एक वो दिन भी था जब सौरभ की लेखनी और आवाज से प्रभावित होकर मैनेजमेंट ने उन्हें ‘इंडिया टुडे’ (हिंदी) मैगजीन का संपादक नियुक्त किया। यह एक ऐतिहासिक निर्णय था, क्योंकि इतनी कम उम्र और अनुभव में यह जिम्मेदारी पाना मुश्किल है। आपको याद दिला दूं कि इस पत्रिका के संपादक प्रभु चावला, एमजे अकबर और कावेरी बामजई जैसे दिग्गज रहे हैं…
शिवेंद्र-
मीडिया जगत की चकाचौंध भरी इमारतों में एक अलिखित नियम हमेशा से कायम रहा है वो नियम है कि “सूरज चाहे कितना भी चमकदार क्यों न हो, वह उस आसमान से बड़ा नहीं हो सकता जिसने उसे जगह दी है।” टीवी टुडे नेटवर्क (India Today Group) और सौरभ द्विवेदी का दशकों पुराना रिश्ता आज इसी मुकाम पर आकर टूट गया है।
साल 2016 के आसपास की बात है, जब न्यूज़ रूम के एक गुमनाम कोने में शीशों पर चार्टपेपर चिपकाकर ‘लल्लनटॉप’ की नींव रखी जा रही थी। उस वक्त टीवी टुडे मैनेजमेंट के मन में एक अनजाना डर था। वे आशंकित थे कि यदि यह ‘देसी’ प्रयोग विफल रहा, तो कहीं ‘आजतक’ जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड की साख पर आंच न आए। सौरभ द्विवेदी को इसी एकांत कमरे की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने अपनी मेहनत, अनूठी शैली और किस्सागोई से इस प्रयोग को न केवल सफल बनाया, बल्कि इसे एक जन-आंदोलन में बदल दिया। किंतु विडंबना देखिए, जिस सफलता ने उन्हें पहचान दी, वही आगे चलकर उनके अहंकार की खाद बन गई। जिस ब्रांड को मैनेजमेंट ने सुरक्षा के लिहाज से ‘आजतक’ से अलग रखा था, दुनिया उसे सौरभ का निजी स्टार्टअप समझने लगी, जबकि वास्तविकता यह थी कि वे वहां महज एक मुलाजिम थे जिसकी जिम्मेदारी संपादक के तौर पर थी।
कॉर्पोरेट की भाषा में इसे ‘इंडिस्पेंसिबिलिटी सिंड्रोम’ कहते हैं—अर्थात् जब किसी कर्मचारी को यह भ्रम हो जाए कि वह स्वयं ही नियम है और संस्थान उसके बिना अधूरा है। खैर, व्यक्तिगत रूप से मुझे फेसबुक पर ज्ञान देने की आदत नहीं है, पर आज लिखना जरूरीलगा। वजह ये कि सोशल मीडिया पर जो अधकचरी जानकारियां परोसी जा रही हैं, वे सच से कोसों दूर हैं। भ्रम का यह सिलसिला इतना न बढ़ जाए कि लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से अफ़वाहों में सच तलाशने लगें, इसलिए आज पर्दे के पीछे की ये असली कहानी जान लीजिए।
आगे बढ़ने से पहले यह बता दूँ कि में जिस टीवी टुडे नेटवर्क के विषय में मैं यह लिख रहा हूँ, वहां मैंने 15 साल काम किया हैं। मैं उस न्यूज़ रूम के हर किरदार की कहानी उन लोगों से बेहतर जानता हूँ जो दूर बैठकर केवल कयासबाजी कर रहे हैं। मैं ये साफ कर दूं कि ना तो मेरी सौरभ से कोई अनबन है ना ही गहरी दोस्ती। हमने एक संस्थान में साथ में काम किया है और हम एक दूसरे को जानते है। लिख रहा हूं ताकि वो लोग जो आज इस मुकाम पर है वो भी समझने की कोशिश करें कि आखिर क्या नहीं करना चाहिए। इसलिये सौरभ के बहाने ये किस्सा एक ऐसे शख्स का है जिसने संस्थान के भीतर रहकर एक ऐसा ‘प्रोडक्ट’ खड़ा किया जिसने डिजिटल पत्रकारिता की परिभाषा बदल दी और अपना कद इतना बड़ा कर लिया कि देश-दुनिया में उनकी अलग पहचान बन गई। पर ऐसा क्या हुआ कि अचानक उसने नेटवर्क को इतनी खामोशी से अलविदा कह दिया?
बंद कमरे में शुरू हुआ ‘लल्लनटॉप’ का वह प्रयोग जब प्रचंड सफल हुआ, तो उसने करोड़ों लोगों के दिलों में पैठ बना ली। पर सफलता के चरम पर भी ‘आजतक’ ने उसे अपने नाम के साथ नहीं जोड़ा। इसी दूरी ने यह धारणा पुख्ता की कि सौरभ ही इसके सर्वेसर्वा या मालिक हैं। जबकि सच यह है कि लल्लनटॉप पूरी तरह टीवी टुडे नेटवर्क के स्वामित्व का हिस्सा है। सौरभ वहां केवल संपादक थे। लगभग एक साल पहले ही उनसे कमान लेकर कुलदीप को हेड बना दिया गया था—वही कुलदीप जिन्हें आप आजतक रेडियो के ‘तीन ताल’ प्रोग्राम में सुनते हैं। इन सबके शीर्ष पर डिजिटल टीम के सर्वेसर्वा कमलेश सिंह जी हैं।
सौरभ का अचानक जाना भले ही स्वेच्छा से लिया गया निर्णय लगता हो, पर इसके पीछे की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी। किसी भी कॉर्पोरेट तंत्र का यह शाश्वत नियम है कि कर्मचारी का कद संस्थान से बड़ा नहीं हो सकता। सौरभ के मामले में भी इसी नियम की रस्साकसी चल रही थी। एक वो दिन भी था जब सोरभ की लेखनी और आवाज से प्रभावित होकर मैनेजमेंट ने उन्हें ‘इंडिया टुडे’ (हिंदी) मैगजीन का संपादक नियुक्त किया। यह एक ऐतिहासिक निर्णय था, क्योंकि इतनी कम उम्र और अनुभव में यह जिम्मेदारी पाना मुश्किल है। आपको याद दिला दूं कि इस पत्रिका के संपादक प्रभु चावला, एमजे अकबर और कावेरी बामजई जैसे दिग्गज रहे हैं।
शायद इसी उपलब्धि ने उनके भीतर उस ‘अहम’ को जन्म दिया जिसने उन्हें वास्तविकता से दूर कर दिया। धीरे-धीरे सौरभ वो व्यक्ति नहीं रहे जिन्हें कमलेश सिंह जैसे सुलझे हुए इंसान इस संस्थान में लेकर आए थे। वे अब स्वयं को अपने मार्गदर्शकों से भी ऊपर समझने लगे थे। सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए वे उन लोगों के लिए अजनबी होते गए जिनके बीच से वे निकले थे। टीम के भीतर उनके व्यवहार और ‘एटीट्यूड’ को लेकर गहरा असंतोष था। उनके व्यवहार की एक बानगी देखिए और टीम के ही एक सदस्य का कहना है कि एक बार जब टीम की एक सहकर्मी अपने जन्मदिन के कारण कार्यस्थल पर थोड़ी देर से पहुँची, तो सौरभ ने सबके सामने उसे बुरी तरह झिड़कते हुए कहा, “पैदा होकर तुमने धरती पर कौन सा अहसान कर दिया है जो इसे इतना सेलिब्रेट कर रही हो?”
हो सकता है कि ये सब किसी विरोधी के बारे में कही गई अतिशयोक्ति हो और व्यक्तिगत व्यवहार की कमियां तो शायद ढकी रह जातीं, लेकिन कोई भी संस्थान ‘लगातार अनुशासनहीनता’ को बर्दाश्त नहीं कर सकता। लोकप्रियता की चकाचौंध में सौरभ ने कंपनी के नियमों को दरकिनार करना शुरू कर दिया था। टीवी टुडे का नियम स्पष्ट है—चाहे कोई कितना भी वरिष्ठ हो, किसी बाहरी मंच या विदेश में शामिल होने या बोलने के लिए टॉप मैनेजमेंट की अनुमति लेना जरूरी है। टीवी टुडे में श्वेता सिंह, शम्स ताहिर खान, अंजना ओम कश्यप और विक्रांत गुप्ता जैसे तमाम स्थापित संपादकों ने कभी इस मर्यादा को नहीं तोड़ा, किंतु सौरभ ने इसे चुनौती दी। वे बिना अनुमति अमेरिका और अन्य देशों की यात्राएं करने लगे और कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। जब वरिष्ठों के माध्यम से उन्हें टोकने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि “उन्हें किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”
विवादों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। कुछ महीने पहले जब आमिर खान अपनी टीम के साथ टीवी टुडे के दफ्तर आए और लल्लनटॉप को तीन घंटे का विशेष इंटरव्यू दिया, तो वहां फिर से व्यवस्था की नाफरमानी हुई। कम्पनी में ‘सिनेर्जी’ के नियम के अनुसार, जब कोई बड़ा सितारा दफ्तर आता है, तो सभी विभागों को सूचित किया जाता है ताकि संस्थान को उसका अधिकतम लाभ मिल सके। किंतु सौरभ ने इसे गुप्त रखा। जब मैनेजमेंट ने जवाब मांगा, तो फिर वही रुख “मैं किसी को जवाबदेह नहीं हूँ।” और ये सब उन लोगों को कहा जा रहा था जो पत्रकारिता में उनसे कहीं अधिक वरिष्ठ और अनुभवी थे।
मैनेजमेंट की नजरें अब टेढ़ी हो चुकी थीं और वे एक ऐसे मौके के इंतजार में थे जहाँ यह फिर से साबित किया जा सके कि संस्थान ही सर्वोपरि है।
ये मौका आया 20 दिसंबर 2025 को। अपनी पुरानी आदत के अनुसार सौरभ बिना अनुमति एक ऐसे कार्यक्रम में मॉडरेटर बनकर पहुँच गए जहाँ ‘Does God Exist?’ (क्या ईश्वर है?) जैसे संवेदनशील विषय पर जावेद अख्तर और मुफ्ती शमैल नदवी के बीच बहस हो रही थी। इस विवादित डिबेट की पूरी रिकॉर्डिंग भी बिना अनुमति ‘लल्लनटॉप’ के चैनल पर प्रसारित कर दी गई। यह विषय न केवल समाज के एक वर्ग को चुभा, बल्कि इसकी शिकायत मैनेजमेंट और सरकार तक भी पहुँची। संस्थान के लिए यह भारी शर्मिंदगी और जोखिम का सब्जेक्ट बन गया।
इसके बाद वही हुआ जो होना था। कुछ तल्ख फोन कॉल्स, आपसी खींचतान। बीच का रास्ता खोजने की कोशिश और वो रास्ता था विदाई का फैसला। मैनेजमेंट ने तय किया कि ये संदेश भी स्पष्ट जाना चाहिए कि जिस प्रकार प्रभु चावला इंडिया टुडे के मालिक नहीं थे, उसी तरह सौरभ द्वेदी लल्लनटॉप के मालिक नहीं हैं। वे एक मुलाजिम हैं और हर मुलाजिम का एक कार्यकाल होता है।
उनकी विदाई को लेकर एक मौन निर्देश यह भी रहा कि संस्थान का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी विदाई समारोह में उपस्थित नहीं रहेगा। यही कारण है कि केक काटने के वीडियो में अगर आप ध्यान देंगे तो पाऐंगे कि पेशेगत मजबूरी के चलते टीम के सदस्यों के अलावा केवल एक वरिष्ठ चेहरा, कमलेश सिंह का ही नजर आता हैं। लेकिन आप ये भी देखेंगे कि चंद फ्रेम्स में कैद उनकी मौजूदगी में भी उनके चेहरे के हाव-भाव खुद ही पूरी कहानी बयां कर रहे हैं।
औऱ आखिर में सौरभ ने भले ही ये दावा किया है कि वे ‘अध्ययन’ के लिए जा रहे हैं, लेकिन सच्चाई तो ये है कि सौरभ ने अपनी आगे की ‘पटकथा’ उसी दिन लिख दी थी जिस दिन आमिर खान लल्लन टॉप के दफ्तर में आए थे और सौरभ उनकी टीम के साथ भविष्य की रणनीति बना रहे थे।


