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दो तरह का मीडिया है, एक सरकार के प्रचार वाला और दूसरा सेठ के व्यापार का

मथुरा। आज मीडिया के सामने साख का संकट है जिसे लेकर पाठक और टीवी दर्शकों में अजीब सी बेचैनी देखने को मिल रही है। उदारीकरण के साथ समाज में मूल्यों की गिरावट का असर मीडिया पर स्पष्ट देखने को मिल रहा है। मीडिया अनुशासन का काम जनता को ही करना होगा। ये विचार वार को शहर एक होटल में जन सांस्कृतिक मंच द्वारा ‘लोकतंत्र के सात दशक और मीडिया’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला और लोकसभा टीवी के वरिष्ठ एंकर अनुराग दीक्षित ने व्यक्त किए।

मथुरा। आज मीडिया के सामने साख का संकट है जिसे लेकर पाठक और टीवी दर्शकों में अजीब सी बेचैनी देखने को मिल रही है। उदारीकरण के साथ समाज में मूल्यों की गिरावट का असर मीडिया पर स्पष्ट देखने को मिल रहा है। मीडिया अनुशासन का काम जनता को ही करना होगा। ये विचार वार को शहर एक होटल में जन सांस्कृतिक मंच द्वारा ‘लोकतंत्र के सात दशक और मीडिया’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला और लोकसभा टीवी के वरिष्ठ एंकर अनुराग दीक्षित ने व्यक्त किए।

शंभुनाथ शुक्ला ने कहा दो तरह का मीडिया है एक सरकार, दूसरा सेठ का। सेठ के लिए मीडिया व्यापार है तो सरकारी मीडिया प्रचार माध्यम। सेठ का मीडिया पेड न्यूज संस्कृति का पोषण कर रहा है। तब सूचनाओं के नाम पर विश्वसनीयता का  सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। आज मीडिया उन लोगों की उपेक्षा कर रहा जो वाकई सही मायनों में देश और समाज के लिए कुछ कर रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया जनता के मीडिया के रूप में प्रभावी साबित हो रहा है।

अनुराग दीक्षित ने कहा कि निजी चैनलों से कहीं ज्यादा लोकसभा टीवी जैसे चैनलों पर देखी जा सकती है। निजी चैनलों पर होने वाली डिबेटें दर्शकों के लॉजिक को नहीं बढ़ा रही बल्कि कन्फ्यूज कर रही हैं कि सच क्या है। निजी चैनलों के लिए दिल्ली या फिर राज्यों की राजधानी तक की कवरेज ही हिन्दुस्तान है। जनता के बुनियादी सवाल सिरे से गायब हैं। आज जरुरत इस बात की स्वघोषित लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को जनता ही नियंत्रित करे ताकि आने वाले समय में निजी चैनल अपने कंटेट को बदलने के मजबूर हों। आठ-नौ हजार टीआरपी बॉक्स की रेटिंग से एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों की रुचि तय की जा रही है।

व्याख्यान के बाद सवाल जवाबों का गंभीर सिलसिला चला जो मीडिया में आई गिरावट से जुड़े सवालों में जनता की बेचैनी को व्यक्त कर रहा था। गोष्ठी में विशेष रूप से उपस्थित पत्रकार, साहित्यकार और रंगकर्मीयों में डॉ.अशोक बसंल, डॉ. आरके चतुर्वेदी, डॉ. धर्मराज, विनय ओसवाल, विजय विद्यार्थी आर्य, रवि भारद्वाज, मुरारीलाल अग्रवाल, सतीश चांद, आदि थे। संचालन राजकुमार ने किया।

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