मार्कंडेय काटजू-
लल्लनटॉप जैसे चर्चित हिंदी डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म के संपादक रहे सौरभ द्विवेदी के हालिया इस्तीफे/हटाए जाने को लेकर भारतीय मीडिया जगत में ज़बरदस्त चर्चा है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज के दौर में भारत में संपादकीय स्वतंत्रता वास्तव में बची हुई है।
सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप की परिकल्पना की, उसे लगभग 12 वर्षों तक लगभग अकेले दम पर खड़ा किया और उसे देश का एक बेहद लोकप्रिय डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि बहुत से लोग उन्हें ही लल्लनटॉप का मालिक समझने लगे। संभवतः स्वयं सौरभ भी यह मानने लगे कि वे अपरिहार्य हैं और जो चाहें कर सकते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वे केवल एक कर्मचारी थे—भले ही अत्यधिक वेतन पाने वाले—और उनके नियोक्ता थे इंडिया टुडे ग्रुप, जिसके मालिक अरुण पुरी हैं।
भारत में एक समय ऐसा था जब संपादक मालिकों के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से काम कर सकते थे। लेकिन यह स्थिति 1998 में बदल गई, जब टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक अशोक जैन ने संपादक एच.के. दुआ को पद से हटा दिया। दुआ का आरोप था कि उनसे मालिक के निजी कानूनी मामलों में संपादकीय पद का उपयोग करने को कहा गया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। इसके अगले ही दिन उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। इस घटना ने पूरे मीडिया जगत को यह संदेश दे दिया कि संपादक केवल कर्मचारी हैं और उन्हें वही करना होगा जो मालिक कहे।
मुझे लगता है कि सौरभ द्विवेदी इस सच्चाई को भूल बैठे। अपनी लोकप्रियता के कारण उन्होंने शायद यह मान लिया कि वे मालिक की इच्छा से परे जाकर भी अपने कार्यक्रम चला सकते हैं। लेकिन मीडिया संस्थानों के मालिक मूलतः व्यवसायी होते हैं और वे सत्ता के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि सरकार से मिलने वाले लाभ और राहत उनके लिए महत्वपूर्ण होते हैं। सत्ता को नाराज़ करना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है।
लल्लनटॉप के कुछ हालिया कार्यक्रम कथित तौर पर बीजेपी सरकार को नाराज़ करने वाले थे। इनमें उर्दू शायर जावेद अख्तर और एक मुस्लिम धर्मगुरु के साथ किया गया कार्यक्रम “Does God Exist” शामिल था। इसके अलावा, इंदौर में जहरीला पानी पीने से बच्चों की मौत पर आधारित शो में सौरभ द्विवेदी द्वारा मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना, संभवतः अंतिम कारण साबित हुआ।
सौरभ द्विवेदी की बर्खास्तगी आज फिर वही संदेश दोहराती है जो 1998 में एच.के. दुआ को हटाए जाने के बाद दिया गया था—
भारत में संपादक स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें मालिक की इच्छा के अनुसार ही काम करना होता है। यदि कोई संपादक खुद को बहुत बड़ा समझने लगे या मालिक की लाइन से हटे, तो उसे अपनी नौकरी गंवानी पड़ सकती है, जिसके परिणाम उसके परिवार तक को भुगतने पड़ सकते हैं।
यह प्रकरण भारतीय मीडिया में मालिकाना दबाव, सत्ता से निकटता और संपादकीय स्वतंत्रता के क्षरण का एक और उदाहरण है।
लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और देश के चर्चित वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।
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