नोएडा | सहारा ग्रुप के वित्तीय संकट के बाद अब उसका प्रतिष्ठित मीडिया हाउस — सहारा इंडिया मीडिया एंड पब्लिकेशंस (SIMC) — भी अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है। कभी देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली मीडिया समूहों में शुमार यह हाउस अब अपने ही ढांचे की जड़ता और वरिष्ठ अधिकारियों की निष्क्रियता से डूबने की कगार पर है।
अंदरूनी सूत्रों का दावा — “अब सिर्फ बदलाव ही उपाय”
मीडिया हाउस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि संस्था की गिरती साख का सबसे बड़ा कारण है — टायर्ड और रिटायर्ड अधिकारियों की भीड़, जो अब भी प्रमुख पदों पर बने हुए हैं। इनमें से कई अधिकारी 60 से 70 वर्ष की उम्र के बीच हैं और फील्ड या प्रोडक्शन से उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया है।
जानकारी के मुताबिक, मीडिया हेड सुमित राय (65 वर्ष से अधिक) के संरक्षण में यह परंपरा और गहरी होती जा रही है।
लखनऊ से लेकर गोरखपुर तक एक जैसी स्थिति
नोएडा, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, देहरादून और पटना यूनिटों में तैनात कई मैनेजर और संपादक 62 से 68 वर्ष के बीच हैं। लखनऊ यूनिट के एक मैनेजर के बारे में चर्चा है कि वे ऑफिस से बाहर नहीं निकलते और नोएडा मुख्यालय की बैठकों में भी भाग नहीं लेते। इसी तरह, कानपुर और गोरखपुर यूनिटों में भी कई वरिष्ठ अधिकारी केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराते हैं। विज्ञापन एजेंसियों और कारोबारी साझेदारों से संपर्क लगभग समाप्त हो चुका है।
मीडिया हेड पर उठ रहे सवाल
नोएडा कैंपस के कर्मचारियों का कहना है कि मीडिया हेड का ध्यान नए, मेहनती और सक्रिय कर्मचारियों की छंटनी पर रहा है, जबकि “रिटायर्ड मानसिकता वाले” अधिकारियों को संरक्षण दिया जा रहा है। कई कर्मियों का मानना है कि यदि मीडिया हेड की जगह किसी ऊर्जावान और मीडिया समझ रखने वाले व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाती, तो सहारा मीडिया की हालत इतनी खराब नहीं होती।
सुब्रत राय के बाद नेतृत्व शून्य
सहारा समूह के संस्थापक सुब्रत राय के निधन के बाद मीडिया विंग की कमान उनके छोटे भाई जयव्रत राय के पास है, जो इन दिनों विदेश में हैं। कर्मचारियों का कहना है कि “वे विदेश में बैठकर अपने डूबते साम्राज्य का तमाशा देख रहे हैं।” संगठन में कोई ठोस नेतृत्व या रणनीति फिलहाल नज़र नहीं आती।
अदानी अधिग्रहण की चर्चा से उम्मीदें जागीं
सूत्रों के अनुसार, अदानी ग्रुप सहारा मीडिया के अधिग्रहण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। कहा जा रहा है कि 30 जून 2026 तक अदानी ग्रुप सहारा मीडिया से जुड़े सभी कर्मचारियों का वेतन और देनदारियां चुकाएगा।
हालांकि इसके बाद समूह का भविष्य क्या होगा — यह पूरी तरह प्रबंधन के फैसले पर निर्भर करेगा।
अब फैसला सहारा प्रबंधन के हाथ में
मीडिया कर्मियों का कहना है कि अब समय आ गया है कि सहारा प्रबंधन यह तय करे — क्या वे अपने चापलूस और निष्क्रिय अधिकारियों को बचाए रखेंगे या संगठन को नई दिशा देंगे। यदि बदलाव नहीं हुआ, तो सहारा इंडिया की तरह सहारा मीडिया भी डूबते टाइटैनिक की तरह इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
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Kamlesh tiwari
October 5, 2025 at 8:50 pm
सही कहा 45 की उम्र के बाद कम से कम डेस्क से पुरानी सोच वाले कर्मचारियों को हटा देना चाहिए, वो केवल हुक्म देना ही जानते हैं काम करना नहीं