संजय कुमार-
अमर उजाला में ढाई दशक— अमर उजाला मेरठ में एक जनवरी 2000 को ज्वाइन किया था। एक जनवरी आते ही अमर उजाला में पच्चीस साल पूरे हो जाएंगे। इससे पहले पत्रकारिता की शुरुआत वर्ष 1992 में राष्ट्रीय सहारा वाराणसी से की। पत्रकारिता में तीन साथी प्रदीप तिवारी, दीपक मिश्रा और मैं स्वयं एक साथ की। तीनों मित्र महाराष्ट्र के औरंगाबाद में देवगिरि समाचार पत्र में करीब दो साल तक काम किया।
औरंगाबाद में दो मित्र और जुड़े। इनमें से एक रामानुज राय और पराग मांदले जी। रामानुज राय बीटेक कर रहे थे। उनका स्वभाव और आत्मीयता लाजवाब है। साथ में योगेंद्र कुमार जी भी रहते थे। यहां भी जीवन छोटे से परिवार के साथ सुखमय सा कटा। इस पत्र के संपादक उस दौरान अनिल सोनी जी थे। उनके नेतृत्व में काफी कुछ सीखने को मिला। इसके बाद तीनों मित्र प्रदीप, दीपक और मैं यानी संजय ने औरंगाबाद को अलविदा कर पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाराणसी अपने घर लौट आए।
फिर दो साल बाद प्रदीप और दीपक ने मेरठ में अमर उजाला ज्वाइन किया और मैंने बहुभाषी अक्षर भारत नोएडा ज्वाइन किया। इस अखबार में गोरखपुर निवासी श्री विजय प्रताप सिंह से बहुत कुछ सीखने को मिला जैसा उनका नाम वैसा काम भी था। दीपक ने बाद में पांचजन्य कुछ दिनों के लिए दिल्ली में ज्वाइन कर लिया। कोरोना काल में प्रदीप तिवारी बीमार पड़ गए। इसके बावजूद काफी दिनों तक संपादक के तौर पर पायनियर दिल्ली में काम किया। बीमारी के कारण उन्हें पत्रकारिता से दूरी बनानी पड़ी।
हम तीनों में एकरूपता है कि तीनों एक-दूसरे के लिए दिल से मरते जीते हैं। शुरुआत मेरठ से हुई। मेरठ में एक फिर नया कारवां जुड़ा। यहां एक विस्तृत परिवार का विस्तार हुआ। इस परिवार में मुकेश सिंह, विकास मिश्रा जी, दीपक सती, शेषमणि शुक्ला, दिनेश उप्रेती, रमेश विश्वकर्मा और हेमंत रस्तोगी आदि लोग। अमर उजाला में श्री नरेश शर्मा जी और लव जी के मार्गदर्शन में सबसे ज्यादा काम करने का मौका मिला। शर्मा जी काम के प्रति काफी समर्पित रहते थे। उनके कराए गए पेज सज्जा का कोई तोड़ नहीं होता था।
इस सूची में विजय तिवारी जी का नाम छूट रहा था, लेकिन याद आ गए। ये लोग आज भी परिवार के सदस्य की तरह जुड़े हुए हैं। राजेन्द्र मौर्या जी से भी आत्मीय संबंध है। हर सुख दुख में शामिल जरूर होते हैं। प्रदीप तिवारी हमसे पहले से ही मेरठ अमर उजाला में काम करते थे। मुझे आज भी याद है कि रामेश्वर पांडे जी संपादक हुआ करते थे। प्रदीप तिवारी ने उनसे कहा कि संजय के ज्वाइन अभी तक नहीं होने के कारण तीन दिन से भोजन नहीं कर रहा हूं। इसके बाद हमारे वरिष्ठ एवं अभिभावक पंकज तिवारी जी ने नियुक्ति में अहम भूमिका निभाई।
पंकज भाई साहब की जितनी भी तारीफ करूं उतना ही कम होगा। श्रीकांत अस्थाना जी भी एक परिवार की तरह आज तक स्नेह बनाए रखा है। साल तो नहीं याद है इसके बाद मुलाकात हुई कुमार अतुल जी से। कुमार अतुल जी ज्ञान के भंडार और दिल के धनी हैं। अक्सर उनसे मार्गदर्शन लेता रहता हूं। मैं मेरठ और कुमार अतुल जी ने देहरादून में अपना ठिकाना बना लिया है।
वर्ष 2004 में जितेंद्र दीक्षित जी से मुलाकात हुई। उनके परिवार से ऐसा संबंध बना कि आज भी उनके न होते हुए भी यादें ताजा है। उनकी पत्नी यानी मेरी भाभी जी हमेशा मुझे बेटे और रीना को बेटी की तरह स्थान दिया। सुबह ग्यारह बजे की चाय रोजाना भाभी जी के यहां होता था। कभी विलंब हो जाए तो फोन आ जाता था कि मालिक कहां रह गए। उनका प्यार से दिया हुआ मालिक का संबोधन आफिस में भी प्रचलित हो गया। दीक्षित जी की दो बेटियां कृति और प्रिंसी से आज भी आत्मिक लगाव बहुत ज्यादा है। कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि हम लोग एक परिवार के नहीं हैं।
आफिस में भी सभी लोग एक परिवार की तरह रहा करते थे। इस पड़ाव में संपादक के रूप में श्री अक्कू श्रीवास्तव ,श्री शशि शेखर जी, श्री सुधांश जी, श्री रविन्द्र श्रीवास्तव जी, आलोक भदौरिया जी, श्री शंभू नाथ शुक्ला जी, श्री सूर्य कांत जी, श्री राजीव सिंह जी, श्री राजेन्द्र त्रिपाठी जी और राजेंद्र सिंह जी के साथ काम करने का मौका मिला। अब हरियाणा के हिसार में पहले श्री अमरनाथ जी और श्री गुरदीप जी के नेतृत्व में काम कर रहा हूं। हम लोगों के हरियाणा स्टेट के प्रभारी श्री विजय गुप्ता जी का भी समय समय पर मार्गदर्शन मिलता रहता है।
हमारी श्रीमती रीना ने नौकरी शुरू की तो अमिता मैम और निधि जुड़ीं। इन लोगों से भी पारिवारिक रिश्ता कायम हुआ। इन सभी लोगों से आज भी मधुर संबंध बरकरार है। अंत में अपनी लाडली बेटी मेनका का जिक्र न करें तो लिखना अधूरा रह जाएगा। बेटे मधुरेश की तरह उसे भी ईश्वर उसकी झोली खुशियों से भर दे बस मेरी यही इच्छा है।
इन 25 सालों में मेरठ और अमर उजाला संस्थान ने बहुत कुछ दिया उसका दिल से आभार हैं। इस अखबार में ज्वाइनिंग के दौरान हम लोगों को श्रद्धेय श्री अतुल माहेश्वरी जी के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त है। उनकी महानता थी कि उन्होंने ही एक परिवार का माहौल दिया। कभी भी उन्हें नाराज होते नहीं देखा। विपरीत हालातों में भी हमेशा शांत रहते थे। हम लोगों को कोई भी समस्या होती थी खुले दरबार में पेश होकर करा लेते थे। उनका समय से पहले जाना खल गया।


