ञों को नियुक्त करने के लिए गाँधीजी से मषविरा करने गए थे। गाँधीजी ने कहा कि देश में ही ऐसे  व्यक्ति हैं, उसे यह काम क्यों नहीं सौंपते हो ? चर्चा के क्रम में जब गाँधीजी ने डॉ0 अम्बेडकर का जिक्र किया, तो नेहरू ने प्रतिवाद किया कि वह काँग्रेस का धुर विरोधी है, आपकी भी कटु आलोचना करता है। गाँधीजी ने प्रत्युत्तर में कहा कि इस देश को आजाद कराने में सबका योगदान है, केवल काँग्रेस का नहीं। प्रत्येक के कार्यों की आलोचनाएं होती रहती है लेकिन आलोचना ही लोकतंत्र को गतिषील बनाती है। 

हमें मिलजुल कर सबके साथ देश का निर्माण करना है। यह देश हम सबका है। शासन में सबका हिस्सा होना चाहिए। नेहरू ने गाँधीजी के आदेश का अनुपालन किया। नेहरू और पटेल ने डॉ0 अम्बेडकर से मंत्रिमंडल में षामिल होने का अनुरोध किया। वार्ताक्रम में कुछ बिन्दुओं पर गतिरोध पैदा हुआ। मतभेद वाले बिन्दू पर वार्ता हुई। आखिरकार नेहरूजी ने स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को डॉ0 अम्बेडकर के निवास स्थान पर भेजकर उन्हें आमंत्रित किया। डॉ0 अम्बेडकर को मंत्री पद की षपथ दिलाई गई। यह सब गाँधीजी का डॉ0 अम्बेडकर के प्रति अनुराग और सदासयता का ही परिणाम था। गाँधीजी की मृत्यु के बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के साथ क्या सलूक किया? अम्बेडकर न केवल दो लोकसभा (सन् 1952 के बम्बई का आमचुनाव और 1954 के भंडारा का उपचुनाव) का चुनाव हार गए बल्कि बुद्ध की 2500वीं वर्षगांठ सन् 1956  के अवसर पर लिखी गई उनकी पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धर्म’ को छपवाने में आर्थिक सहायता करने के उनके अनुरोध को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।

आउटलुक पत्रिका, दिल्ली, अगस्त-सितम्बर 2012, स्वधीनता विषेशांक के एक सर्वेक्षण ‘गाँधी के बाद महानतम भारतीय की तलाष में संविधान निर्माता अव्वल’, (आजादी के बाद जय भीम,लेकिन कब आजाद होगा आम दलित)  को पढा जाना चाहिए। स्पष्टतः आधुनिक भारत में जहाँ से गाँधी की भूमिका खत्म होती है, वहीं से अम्बेडकर-जगजीवन राम की भूमिका शुरू होती है। यानी राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक-आर्थिक आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई ।

बकौल मधु लिमये ‘‘अम्बेडकर और गाँधीजी के लेखों,वक्तब्यों, कार्यों और चिंतन का अध्ययन करने वालों को कभी-कभी यह बात उलझन में डालती है कि उनके विचार लगाातार बदलते रहे। जब गाँधीजी को पहले व्यक्त किए गए विचारों की याद दिलाई जाती थी तो वे प्रष्नकर्ताओं से कहते थे कि इन असंगतियों को न देखें, उनके वर्तमान मत को ही प्रमाणिक माने। यह उनके सत्य का प्रयोग है। डॉ0 अम्बेडकर के विचार भी सभी प्रष्नों पर अपरिवर्तनीय नहीं थे। जाति-संस्था के उन्मूलन और राष्ट्र की मजबूती के लिए समतामूलक समाज की स्थापना के प्रष्न को छोड़ कर अन्य प्रष्नों पर उनके विचार काफी लचीले थे।

विचारों के सातत्य,संगति तथा स्थिरता के प्रति डॉ0 अम्बेडकर का रवैया वही था जो गाँधीजी का था। एकबार डॉ0 अम्बेडकर ने इमर्सन का हवाला देकर कहा कि विचारों की स्थिरता गधे का गुण है और मुझे अपने आपको गधा बनाना अभीश्ट नहीं है। केवल सातत्य के लिए किसी भी विचारषील प्रणाली को एक ही मत से नहीं बंधे रहना चाहिए। अमूर्त सातत्य की अपेक्षा मूर्त परिस्थिति ज्यादा महत्वपूर्ण है और मनुश्य को सीखी हुई बात को भूलना भी जरूरी है। एक जिम्मेदार आदमी में पुनर्विचार करने और अपने विचारों को बदलने का साहस होना चाहिए। जरूरी बात यह है कि विचारों की अन्तिमता को बदलने के लिए अच्छे और प्रर्याप्त कारण होने चाहिए। ‘‘

डॉ0 अम्बेडकर ने आरक्षण की माँग वंचित तबके के सषक्तिकरण के लिए तात्कालिक रूप से किया था। यह सदा के लिए नहीं था। आरक्षण अम्बेडकर का लक्ष्य नहीं था। डॉ0 अम्बेडकर का लक्ष्य था ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का अंत कर जातिविहीन समाज और समाजवाद की स्थापना करना। लेकिन उनके दलित अनुयायी उनके सिद्धान्तों की बलि चढाकर केवल आरक्षण रूपी मलाई खाने में व्यस्त हैं। यही नहीं वे आपस में उपजाति का भेदभाव और जहर फैलाने से भी नहीं चूकते हैं।

ऐसे लोग मलाई खाने के बाद अपने से नीचे के व्यक्तियों से बहुत दूरी बना कर ही रहते हैं। यहाँ तक कि वे अपने पैतृक गाँव-घर से भी रिस्ता नहीं निभाते हैं। दलितों में यह जो नया मध्यम वर्ग पैदा हुआ है,वह ब्राह्मणों जैसा बौद्धिक रूप से बेइमान बन गया है। वह अधिकार बोध के तहत सिर्फ माँग करता है। संघर्ष नहीं करता है। वह कर्त्तब्य और संघर्ष की अपेक्षा दूसरों से करता है। उसे दायित्व नहीं अधिकार चाहिए। दायित्व के बिना अधिकार व्यक्ति को कर्महीन, उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी बनाता है। यह क्रम यदि चलता रहा तो ऐसे दलितों की हालत उन ब्राह्मणवादियों से भिन्न नहीं होने जा रही है जिसकी आज सर्वत्र निन्दा होती है ।

आज दलितों का धुर गाँधी-विरोधी और उग्र-अम्बेडकर समर्थक तबका इन तथ्यों को या तो जानते ही नहीं हैं अथवा जानने पर भी अनजान बनने का प्रदर्षन करते हैं।  वे आँख मूद कर अपनी हर समस्या के लिए केवल गाँधी के 1932 के आमरण अनषन की दुदुम्भी बजाते रहते हैं। गाँधी के प्रति विद्वेशपूर्ण बातें कहने और प्रचारित करने में मसगूल रहते हैं। ऐसे लोग दलितों का कितना भला करेंगे ?

जिस तरह दलितों के बीच  गाँधी की निंदा की जाती है उसी तरह जगजीवन राम की भी दलित समाज बिना सोचे समझे निंदा में लिप्त रहता है। दलित उत्थान में  जगजीवन राम के योगदान का मूल्यांकन करने और समझने की बजाय एकतरफा उन्हें अम्बेडकर विरोधी से लेकर न जाने कितने अनुचित विषेशणों से नवाजा जाता है। जगजीवन राम के राजनीतिक विरोधियों ने उनके बारे में जो सगूफा उस वक्त छेड़ा था, उसी डफली को आज भी दलित बजा रहे हैं।

जिस प्रकार नब्बे के दसक के पूर्व घोर सवर्णवादी लोग अम्बेडकर को हिन्दू विरोधी, देशद्रोही, अंग्रेजों का पक्षधर और अन्य अपमानजनक टिप्पणियां करते थे, उसी प्रकार, कुछ अपने को प्रखर बुद्धिवादी और कट्टर दलित नेता कहलाने वाले भी जगजीवन राम के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी करने से नहीं चूकते हैं। वे जगजीवन राम को ब्राह्मणवाद के खुषामदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जगजीवन राम के काँग्रेसी होने को वे ऐसे प्रचारित करते हैं, जैसे उन्होंने एक बहुत बड़ा अपराध किया हो। जगजीवन राम के विरुद्ध बोलना उनलोगों ने एक फैशन बना लिया है। उन्हें जगजीवन राम के कार्यों को दाएं-बाएं, आगे-पीछे देखने की फुर्सत आज तक नहीं मिली।

ऐसे प्रखर दलित मायावती के ब्राह्मण प्रेम या गठजोड़ पर जय-जयकार करते हैं, जबकि वे पानी पी-पीकर जगजीवन राम को इसके लिए कोसते रहते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आज गांधी-जगजीवन की निंदा की जानी चाहिए? उत्तर होगा कदापि नहीं। तब उन दोनों की निंदा करने का मायने क्या है ? स्पष्टतः उनकी निंदा अपनी अकर्मण्यता और नाकामी को छिपाने के लिए की गई असफल कोशिश है।

लेखक इं राजेन्द्र प्रसाद बिहार अभियंत्रण सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी और सामाजिक चिंतक हैं. उनसे संपर्क 09472575206 या r.prasadee5@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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गांधी जी के नग्न स्टैच्यू-विवाद की जांच सात माह बाद शुरू

ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कभी महात्मा गांधी को धोती पहनने पर अर्धनग्न फकीर से संबोधित किया था. लेकिन गुजरात के गांधीनगर में जनवरी 2015 में आयोजित प्रवासी दिवस में गांधीजी की नग्न मूर्तियों के प्रदर्शन को लेकर जो विवाद उठा था अब उसकी जांच सात महीने के बाद प्रारंभ की जा रही है. गौरतलब है कि गांधीनगर के सेक्टर 7 में जांच के आदेश दिए गए हैं और यह जांच भी बार-बार एक सूचना कार्यकर्ता के फरियाद करने पर की जा रही है.

उल्लेखनीय है कि गांधीजी के 1915 में भारत वापस लौटने की शताब्दी पर गांधीनगर के महात्मा मंदिर में धूमधाम से प्रवासी दिवस के रुप में मनाया गया था जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर कई मंत्री और विदेशी हस्तियां भी मौजूद थीं। यूके के एक कलाकार ने इस प्रवासी दिवस पर महात्मा गांधी की नग्न मूर्तियों का प्रदर्शन किया था. 1930 में गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नमक सत्याग्रह किया और दांडी मार्च कूच किया था. इन कलाकृतियों में नग्न गांधीजी के प्रतीक को नमक के टुकड़ों के साथ दिखाया गया है.

गौरतलब है कि आयोजित प्रवासी दिवस में गांधीजी की इन कलाकृतियों को दिखाने का जमकर विरोध हुआ था और इस पर विवाद भी उठा था और बाद में इन कलाकृतियों को हटा लिया गया. लेकिन एक सूचना कार्यकर्ता ने इन मूर्तियों के प्रदर्शन पर गुजरात सरकार, मुख्यमंत्री, कलाकार और वायब्रेंट गुजरात आयोजक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की शिकायत दर्ज की थी और पिछले सात महीनों से वह लगातार शिकायत कर जांच की मांग कर रहा था. 

उन्होंने केन्द्र में गृह मंत्रालय को भी सूचना दी थी. सूचना कार्यकर्ता रोशन शाह का कहना है कि गांधीजी को राष्ट्रपिता कहा जाता है और ऐसे में इस तरह की मूर्तियों का प्रदर्शन करना महात्मा गांधी का अपमान करने जैसा है, इसीलिए इस पर शीघ्र ही प्राथमिकी की जानी चाहिए. गांधीनगर के सेक्टर 7 में जहां यह मामला दर्ज किया गया है वहां के पुलिस इंस्पेक्टर मेहुल चौहान का कहना है कि अभी जांच चल रही है और अगर जरुरत हुई तो प्राथमिकी दर्ज की जाएगी. अब देखना यह होगा कि क्या इस पर प्राथमिकी दर्ज की जाएगी या नहीं?   

उषा चांदना से संपर्क – ushachandna55@gmail.com

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गांधी और नेहरू को सोशल मीडिया पर बदनाम करने की गहरी साजिश का भंडाफोड़

Rajesh Singh Shrinet : फेसबुक पर किस तरह अपने देश और देश के पुराने नेताओं के बदनाम करने की साजिश रची जा रही है, वह इन दो फोटोग्राफ से जाहिर हो जाता है। मेरी अपील है कि इस तरह की साजिश का हिस्सा न बनें। या तो इसका सही जवाब दें या फिर ऐसे गलत फेसबुकिया दोस्तों को अनफ्रेंड कर दें।

 

पत्रकार राजेश सिंह श्रीनेत के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कई कमेंट में से एक Abhay Paprikar की टिप्पणी : These “Rashtra bhakt” do not have a history. So, the best they can do is to distort/fabricate history! They are “masters” of this art. But these “pious” people forget what Abraham Lincoln said ” you can fool some people for some time but you cannot fool all the people all the time “! These people are a disgrace!!!

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गांधी की टेक

भारतीय समाज में पिता की मौजूदगी जितनी जरूरी होती है, शायद उनका नहीं रहना उन्हें और भी जरूरी बना देता है. ऐसे ही हैं हमारे बापू. बापू अर्थात महात्मा गांधी. आज बापू को हमसे बिछड़े बरसों-बरस गुज़र गये लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया, उनकी जरूरत हमें और ज्यादा महसूस होने लगी. एक आम आदमी के लिये बापू आदर्श की प्रतिमूर्ति बने हुये हैं तो राजनीतिक दल वर्षों से उन्हें अपने अपने लाभ के लिये, अपनी अपनी तरह से उपयोग करते दिखे हैं. अब तो गांधी के नाम की टेक पर सब नाम कमा लेना चाहते हैं. मुझे स्मरण हो आता है कि कोई पांच साल पहले कोई पांचवीं कक्षा की विद्यार्थी ने सूचना के अधिकार के तहत जानना चाहा था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा किस कानून के तहत दिया गया? बच्ची का यह सवाल चौंकाने वाला था लेकिन तब खबर नहीं थी कि उसने अपने एक बेहूदा सवाल से पूरे समाज को गांधी की एक ऐसी टेक दे दी है जिसे सहारा बनाकर नाम कमाया जा सकता है अथवा विवादों में आकर स्वयं को चर्चा में रखा जा सकता है. 

गांधी की टेक लेकर जस्टिज मार्केण्ड काटजू ने गांधीजी के बारे में जो कुछ कहा, वह चर्चा के योग्य नहीं है. यह इसलिये नहीं कि उनकी बातों में कितनी थाह है अथवा नहीं बल्कि इसलिये जिस बापू के देश में काटजूजी ने अपने उम्र के सर्वाधिक वर्ष गुजार दिये, उस देश में, इतने वर्षों बाद गांधीजी पर टिप्पणी करने की समझ और साहस कहां से आयी? उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि गांधीजी ने क्या कहा, क्या किया और उसके क्या मायने निकले. सच तो यह है कि बाबा काटजू इस उम्र में आकर स्वयं को खबरों में बनाये रखने की जो मन ही मन एक लिप्सा पाले हुये हैं, उसकी परिणिती में यह अनमोल वचन बोलने के लिये उन्हें उनके मन ने मन मजबूर किया होगा . किसी को इस बात से आपत्ति हो सकती है कि काटजू जी को मैंने बाबा क्यों कहा, और शायद वही  बच्ची मुझसे यह सवाल कर सकती है कि किस कानून के तहत आपने काटजूजी को बाबा संबोधन दिया तो मेरा एक ही जवाब होगा कि उम्रदराज व्यक्ति के लिये दादा, बाबा या चाचा संबोधन हमारी भारतीय संस्कृति है. हम अंग्रेजों की तरह एक शब्द अंकल नहीं जानते हैं बल्कि रिश्तों का ताना-बाना हमारी संस्कृति है.

बहरहाल, मैं गांधी के टेक की बात कर रहा था. आप इतिहास उठा कर देख लीजिये कि कोई भी नेता और राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसने गांधी का अपने पक्ष में उपयोग नहीं किया. वर्तमान केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की बात ही गांधी से शुरू होती है और गांधी पर ही समाप्त होती है. सच यह है कि उनका दल गांधी के खिलाफ भले ही न हो लेकिन गांधी के पक्ष में खड़ा नहीं दिखा. ऐेसे में मोदीजी का गांधीप्रेम, केवल प्रेम नहीं बल्कि राजनीति है. मोदीजी का भला सा तर्क यह हो सकता है कि गांधीजी का रिश्ता गुजरात से था और वे भी गुजरात के हैं तो गांधीजी पर उनका पहला हक है. इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि मोदी जी आज प्रधानमंत्री हैं तो वे एक आम भारतीय भी हैं। गांधीजी के प्रति उनकी आसक्ती कुछ अलग नहीं है।  मोदीजी गांधी के पक्ष में खड़े दिखते हैं तो काटजू जी और उनके जैसे अनेक लोग हैं जो गांधीजी में खोट ढूंढ़ते दिखते हैं, इनके बारे में क्या कहेंगे?

बात गांधीजी के पक्ष में हो या विपक्ष में, लोग और नेता उनकी खोट ढूंढ़ें या उनका गुणगान करें, बात तो तय है कि सब लोग येन-केन प्रकारेण गांधी का टेका लगाकर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. गांधीजी हर कालखंड में सामयिक रहे हैं और रहेंगे, ऐसा मेरे जैसे लोगों का मानना है. मेरे जैसे मतलब, दस पांच नहीं बल्कि करोड़ों की संख्या में, वह भी देश में नहीं, परदेस में भी. कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं होता और स्वयं गांधीजी ने अपने बारे में यह बात कही है. जिन लोगों को गांधीजी से परहेज है अथवा उनमें खोट निकाल कर चर्चा करना चाहते हैं तो उन लोगों को सत्य के प्रयोग पढ़ लेना चाहिये. एक ऐसी आत्मकथा जिसमें आत्मप्रवंचना नहीं बल्कि स्वयं की आलोचना है और पाश्चाताप भी. गांधी पर सवाल करने से पहले गांधीजी जैसा स्वयं के भीतर ताकत पैदा करें और अपनी कमियों को न केवल सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें बल्कि पाश्चाताप करने का साहस भी पैदा करें. गांधी टेक के सहारे सुर्खिया बनने की यह पुरातन परम्परा है और आगे भी जारी रहेगी. हां, मैं इसमें एक लाभ यह देखता हूं कि जो हमारी नयी पीढ़ी गांधी परम्परा से दूर है, वह इसी बहाने कुछ संवाद करती है और यह जानने के लिये शायद कुछ अध्ययन भी. क्या इसके लिये मोदी, काटजू जैसे अनन्य लोगों का हमें आभारी नहीं होना चाहिये?

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शहीद दिवस के बहाने ‘भगत, गांधी, अंबेडकर और जिन्ना’ पर सुमंत भट्टाचार्य ने छेड़ी गंभीर बहस

‘एक भी दलित चिंतक ने भगत की शहादत को याद नहीं किया’, अपने इन शब्दों के साथ शहीद दिवस के बहाने संक्षिप्ततः अपनी बात रखकर वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य ने फेसबुक पर ‘भगत, गांधी, अंबेडकर और जिन्ना’ संदर्भित एक गंभीर बहस को मुखर कर दिया। भगत सिंह की शहादत को याद न करने के उल्लेख के साथ उन्होंने लिखा- ”गोडसे को तब भी माफ किया जा सकता है..क्योंकि गांधी संभवतः अपनी पारी खेल चुके थे। पर गांधी को इस बिंदु पर माफ करना भारत के साथ अन्याय होगा। भगत सिंह पर उनकी चुप्पी ने नियति का काम आसान कर दिया, ताकि नियति भारत के भावी नायक को भारत से छीन ले। यहीं आकर मैं गांधी के प्रति दुराग्रह से भर उठता हूं। पर जिन्नाह और अंबेडकर तो हिंसावादी थे..एक मुंबई में गोलबंद होकर मारपीट करते थे, दूसरे डायरेक्ट एक्शन के प्रवर्तक। इनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने चाहिए। शाम तक इंतजार के बाद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है, एक भी दलित चिंतक ने भगत की शहादत को याद नहीं किया…..क्यों..?”

इसके जवाब में ब्रजभूषण प्रसाद सिन्हा ने लिखा कि ‘बिल्कुल सही सोच है आपकी जैसा कि मैंने पढ़ा है। अगर गांधी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे पर उन्होंने उन्हें आतंकवादी करार देते हुए बचाने से मना कर दिया और गांधी बहुतों के चित्त से उतर गए। गाँधीवादी मित्र क्षमा करेंगे। गांधी ने नेहरू को गद्दी सौंप कर मेरे नजरिये में सबसे बड़ी गलती की। अगर पटेल जैसा कि अधिकांश मेम्बरों की चाहत थी, को बनाया होता तो आज जो देश की जो दुर्दशा है, वह नहीं होती।’ मनीष शुक्ला का मानना था – ‘गांधी ने हमेशा नेहरू के रास्ते के कांटे साफ़ किये, अब अन्ना अपनी आखिरी पारी में नया गांधी बनने की राह पर हैं ।’ 

वरुण कुमार जायसवाल ने लिखा – ‘कुछ भी लिखने से पहले ये स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि भगत सिंह की शहादत के प्रति मन में असीम सम्मान और श्रद्धा है. मुझे ऐसा लगता है कि यदि भगत सिंह को अपनी पारी खेलने का मौका मिलता तो वो पारी कैसी होती ? भगत सिंह स्पष्ट रूप से मार्क्सवाद से प्रभवित थे और उनका रुझान लिबरेशन की यूटोपियन समाज व्यवस्था की तरफ था जो 1931 के आगे की दुनिया में न सिर्फ़ ख़ूनी सिद्ध हुई बल्कि पूरी दुनिया को खतरे में डालने से पीछे भी न हटी. भगत सिंह की आड़ लेकर तो ऐसी ताकतों (कम्युनिस्ट) का सत्तारूढ़ होना संभव भी था क्योंकि तब संभवतया इसमें राष्ट्रवाद और देशभक्ति का फ्लेवर जुड़ चुका होता लेकिन आत्मा तो वाम ही रहती. क्या 1992 के बाद भारत की दशा भी पूर्वी यूरोप के सेटेलाइट मुल्कों जैसा ना हो जाता. भगत सिंह जिस राज्य की परिकल्पना में जीते थे वो हममें से अधिकांश को डरा देने के लिए काफी है.’ 

आर के गोपाल ने लिखा कि ‘गांधी पारी खेल चुके थे? मतलब आजादी गाँधी ने दिलवायी…  फिर अच्छा विश्लेषण है!’ इस टिप्पणी के जवाब में सुमंत भट्टाचार्य ने लिखा कि ‘मेरा आशय उम्र से है..गांधी भारत को वो दे चुके थे जो देना चाह रहे ते..जिस वक्त गांधी गए, कांग्रेस उनको खारिज कर रही थी। भगत सिंह 23 साल की उम्र में गए..वो गांधी के भारत के समानांतर उस भारत की आवाज बन रहे थे जिसे कांग्रेस आवाज नहीं दे रहा था। फिर यह मेरा निजी नजरिया है, आपको अपनी बात रखने का पूरा हक है। मेरी असहमति का बिंदु गांधी की खामोशी है।’ 

हिमांशु कुमार घिल्डियाल की टिप्पणी थी – ‘अहिंसा के पुजारी ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों को अंग्रजों का साथ देने को कहा था। युद्ध में गोलियों की बरसात होती है या लाशों की?’ पुष्कर भट्ट ने लिखा – ‘गांधी जी के अहिंसा सिद्धांत का प्रतिफल 1947 में दिख गया था.. बंटवारे के बाद की मार काट.. अहिंसा के पेड़ पर लगे हिंसा के फल..।’ सुमन वर्मा का कहना था कि ‘इतने वर्षों बाद ही सही, आज उनको सारा देश याद तो कर रहा है शहीद के रूप में।’

अपनी प्रतिटिप्पणी में शरद श्रीवास्तव लिखते हैं- ‘गांधी जी के नेतृत्व को असली चुनौती भगत सिंह से नहीं, लेफ्ट से थी, कांग्रेस में सुभाष बाबू और नेहरू जी से थी। सन 31 से पहले मेरठ मे कम्युनिस्टों पर मुक़द्दमा चला था, जिसमें उन्हे देश द्रोह के लिए सजा सुनाई गयी थी। अगर गांधी जी को कोसना है तो उन क्षणों के लिए पहले कोसिए जब भगत सिंह भूख हड़ताल पर थे, और उसी में जतिन दास की मृत्यु हो गयी थी। सुनते हैं जतिन दास का शव जब कलकत्ता लाया गया था, तब उनके अंतिम संस्कार मे भाग लेने 6 लाख लोग जुटे थे। जतिन बाबू की मौत पर वो भी अनशन से हुई मौत पर कांग्रेस और गांधी जी का क्या रोल था। ये तो अहिंसा के लिए हुई मौत थी। कांग्रेस ने इसे रोकने का कोई उपाय किया या नहीं या अपनी चुप्पी बनाए रखी।’

तेजेंद्र सिंह का कहना था कि गाँधी जी की ये सोच केवल भगत सिंह के लिए नहीं थी, उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर भी यही रवैया अपनाया था। अंततः बोस ने त्यागपत्र दे दिया था। शिखा गुप्ता का मानना है कि गाँधी जी के बहुत से कृत्य ऐसे हैं जिन पर प्रश्न उठने चाहिए और चर्चा होनी चाहिए। रीता सिन्हा ने लिखा – ‘भगत सिंह और सु.चन्द्र.वोस की कसक बनी रहती है। आपसे सहमत हूँ।’

पुष्प जैन ने तो ‘बापू की हजामत और पुन्नीलाल का उस्तरा’ शीर्षक से मधु धामा लिखित पुस्तक का सचित्र एक अंश ही प्रस्तुत कर दिया कुछ इस तरह…. ‘‘बापू कल मैंने हरिजन पढा।’’ पुन्नीलाल ने गांधीजी की हजामत बनाते हुए कहा। ‘‘क्या शिक्षा ली!’’ ‘‘माफ करें तो कह दूं।’’ ‘‘ठीक है माफ किया!’’ ‘‘जी चाहता है गर्दन पर उस्तरा चला दूं।’’ ‘‘क्या बकते हो?’’ ‘‘बापू आपकी नहीं, बकरी की!’’ ‘‘मतलब!’’ ‘‘वह मेरा हरिजन अखबार खा गई, उसमें कितनी सुंदर बात आपने लिखी थी।’’ ‘‘भई कौनसे अंक की बात है।’’ ‘‘बापू आपने लिखा था कि छल से बाली का वध करने वाले राम को भगवान तो क्या मैं इनसान भी मानने को तैयार नहीं हूं और आगे लिखा था सत्यार्थ प्रकाश जैसी घटिया पुस्तक पर बैन होना चाहिए, ऐसे ही जैसे शिवा बावनी पर लगवा दिया है मैंने।’’ आंखें लाल हो गई थी पुन्नीलाल की। ‘‘तो क्या बकरी को यह बात बुरी लगी।’’ ‘‘नहीं बापू अगले पन्ने पर लिखा था सभी हिन्दुओं को घर में कुरान रखनी चाहिए, बकरी तो इसलिए अखबार खा गई। हिन्दू की बकरी थी ना, सोचा हिन्दू के घर में कुरान होगी तो कहीं मेरी संतान को ये हिन्दू भी बकरीद के मौके पर काट कर न खा जाएं।’’ अंत में उन्होंने ये नोट भी लिख दिया कि कोई आपत्ति करने का साहस न करें, मूल पुस्तक में गांधी जी की टिप्पणी के मूल प्रमाण दिए गए हैं।

प्रियदर्शन शास्त्री ने लिखा – ‘सुमन्त भाई ! गोडसे को कैसे माफ कर सकते हैं ? रावण भी बहुत गुणी था शायद गोडसे भी परन्तु उनके कृत्यों से उन्हें क़तई माफ नहीं किया जा सकता …. माना कि भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु की शहादत आजादी की लड़ाई की एक महान घटना है परन्तु हम उन सबको क्यों भूल जाते हैं जो ऑफ द रिकॉर्ड थे….. कुछ लोग महात्मा गाँधी की आलोचना इस तरह करते हैं जैसे क्रिकेट की कर रहे हों ….. जैसे उन्होने सम्पूर्ण गाँधी को समझ लिया हो …. हम ये भूल जाते हैं कि जिस शख़्स ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी है वो उन अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ी है जिनका पूरे विश्व के एक चौथाई भाग पर राज था …. मुझे नहीं लगता कि वर्तमान पीढ़ी में दुबारा से आज़ादी की लड़ाई लड़ने का माद्दा है । यहाँ वर्तमान आलोचकों का ये हाल है कि अंग्रेजों की तो छोड़ो शहर के भ्रष्ट विधायक या सांसद के विरुद्ध तो आवाज़ तक नहीं निकलती … और बात करते हैं महात्मा गाँधी की।’

जयप्रकाश त्रिपाठी ने लिखा – ‘अलग से मुस्लिम मोरचा, अलग से दलित मोरचा, अलग से स्त्री मोरचा, आजादी के आंदोलन के समय से या बाद में इस तरह की सारी कवायदें पूंजीवादी-साम्राज्यवादी मोरचे पर जन-एकजुटता कमजोर करने के लिए ही तो जारी हैं। हमारे एक सुपरिचित दलित-एनजीओ चिंतक महोदय तो कूद कूद कर नेपाल तक हो आते हैं, वहां के दलितों को ये बताने के लिए कि तुम्हारा मोरचा दूसरा है। और बीच बीच में महीनो के लिए रहस्यमय तरीके से लापता हो जाते हैं। कोई बता रहा था कि लापता होने के दिनो में वे अपने अर्थगुरुओं से दीक्षित होने विदेश भाग जाते हैं, वहां पता नहीं क्या क्या करके लौटते हैं। मैंने ज्यादातर दलित-चिंतक महोदयों को इसी रूप में देखा है। अमीर दलित और गरीब दलित …. हाहाहाहा। एक बात और, कुछ बातें हमारे उन भारतीय पुरखों और मौजूदा लालसलामियों को लेकर भी विचलित करती हैं…. आज के हालात के पीछे सारा किया धरा उन्हीं का है, मुझे ये भी अच्छी तरह से मालूम है कि एक नेशनल फेम के कामरेड की पत्नी भी विदेशों में जाकर दाता एजेंसियों के तलवे चाटती रहती हैं …. जहां तक एक भी दलित चिंतक के भगत की शहादत को याद नहीं करने का प्रश्न है, जानीबूझी इस अक्षम्य कारस्तानी के पीछे इसी तरह की ढेर सारी ऐतिहासिक गलतियां और साजिशें हैं।’

कुमार सौवीर का मानना था कि सार्थक विरोध को कभी भी किसी निंदापरक विरोध की बैसाखी की जरूरत नहीं होती है। शरद श्रीवास्तव ने पुनः लिखा कि भारत की आजादी के आंदोलन में ब्रिटेन की दो पार्टियों की आपसी राजनीति और उनकी भारत के प्रति नीति का भी अच्छा खासा रोल रहा है। कंजरवेटिव पार्टी हमेशा भारत के खिलाफ रही, लेबर पार्टी भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की पक्षधर रही। 1931 मे लेबर पार्टी की सरकार थी। इससे पहले 1890 मे लेबर पार्टी की सरकार थी और तब भी भारत के लिए उसने कई महत्वपूर्ण निर्णय किए थे। लेबर पार्टी की सरकार ने लार्ड इरविन को भारत मे चल रहे आंदोलन से बात चीत करने के लिए कहा और लार्ड इरविन ही पहले वायसराय थे जिनहोने पहली बार बाकायदा घोषणापत्र जारी करके कांग्रेस को भारत का नुमाइंदा कहा और गोल मेज सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया जिसमे भारत को अधिक अधिकार दिये जाने की बात होनी थी। लॉर्ड इरविन ने बातचीत का माहौल तैयार करने के लिए गांधी जी की कई शर्ते भी मानी। यहाँ तक कहा जाता है की लार्ड इरविन ने लिखित मे कांग्रेस से समझौता करके अंग्रेज़ो के ताबूत मे पहली कील ठोकी और कांग्रेस को एक अधिकृत पार्टी होने का भारत की आवाज होने का प्रमाणपत्र दे दिया। ऐसे हालात मे जब वायसराय बातचीत का इच्छुक था, सरकार अनुकूल थी, तब भी गांधी जी ने बातचीत करने से पहले रखी गयी शर्तों मे भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी रोकने की मांग क्यों नहीं की इस पर अचरज होता है।’

उमाशंकर राय ने लिखा कि यह ऐतिहासिक तथ्य है..भगत सिंह खुद भी नहीं चाहते थे कि गांधी या कोई उनके लिए अंग्रेजी हुकूमत से गुहार लगाए..लेकिन तमाम नेता गांधी से गुजारिश कर रहे थे कि रिहाई नहीं तो कम से कम उम कैद में बदलवाने के लिए वायसराय से बात करें..इसी बिंदू पर बात अटकी रही। शादाब खान ने लिखा – ‘मैं तो जिन्नाह को माफ कर देता डायरेक्ट एक्शन के लिए…पर कमबख्त भारत रुका ही नहीं। निकल गया हत्थे से।’ इस पर सुमंत भट्टाचार्य ने लिखा- सवाल का दूसरा हिस्सा जिन्नाह और अंबेडकर की खामोशी पर है। इतिहास का कोई अछूता दस्तावेज हो तो सामने लाइए मित्र।’

सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से

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उपेक्षा का शिकार हो रहा है गांधी का सत्याग्रह आश्रम

गुजरात के पाटनगर गांधीनगर के महात्मा मंदिर में महात्मा गांधी के हिंद आगमन की शताब्दी प्रवासी भारतीय सम्मेलन के रुप में मनाई जा रही है, लेकिन देश में सत्तारुढ़ पार्टी हो या विपक्षी दल गांधी के नाम पर पिछले कई सालों से राजनीति करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम कि जब महात्मा गांधी अफ्रीका से गुजरात आए थे और 20 मई 1915 को अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर देश की आजादी का शंखनाद किया था, वह सत्याग्रह आश्रम उपेक्षा का शिकार हो रहा है. देश में साबरमती आश्रम के बारे में तो सबको मालूम है लेकिन सत्याग्रह की शुरुआत करने वाले गांधीजी के आश्रम को ना केवल कांग्रेस बल्कि देश की सत्तारुढ़ भाजपा सरकार ने भी भुला दिया है यही कारण है कि महात्मा गांधी के हिंद आगमन शताब्दी के आरंभ में और ना ही इन 100 सालों में इस सत्याग्रह आश्रम में अब तक कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ.

कितनी अजीब त्रासदी है कि देश के राजनेताओं ने गांधी का स्वरुप ही बदल दिया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब गांधीनगर के 40,000 पेड़ कटवाकर और 14,000 श्रमिकों की झोपड़ियों को उजाड़कर अपना गुणगान और अपनी मार्केटिंग करने के लिए महात्मा मंदिर बना दिया, लेकिन जिस महात्मा मंदिर में जिस प्रवासी की याद में प्रवासी भारतीय सम्मेलन आयोजित किया गया है और जिसने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर नया राजनैतिक अध्याय आरंभ किया उसकी स्थली को आखिर क्यों भुला दिया गया यह एक बहुत बड़ा सवाल है.

अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ 1908 में मोहनदास करमचंद गांधी ने आजादी की लड़ाई का शंखनाद किया और अफ्रीका ही में बने अश्वेत लोगों को संगठित किया, और 1908 में अफ्रीकन इंडियन कांग्रेस की स्थापना कर मास मुवमेंट शुरु किया. गांधी के इस जन आंदोलन में सभी लोग संगठित रहे और 6 साल तक यह आंदोलन चला, जिसके परिणामस्वरुप ब्रिटिश सरकार को रंगभेद के खिलाफ कानून में बदलाव लाना पड़ा. गांधीजी का ध्येय अफ्रीका में तो पूरा हुआ लेकिन 1893 में पीटरमेरिस बर्ग रेलवे के कम्पार्टमेंट में गांधीजी को जब उतार दिया तो रंगभेद नीति को लेकर उन्हें और झटका लगा जिसने विश्व का इतिहास ही बदल कर रख दिया. और गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ हमेशा के लिए भारत लौट आए. गांधीजी की इच्छा गोखले की संस्था भारत सेवक समाज से जुड़ने की थी लेकिन गोखले ने कहा कि 25 सालों से देश में काफी बदलाव आए हैं, पहले उसे समझो फिर भविष्य़ तय करो..

गांधीजी ने अफ्रीका में टॉलस्टाय आश्रम स्थापित किया था, इसी तर्ज पर उन्हें भारत में भी एक आश्रम स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई, हांलाकि गांधीजी को कोलकत्ता, राजकोट, और अन्य जगह से आश्रम स्थापित करने का न्यौता मिला था लेकिन उन्होंने अहमदाबाद को प्राथमिकता दी,  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1915 में अहमदाबाद को भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाता था, यहां कपड़े की अनेक मिलें थी, इसीलिए गांधीजी का ऐसा मानना था कि खादी का काम यहां अच्छे से विकसित हो सकेगा. यहां के व्यापारी वर्ग, धनिकों ने भी उन्हें आश्वासन दिया था कि आश्रम का खर्च उठाएंगे, इसीलिए गांधीजी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की थी, 20 मई 1915 को आश्रम की स्थापना हुई.

गांधीजी अहिंसा और सत्य के पुजारी थे इसीलिए इस आश्रम का नाम सत्याग्रह आश्रम रखा गया था, इस आश्रम से ही राजनैतिक परिवर्तन का एक नया अध्याय शुरु हुआ,  साथ ही सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक बदलाव का नया युग भी आरंभ हुआ. कस्तूरबा और अन्य लोगों के विरोध के बावजूद भी गांधीजी ने एक दलित परिवार को इस आश्रम में जगह दी. जिसके कारण इस आश्रम को आर्थिक सहायता मिलनी भी बंद कर दी गई थी लेकिन गांधीजी डटे रहे. स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को एक नई दिशा भी इसी आश्रम से गांधीजी ने दी थी, ‘मेंकिग ऑफ महात्मा’ का उदय भी इसी आश्रम से हुआ था. लेकिन इस सबके बावजूद भी सत्याग्रह के नींव का पत्थर रखने वाले इस आश्रम को आज भुला दिया है. गुजरात के साबरमती आश्रम में नेताओं और लोगों का हूजूम उमड़ता है और चला जाता है लेकिन जहां से गांधीजी ने सत्याग्रह की शुरुआत की वह सत्याग्रह आश्रम कब खुलता है कब बंद होता है इस बारे में ना ही गुजरात पर्यटन विभाग और ना ही देश के पर्यटन विभाग को इस बात की कोई खबर है. ताज्जुब की बात यह है कि इस आश्रम के रख-रखाव को लेकर राज्य सरकार एक साल में केवल सवा लाख की ग्रांट देती है.

हालांकि गांधीजी के मूल्यों, विचारों और सिद्धातों से संबंधित विचारधारा को समझने के लिए वडोदरा के निजी टूर आपरेटर  ‘मरुन माइग्रेट’ से 2013 में अहमदाबाद की गुजरात विद्य़ापीठ के साथ गांधीजी के सत्याग्रह आश्रम को प्रमोट करने के लिए समझौता किया था और 2 अक्टूबर 2013 को ‘लिव गांधी फॉर ए वाइल; (गांधी को थोड़ा जीकर देखो) के नाम से 1000 रु. एक दिन के पैकेज की घोषणा की थी जिसमें पर्यटकों को एक दिन के लिए इस सत्याग्रह आश्रम में रहना था बल्कि खादी के कपड़े पहनने से लेकर गांधीजी के विचारों को समझना भी इस टूर पैकेज में शामिल था लेकिन लगता है कि यह योजना राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के गले नहीं उतरी और पर्यटन क्षेत्र में सत्याग्रह आश्रम का पैकेज टूर पूरी तरह से विफल रहा. 

अहमदाबाद से उषा चांदना की रिपोर्ट.

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गांधी जी की अपने बेटे को चिट्ठी : ”मनु ने बताया कि तुमने उससे आठ साल पहले दुष्कर्म किया था”

लंदन। महात्मा गांधी बड़े बेटे हरिलाल के चाल-चलन को लेकर खासे आहत थे। उन्होंने हरि को तीन विस्फोटक पत्र लिखे। जिनकी नीलामी अगले सप्ताह इंग्लैंड में की जाएगी। इन पत्रों में गांधी ने बेटे के व्यवहार पर गहरी चिंता जताई थी। नीलामीकर्ता ‘मुलोक’ को इन तीन पत्रों की नीलामी से 50 हजार पौंड (करीब 49 लाख रुपये) से 60 हजार पौंड (करीब 59 लाख रुपये) प्राप्त होने की उम्मीद है। ये पत्र राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जून, 1935 में लिखे थे।

हरिलाल के अनुचित व्यवहार पर गांधी जी ने पत्र में लिखा, ‘तुम्हें यह जानना चाहिए कि मेरे लिए तुम्हारी समस्या हमारी राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अधिक कठिन हो गई है।’ पत्र में उन्होंने कहा, ‘मनु ने मुझे तुम्हारे बारे में बहुत सी खतरनाक बातें बताई हैं। उसका कहना है कि तुमने आठ वर्ष पहले उसके साथ दुष्कर्म किया था। जख्म इतना ज्यादा था कि उसे इलाज कराना पड़ा।’ गौरतलब है कि मनु गांधी जी पोती और हरिलाल की बेटी थीं।

मुलोक द्वारा जारी बयान में कहा गया है, ‘ये पत्र गुजराती में लिखे गए और अच्छी हालत में हैं। जहां तक हमारी जानकारी है इन्हें सार्वजनिक रूप ने पहले कभी नहीं देखा गया। इनसे गांधी जी के बेटे के संबंध में परेशानी की नई जानकारी मिलती है।’

हरिलाल पिता की तरह बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करना चाहते थे। गांधी जी ने इससे मना कर दिया। उनका मानना था कि पश्चिमी शिक्षा ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में मददगार साबित नहीं होगी। इसके बाद हरिलाल ने 1911 में परिवार से संबंध तोड़ लिया। फिर जीवनभर पिता से उनके संबंध खराब ही बने रहे। एक अन्य पत्र में गांधी जी ने कहा, ‘मुझे बताओ कि क्या तुम अब भी अल्कोहल और विलासिता में रुचि रखते हो। मेरे विचार से अल्कोहल का सहारा लेने से ज्यादा अच्छा तो तुम्हारे लिए मर जाना है।’

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गांधी जी को जब बनारस के एक पंडे ने काफी भला-बुरा कहा था…

Sanjay Tiwari : एक बार गांधी जी भी काशी गये थे. तब जब वे देश के आंदोलन का हिस्सा नहीं हुए थे. इन दिनों वे दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटिया आंदोलन को गति दे रहे थे और उसी सिलसिले में समर्थन जुटाने के लिए भारत भ्रमण कर रहे थे. इसी कड़ी में वे काशी भी पहुंचे थे. बाबा विश्वनाथ का आशिर्वाद लेने के बाद बाहर निकले तो एक पंडा आशिर्वाद देने पर अड़ गया. मोहनदास गांधी ने जेब से निकालकर एक आना पकड़ा दिया. पंडा जी को भला एक पैसे से कैसे संतोष होता? आशिर्वाद देने की जगह बुरा भला कहना शुरू कर दिया और पैसा उठाकर जमीन पर पटक दिया.

मोहनदास तो ठहरे मोहनदास. उन्होंने वह एक पैसा उठाकर जेब में रख लिया और आगे बढ़ने को हुए कि पंडा चिल्लाया ‘क्या करता है अधर्मी.’ मोहनदास ने कहा आपको इतनी कम दक्षिणा नहीं चाहिए और मैं इससे ज्यादा दूंगा नहीं. झट पंडे ने पैंतरा बदला, एक तो कम दक्षिणा देकर तू खुद नर्क का भागी बन रहा है. तो क्या मैं भी इंकार करके तेरी तरह नर्क का भागी बन जाऊ. गांधी जी ने वह एक आना पंडे को पकड़ा दिया और वहां से बाहर आ गये.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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सफाई के इस तमाम प्रचार अभियान में सफाईकर्मी ही गायब हैं

आज ही गांधी जी का जन्मदिन है. उनके कामों से और जो भी मतभेद हों पर गांधी जी अपना टॉयलेट अपने बड़े, बहुत बड़े व्यक्तित्व बन जाने तक खुद साफ़ करते थे। आज उन्ही के नाम पर सफाई की बातें हो रही हैं, पर बड़ी सफाई से सफाईकर्मियों के बदहाल जीवन की बातें इसमें बताई ही नहीं जा रही। सफाई के तमाम प्रचार अभियान में सफाईकर्मी का कोई चेहरा नहीं है। ऐसा कैसे हो जाता है! मूल मुद्दा गायब और कास्मेटिक मुद्दा हावी। clean day 640x480

सफाई कर्मियों की ये तस्वीरें भयावह हैं, इनकी तस्वीर तक देखने से जी मिचला जाता है। जो लोग इस गंदगी में उतरते हैं, उनका क्या हाल होता होगा??? सफाईकर्मियों की संख्या बढ़ाए बिना, काम में मशीनों को जोड़ना और वेतन बढ़ाए बिना कैसे कोई भी देश साफ़ रह सकता है?

हमने मंगल पर मशीन पहुंचा दी पर गटर में उतरने के लिए मशीन सफाईकर्मी तक नहीं पहुंचा पाए। सफाईकर्मी क्या इंसान नहीं है? क्या उसे खुशबुएँ बुरी लगती हैं? मैले में काम करना उसकी पसंद है या मजबूरी? क्या हम उसे इंसान का दर्ज़ा नहीं दे सकते?

जो एक दिन के लिए फैशन में झाडू पकड़े हैं वे फोटो शो कर रहे हैं, और जो सफाई करते हुए गन्दगी के दमघोटू माहौल में जान देता रहता है उसकी तस्वीर कहीं नहीं है। सफाईकर्मी, जिसे कभी समय से वेतन नहीं मिलता, और जो मिलता भी है वो बहुत ही कम, बेचारा आज सफाई के फैशन के दिन क्या सोच रहा होगा?

लेखिका संध्या नवोदिता सोशल एक्टिविस्ट और कवि हैं।

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हिन्दी अंग्रेजी का स्थान ले तो मुझे अच्छा लगेगा, अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती: महात्मा गांधी

महात्मा गांधी के सपनों के भारत में एक सपना राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रतिष्ठित करने का भी था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है। हिन्दी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में एक राजनीतिक शख्सियत के रूप में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। महात्मा गांधी की मातृभाषा गुजराती थी और उन्हें अंग्रेजी भाषा का उच्चकोटि का ज्ञान था किंतु सभी भारतीय भाषाओं के प्रति उनके मन में विशिष्ट सम्मान भावना थी। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करे, उसमें कार्य करे किंतु देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा भी वह सीखे, यह उनकी हार्दिक इच्छा थी।

गांधी जी प्रांतीय भाषाओं के पक्षधर थे, वहां की शिक्षा का माध्यम भी प्रांतीय भाषाओं को बनाना चाहते थे। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने के संदर्भ में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था कि ‘देश के सारे लोग हिन्दी का इतना ज्ञान प्राप्त कर लें तकि देश का राजकाज उसमें चलाया जा सके और सभी भारतवासी एक सामान्य भाषा में संवाद कायम कर सकें।’ वे अकेले राजनीतिक व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत की भाषा समस्या, राष्ट्रभाषा पर इतना ध्यान दिया।
आधुनिक हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि रामविलास शर्मा का यह कथन  ‘सत्य अहिंसा, स्वराज, सर्वोदय- किसी भी अन्य विषय पर आज उनके लिये उपादेय नहीं है, जितने भाषा समस्या पर। अंग्रेजी, भारतीय भाषाओं, राष्ट्रभाषा हिन्दी और हिन्दी-उर्दू की समस्या पर उन्होंने जितनी बातें कही हैं, वे बहुत ही मूल्यवान है। किसी भी राजनीतिक नेता ने इन समस्याओं पर इतनी गहराई से नहीं सोचा, किसी भी पार्टी और उसके नेताओं ने भाषा समस्या के सैद्धांतिक समाधान को नित्य प्रतिदिन की कार्रवाई में इस तरह अमलीजामा नहीं पहनाया, जैसे गांधी ने। उनकी नीति के मूल सूत्र छोड़ देने से यह समस्या दिन प्रतिदिन उलझती जा रही है।’

गांधीजी अपनी मां, मातृभूमि और मातृभाषा से अटूट स्नेह रखते थे। सन् 1906 ई. में उन्होंने अपनी एक प्रार्थना में कहा था- भारत की जनता को एक रूप होने की शक्ति और उत्कण्ठा दे। हमें त्याग, भक्ति और नम्रता की मूर्ति बना जिससे हम भारत देश को ज्यादा समझें, ज्यादा चाहें। हिन्दी एक ही है। उसका कोई हिस्सा नहीं है हिन्दी के अतिरिक्त दूसरा कुछ भी मुझे इस दुनिया में प्यारा नहीं है।

इस प्रार्थना से उनका राष्ट्र-प्रेम और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनका अनुराग पूर्णरूपेण परिलक्षित होता है। गांधी भाषा को माता मानते थे तथा हिन्दी का सबल समर्थन करते थे। उन्होंने हिन्द स्वराज (सन् 1909 ई.) में अपनी भाषा-नीति की घोषणा इस प्रकार की थी- ‘सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।’

महात्मा गाँधी ने भारत आकर अपना पहला महत्वपूर्ण भाषण 6 फरवरी 1916 को बनारस में दिया था। उस दिन भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग वहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास करने आए थे। महामना मदनमोहन मालवीय के विशेष निमंत्रण पर महात्मा गाँधी भी इस समारोह में शामिल हुए थे। समारोह की अध्यक्षता महाराज दरभंगा कर रहे थे। मंच पर लार्डहार्डिंग के साथ श्रीमती एनी बेसेंट और मालवीयजी भी थे। समारोह में बड़ी संख्या में देश के राजा-महाराजा भी शामिल हुए थे। ये लोग देश के कोने-कोने से तीस विशेष रेलगाडि़यों से आए थे। मालवीयजी के आग्रह पर जब महात्मा गाँधी बोलने खड़े हुए हुए तो उनके अप्रत्याशित भाषण से सभी अवाक और स्तब्ध रह गए थे।

सर्वप्रथम उन्होंने समारोह की कार्रवाई एक विदेशी भाषा अँगरेजी में चलाए जाने पर आपत्ति की और दुख जताया। फिर उन्होंने काशी विश्वविद्यालय मंदिर की गलियों में व्याप्त गंदगी की आलोचना की। इसके बाद उन्होंने मंच पर और सामने विराजमान रत्नजड़ित आभूषणों से दमकते राजाओं-महाराजाओं की उपस्थिति को बेशकीमती जेवरों की भड़कीली नुमाइश बताते हुए उन्हें देश के असंख्य दरिद्रों की दारुण स्थिति का ध्यान दिलाया। उन्होंने जोड़ा कि जब तक देश का अभिजात वर्ग इन मूल्यवान आभूषणों को उतारकर उसे देशवासियों की अमानत समझते हुए पास नहीं रखेगा, तब तक भारत की मुक्ति संभव नहीं होगी। फिर उन्होंने 1916 के कांग्रेस अधिवेषन में अपना भाषण हिन्दी में दिया।
महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में जनसंपर्क हेतु हिन्दी को ही सर्वाधिक उपयुक्त भाषा समझते थे।

इसके बाद 15 अक्टूबर 1917 को भागलपुर के कटहलबाड़ी क्षेत्र में बिहारी छात्रों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के निर्देश पर बिहारी छात्रों के संगठन का काम लालूचक के श्री कृष्ण मिश्र को सौंपा गया था। बिहारी छात्रों के सम्मेलन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की थी। अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने कहा था- ‘मुझे अध्यक्ष का पद देकर और हिन्दी में व्याख्यान देना और सम्मेलन का काम हिन्दी में चलाने की अनुमति देकर आप विद्यार्थियों ने मेरे प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया है। इस सम्मेलन का काम इस प्रांत की भाषा में ही और वही राष्ट्रभाषा भी है- करने का निश्चय दूरन्देशी से किया है।’

इस सम्मेलन में सरोजनी नायडू का भाषण अंग्रेजी से हिन्दी अनुदित होकर छपा था। यह सम्मेलन आगे चलकर भारत की राजनीति, विषेषकर स्वतंत्रता संग्राम में राजनीति का कैनवास बना, जिससे घर-घर में  स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद करना मुमकिन हो सका। वहीं प्रसिद्ध गांधीवादी काका कालेलकर ने इस सम्मेलन के भाषण को राष्ट्रीय महत्व प्रदान कर राष्ट्रभाषा हिन्दी की बुनियाद डाली थी। बाद में इसी कटहलबाड़ी परिसर में मारबाड़ी पाठशाला की स्थापना हुई।

सन् 1917 ई. में कलकत्ता (कोलकाता) में कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर राष्ट्रभाषा प्रचार संबंध कांफ्रेन्स में तिलक ने अपना भाषण अंग्रेजी में दिया था। जिसे सुनने के बाद गांधीजी ने कहा था- ‘बस इसलिए मैं कहता हूं कि हिन्दी सीखनें की आवश्यकता है। मैं ऐसा कोई कारण नहीं समझता कि हम अपने देशवासियों के साथ अपनी भाषा में बात न करें। वास्तव में अपने लोगों के दिलों तक तो हम अपनी भाषा के द्वारा ही पहुंच सकते हैं।’

महात्मा गांधी किसी भाषा के विरोधी नहीं थे। अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना वह उचित समझते थे। प्रत्येक भाषा के ज्ञान को वह महत्वपूर्ण मानते थे किंतु उन्होंने निज मातृभाषा और हिन्दी का सदैव सबल समर्थन किया। एक अवसर पर उन्होंने कहा था- ‘भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।’

गांधीजी शिक्षा के माध्यम के लिए मातृभाषा को ही सर्वोत्तम मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि शिक्षा का माध्यम तो प्रत्येक दशा में मातृभाषा ही होनी चाहिए। 1918 में वाइसराय की सभा में में जब रंगरूटों की भर्ती के सिलसिले में गांधी गये तो उन्होंने हिन्दी-हिन्दूस्तानी में बोलने की इजाजत मांगी। इस घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है ‘हिन्दुस्तानी में बोलने के लिये मुझे बहुतों ने धन्यवाद दिया। वे कहते थे कि वाइसराय की सभा में हिन्दुस्तानी में बोलने का यह पहला उदाहरण था। पहले उदाहरण की बात सुनकर मैं शरमाया। अपने ही देश में देश से संबध रखनेवाले काम की सभा में, देश की भाषा का बहिष्कार कितने दुख की बात है।’

उनकी इच्छा थी कि भारत के प्रत्येक प्रदेश में शिक्षा का माध्यम उस-उस प्रदेश की भाषा को होना चाहिए। उनका कथन था ‘राष्ट्र के बालक अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं।’ इसके बाद गांधी जी ने कांग्रेस के अंदर प्रवेश कर उसकी कार्रवाईयों में हिन्दी को स्थान दिलाने के प्रयास शुरू किये। राष्ट्रीय नेताओं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से हिन्दी सीखने का आग्रह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर से हिन्दी सीखने का आग्रह महत्वपूण है। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने काठियावाड़ में अपना भाषण हिन्दी में दिया।

इसी प्रकार एक अन्य अवसर पर उन्होंने अपना विचार इस प्रकार प्रकट किया था ‘यदि हिन्दी अंग्रेजी का स्थान ले ले तो कम से कम मुझे तो अच्छा ही लगेगा। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है।’ महात्मा गांधी ने भाषा के प्रश्न को स्वराज्य से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि यदि स्वराज्य देश के करोड़ो भूखे, अनपढ़, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना होगा।

मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के सभापति बनाए गये। सभापति के रूप में उन्होंने अपने भाषण में जोरदार शब्दों में कहा, जैसे अंग्रेज अपनी मादरी जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हें, वैसे ही मैं आपस प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। हिंदी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। इसी भाषण में उन्होंने हिंदी के क्षेत्र-विस्तार की आवश्यकता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा, साहित्य का प्रदेश भाषा की भूमि जानने पर हो निश्चित हो सकता है। यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान करने के लिए पूर्व-पश्चिम, दक्षिण-उत्तर से पुनीत महात्मा आएंगे, तो सागर का महत्व स्नान करने वालों के अनुरूप होना चाहिए।

उपर्युक्त वक्तव्य से जाहिर है कि उत्तर प्रांत में हिंदी भाषा एवं साहित्य का जो उत्थान हो रहा था, उससे गांधी जी अवगत थे, लेकिन संतुष्ट नहीं, क्योंकि उनकी समझ में हिंदी का विस्तार उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक सबके लिए होना चाहिए। उसे एक सागर की तरह व्यापक होना चाहिए, न कि नदी की तरह संकुचित। इसी बात को बाद में उनके परम शिष्य विनोबा भावे ने इस प्रकार कहा, हिंदी को नदी नहीं, समुद्र बनना होगा। अर्थात् उत्तरी प्रांत में उभरा हिंदी नवजागरण एक उफनती नदी जैसा था, तो उसे राष्ट्रव्यापी सागर में परिणत करने का प्रयास गांधी जी के द्वारा हुआ, यह मानने में कोई अतिवाद नहीं है। इस तथ्य को ध्यान में रखने में हिंदी-भाषी प्रदेश के आधार पर हिंदी जाति की बात करना असंगत प्रतीत होता है। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की जाति की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा।

इंदौर साहित्य-सम्मेलन के अवसर पर गांधी जी ने हिंदी के प्रचार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य का आरंभ कराया जिसका संबंध दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार से था। उन्होंने अपने उसी भाषण में यह कहा कि- सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़ भाषाओं के लिए है। वहां तो कुछ प्रयत्न भी नहीं हुआ है। हिंदी भाषा सिखाने वाले शिक्षकों को तैयार करना चाहिए। ऐसे शिक्षकों की बड़ी ही कमी है। इस कथन से स्पष्ट है कि दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार को लेकर तब तक कोई विशेष कार्य नहीं हुआ था। दक्षिण भारतीयों के बीच हिंदी का कैसे प्रचार हो, यह गांधी जी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या थी।

भारतीय राजनेताओं में गांधीजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने द्रविड़ प्रदेश में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए हिंदी को विधिवत् सिखाया जाना आवश्यक समझा और उसके लिए उन्होंने ठोस योजना प्रस्तुत की, जिसके अंतर्गत पुरुषोत्तम दास टंडन, वेंकटेश नारायण तिवारी, शिव प्रसाद गुप्ता सरीखे हिंदी-सेवियों को लेकर दक्षिण भारत हिन्द प्रचार सभा का गठन किया। इंदौर साहित्य-सम्मेलन के समापन के तुरंत बाद गांधी जी ने अखबारों के लिए एक पत्र जारी किया जिसमें उन्होंने दक्षिण वालों को हिंदी सीखने के लिए उत्साहित करते हुए कहा था, यदि हमें स्वराज्य का आदर्श पूरा करना है तो हमें एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ेगी ही, जिसे देश की विशाल जनता आसानी से समझ और सीख सके। ऐसी भाषा तो सदा से हिंदी हो रही है। मुझे मद्रास प्रांत की जनता की देशभक्ति, आत्मत्याग और बुद्धिमत्ता पर काफी भरोसा है। मैं जानता हूं कि जो भी लोग राष्ट्र की सेवा करना चाहेंगे या अन्य प्रांतों के साथ सम्पर्क चाहेंगे, उनको त्याग करना ही पड़ेगा, यदि हिंदी सीखने को त्याग ही माना जाय।

इंदौर हिंदी सम्मेलन के अवसर पर गांधी जी द्वारा व्यक्त विचारों पर गौर करें, तो मानना पडेगा कि हिंदी के संबंध में कुछ विशिष्ट बातें पहली बार राष्ट्र के सामने आयीं। हिंदी समस्त भारतवर्ष की सम्पर्क-भाषा बने, यह भारतीय नवजागरण के कई बौद्धिकों द्वारा प्रतिपादित किया जा चुका था, लेकिन यह कैसे संभव हो सके, इस संबंध में कोई सुनिश्चित योजना उनके द्वारा नहीं प्रस्तुत की जा सकी थी। गाँधी जी ने 20 अक्टूबर 1917 ई. को गुजरात के द्वितीय शिक्षा सम्मेलन में दिए गए अपने भाषण में राष्ट्रभाषा के कुछ विशेष लक्षण बताए थे, वे निम्न हैं:

1. वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए।
2. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक कामकाज शक्य होना चाहिए।
3. उस भाषा को भारत के ज्यादातर लोग बोलते हों।
4. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान होनी चहिए।
5. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या अस्थायी स्थिति पर जोर न दिया जाये।

अंग्रेजी भाषा में इनमें एक भी लक्षण नहीं है। यह माने बिना काम चल नहीं सकता। हिन्दी भाषा में ये सारे लक्षण मौजूद हैं। हिन्दी भाषा मैं उसे कहता हूं जिसे उत्तर में हिन्दू और मुसलमान बोलते हैं और देवनागरी या फारसी में लिखते हैं। 20 अक्टूबर के बाद 11 नवम्बर, 1917 को बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में भाषण करते हुए उन्होंने कहा, मैं कहता आया हूं कि राष्ट्रीय भाषा एक होनी चाहिए और वह हिंदी होनी चाहिए। हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपना राष्ट्रीय कार्य हिंदी भाषा में करें। हमारे बीच हमें अपने कानों में हिंदी के ही शब्द सुनाई दें, अंग्रेजी के नहीं। इतना ही नहीं, हमारी धारा सभाओं में जो वाद-विवाद होता है, वह भी हिंदी में होना चाहिए। ऐसी स्थिति लाने के लिए मैं जीवन-भर प्रयत्न करूंगा।

इस दृष्टि से गांधी जी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदी के राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार के लिए सुविचारित योजना प्रस्तुत की और हिंदी प्रचार के कार्य को मिशनरी स्वरूप प्रदान किया। धर्म के प्रचार को लेकर तो मानव-इतिहास में बहुतेरे मिशनरी, आत्मत्यागी महात्मा लोग होते आये है, लेकिन किसी भाषा के प्रचार के लिए मिशन की तरह, आत्मत्याग के रूप में काम करने का आह्वान करने वाले गांधी जी कदाचित् प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने यह आह्वान हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए किया।

13 दिसम्बर, 1920 को कलकत्ता में भाषण करते हुए गांधीजी ने कहा, यह निश्चित है कि सारे देश में जहां-कहीं देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों की मिली-जुली सभाएं और बैठकें होंगी, उनमें अभिव्यक्ति का राष्ट्रीय माध्यम हिंदी ही होगी। 22 जनवरी, 1921 को जारी किए, अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, जो बात मैं जोर देकर आपसे कहना चाहता हूं वह यह कि आप सबकी एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, सभी भारतीयों की एक सामान्य भाषा होनी चाहिए, ताकि वे भारत में जिस हिस्से में भी जायें, वहां के लोगों से बातचीत कर सकें। इसके लिए आपको हिंदी को अपनाना चाहिए। 23 मार्च 1921 को विजयनगरम में राष्ट्रभाषा हिंदी के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा, हिंदी पढ़ना इसलिए जरूरी है कि उससे देश में भाईचारे की भावना पनपती है। हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बना देना चाहिए। हिंदी आम जनता की भाषा होनी चाहिए। आप चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र एक ओर संगठित हो, इसलिए आपकी प्रान्तीयता के अभियान को छोड़ देना चाहिए। हिंदी तीन ही महीनों में सीखी जा सकती है।

हिंदी के सवाल को गांधी जी केवल भावनात्मक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं मानते थे, अपितु उसे एक राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में भी देखने पर जोर देते थे। 10 नवम्बर, 1921 के ‘यंग इण्डिया’ में उन्होंने लिखा हिंदी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्व की बात छोड़ दें तो भी यह दिन प्रतिदिन अधिकाधिक आवश्यक मालूम होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिंदी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिंदी में ही की जानी चाहिए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी ने पूरे देश में हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचार काफी जोरदार ढंग से किया और उसे राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, स्वाभिमान का पर्याय-सा बना दिया।

उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी-प्रचार के लिए दक्षिण भारत भेजा था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना उन्हीं की परिकल्पना का परिणाम है। उन्होंने वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हिन्दी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से ही की थी तथा जन-नेताओं को भी हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया था। उनकी प्रेरणा के ही परिणाम स्वरूप हिन्दीतर भाषा-भाषी प्रदेशों के स्वतंत्रता संग्राम के ने हिन्दी को सीख लिया था और उसे व्यापक जन-सम्पर्क का माध्यम बनाया था।

महात्मा गांधी ने सभी भारतीय भाषाओं का समादर और हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए 17 मई 1942 तथा 9 अगस्त 1946 को कहा था कि महान प्रांतीय भाषाओं को उनके स्थान से च्युत करने की कोई बात ही नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय भाषा की इमारत प्रांतीय भाषाओं की नींव पर ही खड़ी की जानी है। दोनों का लक्ष्य एक-दूसरे की जगह लेना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमी को पूरा करना है।

महात्मा गांधी के विचार, महान् भारतीय नेताओं की भावना और हिन्दी-भाषा-भाषी जनता की विशाल संख्या को दृष्टिगत रखते हुए पर्याप्त चिंतन-मनन के उपरांत भारतीय संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को भारतीय संविधान में राजभाषा की प्रतिष्ठा प्रदान की थी। 16 जून, 1920 के ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा, मुझे पक्का विश्वास है कि किसी दिन हमारे द्रविड भाई-बहन गंभीर भाव से हिंदी का अध्ययन करने लगेंगे। आज अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के लिए वे जितनी मेहनत करते हैं, उसका आठवां हिस्सा भी हिंदी सीखने में करें, तो बाकी हिंदुस्तान जो आज उनके लिए बंद किताब की तरह है, उससे वे परिचित होंगे और हमारे साथ उनका ऐसा तादात्म्य स्थापित हो जायेगा जैसा पहले कभी न था।

हिंदी के प्रचार को लेकर गांधी जी का ध्यान देश के दक्षिणी छोर की तरफ जितना था, उतना ही पूर्वी छोर की तरफ भी था। मार्च, 1922 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को जरूर स्थगित कर दिया, लेकिन राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रचार का उनका कार्य जारी रहा। 24 मार्च, 1925 को हिंदी प्रचार कार्यालय, मद्रास में बोलते हुए गांधीजी ने कहा, मेरी राय में भारत में सच्ची राष्ट्रीयता के विकास के लिए हिंदी का प्रचार एक जरूरी बात है, विशेष रूप से इसलिए कि हमें उस राष्ट्रीयता को आम जनता के अनुरूप सांचे में ढालना है। और सचमुच सच्ची राष्ट्रीयता के विकास के लिए गांधी जी जीवन-पर्यंत हिंदी के प्रचार-कार्य में लगे रहे। राष्ट्रभाषा के दायरे से मेहनतकश वर्ग बाहर न रहे, इसका भी गांधी जी ने पूरा ध्यान रखा। 21 दिसम्बर, 1933 को पैराम्बूर की मजदूर सभा में बोलते हुए गांधी जी ने कहा, साथी मजूदरों, यदि आप सारे भारत के मजदूरों के दुःख-सुख को बांटना चाहते हैं, उनके साथ तादात्म्य स्थापित करना चाहते हैं, तो आपको हिंदी सीख लेनी चाहिए, जब तक आप ऐसा नहीं करते, तब तक उत्तर और दक्षिण भारत में कोई मेल नहीं हो सकता।

जब भारत को स्वतंत्रता मिली ही थी। देश-विदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकार इस महत्वपूर्ण घटना के प्रकाशन हेतु भारतीय नेताओं के वक्तव्य, संदेश आदि के लिए आ रहे थे। ऐसे माहौल में एक विदेशी पत्रकार महात्मा गांधी से मिला। उसने बापू से अपना संदेश देने को कहा। किंतु वह इस बात पर अड़ रहा था कि बापू अपना संदेश अंग्रेजी में दें। गांधीजी इसके लिए सहमत नहीं हो रहे थे। मगर पत्रकार था कि लगातार जिद कर रहा था। उसका कहना था कि संदेश भारतीयों के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए है, इसलिए वह अंग्रेजी में ही बात कहें। उन दिनों बापू हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचार भी कर रहे थे। थोड़ी देर तक वह शांत बने रहे, मगर अंततः पत्रकार की बात पर महात्मा गांधी ने उसे दो टूक उत्तर देते हुए कहा- दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।

गांधी के अभियान का नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य क्षेत्रों के साहित्यकार जनपदीय भाषा को भूलकर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास में अपनी कलम चलायी। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि ने हिन्दी को राष्ट्रीय धर्म के रूप में अपनाया। बिहार में भी आचार्य शिवपूजन सहाय, राधिकारमण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, लक्ष्मी नारायण सुधांशु, नार्गाजुन, फणीश्वरनाथ रेणु आदि ने भी अपनी क्षेत्रीय बोलियों के मोह से उपर उठकर हिन्दी के विकास में योगदान देना अपना राष्ट्रीय धर्म समझा।

 

कुमार कृष्णन

संपर्क- कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार
      द्वारा बनारसी ठाकुर
      दषभूजी स्थान रोड
      मोगल बाजार, मुंगेर,बिहार
      मोबाइल- 09304706646

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