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सहाराश्री का जाना-5 : सुब्रत रॉय के बेटों की शादी में तत्कालीन वित्तमंत्री जसवंत सिंह क्यों नहीं गए थे, जानिए अंदर की बात!

अनिल भास्कर-

बुलन्दियों पर पहुंचकर सहाराश्री भव्यता का पर्याय बनने के साथ-साथ आत्ममुग्धता का शिकार हो चले थे। उनके सचिवालय के कारिंदों और सलाहकार मंडली ने उनमें सरकार, कानून, शासन-व्यवस्था से ऊपर, सबसे शक्तिशाली होने का भरम रोपना शुरू कर दिया था। उन्हें समझाने लगे थे- ज़माना आपसे है, आप ज़माने से नहीं। पर सच यही था कि उनके सलाहकार उन्हें जो दुनिया दिखा रहे थे, वह उनके (सलाहकारों के) स्वार्थ की छद्मरचना भर थी। वे दुनिया की सच्चाई और सहाराश्री के बीच लगातार दीवार चौड़ी करते रहे और खुद को उनके सबसे समर्पित हितसाधक के तौर पर पेश करते रहे। उनकी यह चालाक कोशिश, सितारों की महफ़िल, अपने लाखों समर्पित-दण्डवत कार्यकर्ताओं (कर्मचारियों) की विशाल फौज और सरकार-ब्यूरोक्रेसी तक सीधी पहुंच ने सहाराश्री के भरम को मजबूत किया। अब वह वैसा ही मानने-करने लगे थे। इसी भरम में सहाराश्री सरकार और ब्यूरोक्रेसी से टकराने का दुस्साहस भी करने लगे। यह आत्मघाती था सो कालांतर में विध्वंसक सिद्ध हुआ।

आइए आपको एक मजेदार किस्सा सुनाता हूं। वर्ष 2004 के फरवरी माह में सहाराश्री के दोनों बेटों- सुशांतो रॉय और सीमांतो रॉय का परिणय संस्कार होना था। उन दिनों मैं राष्ट्रीय सहारा में नेशनल ब्यूरो चीफ़ की भूमिका में था। मुझे इस शादी समारोह के लिए दिल्ली का गेस्ट कोऑर्डिनेटर बनाया गया। सरकार से लेकर विपक्ष और ब्यूरोक्रेसी के तमाम दिग्गजों को निमंत्रण पत्र भेजना, उनकी उपस्थिति सुनिश्चित कराना और तय कार्यक्रम के अनुसार उन्हें लखनऊ सहारा शहर तक पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस दौरान तय हुआ कि सहाराश्री की पत्नी श्रीमती स्वप्ना रॉय और अनुज जयब्रत रॉय तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह से व्यक्तिगत तौर पर मिलकर न्योता देंगे। इसके लिए सहाराश्री का एक पत्र जसवंत सिंह को दिया जाना था ताकि वह इन दोनों को मिलने का समय दे सकें।

जब यह पत्र मेरे पास आया और मैंने इसका मजमून पढ़ा तो बड़ा अटपटा लगा। पत्र में दिन और समय तय करते हुए मिलने का आग्रह था। असहमत होते हुए भी वह पत्र हमने जसवंत सिंह के कार्यालय पहुंचा दिया। मुझे जो आशंका थी, वही हुआ। वित्तमंत्री के निजी सचिव ने यह कहते हुए पत्र लौटा दिया कि आप मिलने का समय मांग रहे और वह भी अपने ही तय कार्यक्रम के अनुसार? यह कतई संभव नहीं। आप संशोधित पत्र लेकर आएं जिसमें आप सिर्फ प्रयोजन उल्लेख के साथ मिलने का समय मांगें। मिलने का दिन और समय वित्तमंत्री खुद तय करेंगे। स्वाभाविक ही था।

मैंने यह बात लखनऊ सहारा शहर में सहाराश्री के सेक्रेटेरिएट में बनाई गई गेस्ट कोऑर्डिनेशन कमेटी के मुखिया को बताई। वह भड़क उठे। बोले- अरे! सहाराश्री दोबारा चिट्ठी लिखेंगे? आपने समझ क्या रखा है? आप वही चिट्ठी लेकर जाएं और दोबारा आग्रह कर अपॉइंटमेंट सुनिश्चित कराएं। चूंकि जयब्रत रॉय और श्रीमती स्वप्ना रॉय को मिलने जाना था, सो मैंने पूरा मामला जयब्रत रॉय जी तक पहुंचवा दिया। खैर, वहां से जो जवाब आया, उस पर मैंने राहत की सांस ली और बाकी अतिथियों के संयोजन में जुट गया।

बहरहाल, शादी में प्रधानमंत्री वाजपेयी, उपप्रधानमंत्री आडवाणी, उपराष्ट्रपति शेखावत समेत कई केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और ब्यूरोक्रेट्स तो पधारे, पर जसवंत सिंह नहीं पहुंचे। पैराबैंकिंग जैसे बेहद संवेदनशील व्यवसाय वाली कम्पनी ने शायद देश के वित्तमंत्री को खिन्न कर दिया था।

विडम्बना यह भी कि कम्पनी में शीर्ष पदों पर आसीन अधिकारी कई मामलों में भीतर से असहमत होने के बावजूद कभी सहाराश्री से असहमति जताने का साहस नहीं कर पाए। कहने को तो कम्पनी में कोई मालिक नहीं था। कम्पनी संविधान भी यही दावा करता था, लेकिन सच यह था कि सहाराश्री कम्पनी के अकेले मालिक थे। बाकी सभी उनके आदेशपाल। एक और किस्सा सुनिए। शायद वह 2002 का साल था।

सहाराश्री अमेरिका की यात्रा से लौटे तो हिंदी का साप्ताहिक अखबार शुरू करने का मन बनाकर। यहां आकर उन्होंने अपनी कोर टीम से यह सपना साझा किया। फिर क्या था सब लग गए उसे साकार करने में। राष्ट्रीय सहारा के तत्कालीन समूह सम्पादक गोविंद दीक्षित जी को मुझ पर अटूट भरोसा था। उन्होंने इस प्रोडक्ट की डमी तैयार करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी।

मैं जिम्मेदारी निभाने में जुट तो गया, लेकिन आधे-अधूरे मन से। दरअसल तब तक मैं संडे मेल, संडे आब्जर्बर और दिनमान टाइम्स जैसे साप्ताहिक अखबारों की दुर्गति देख चुका था। यह भी समझ आने लगा था कि नया पाठक वर्ग शायद अब खबरों, यहां तक कि विश्लेषण के लिए हफ्तेभर इंतज़ार करने को राजी न था। तब सोशल मीडिया नाम की कोई चिड़िया तो जनसंचार के आसमान में नहीं उड़ती थी, लेकिन इंटरनेट का संजाल धीरे-धीरे विस्तार पा रहा था। एक तरह से साइबर युग की शुरुआत हो चुकी थी और ज़िंदगी की रफ्तार तेज़।

हालात देखते हुए मुझे निजी तौर पर इस उपक्रम के नाकाम होने का खतरा दिख रहा था। इसी दौरान प्रोजेक्ट की प्रगति का मूल्यांकन करने के लिए तत्कालीन मीडिया हेड अब्दुल दबीर ने बैठक बुलाई तो मैंने उनसे अपने मन का डर साझा कर लिया। दबीर साहब भड़क उठे। मेरी आशंकाओं से उन्हें कोई वास्ता नहीं था। बोले- हद है! सहाराश्री ने एक सपना देखा है और आप हैं कि इसे पूरा करने में जी-जान लगाने के बजाय मीन-मेख निकाल रहे हैं? उन्होंने जिस अंदाज में लानत-मलानत की, मुझे लग गया कि यहां बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश नहीं है। सो मन के डर को किनारे रखकर डमी बनाने में जुट गया।

एक हफ्ते बाद गोविंद जी वह डमी लेकर सहाराश्री से मिलने मुम्बई उड़ गए। सहाराश्री को डमी पसंद आई और उन्होंने प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा दी। जल्द ही इसे चलाने के लिए नई सम्पदाकीय टीम गठित हो गई और बड़े भव्य अंदाज़ में प्रकाशन भी शुरू हो गया। लेकिन मेरी आशंका अंततः सही निकली और यह प्रोडक्ट शानदार होने के बावजूद दीर्घायु नहीं हो सका।

क्रमशः

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