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यूपी में महिलाओं की पूर्णतः शराबबंदी की मांग योगी सरकार के लिये बडी चुनौती

उत्तर प्रदेश में नयी सरकार बनने के बाद से जिस तरफ देखो उस तरफ शराब की बंदी के लिए आवाज उठाई जा रही है। यह आवाज महिलाएं उठा रही हैं। उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में शराबबंदी के पक्ष में आवाज बुलंद की जा रही है और लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने अपना कार्यकाल संभालते ही निर्णय लिए हैं, चाहें अवैध भूचड़खानों और बिना लाइसेंस के मीट की बिक्री करने वालों पर कार्यवाही हो, चाहें एंटी रोमियो दस्ता द्वारा मनचलों और छेड़खानी करने वालों पर कार्यवाही हो या कानून व्यवस्था से जुड़े हुए अन्य फैंसले, इन सबकी समीक्षा खुद उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में नयी सरकार बनने के बाद से जिस तरफ देखो उस तरफ शराब की बंदी के लिए आवाज उठाई जा रही है। यह आवाज महिलाएं उठा रही हैं। उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में शराबबंदी के पक्ष में आवाज बुलंद की जा रही है और लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने अपना कार्यकाल संभालते ही निर्णय लिए हैं, चाहें अवैध भूचड़खानों और बिना लाइसेंस के मीट की बिक्री करने वालों पर कार्यवाही हो, चाहें एंटी रोमियो दस्ता द्वारा मनचलों और छेड़खानी करने वालों पर कार्यवाही हो या कानून व्यवस्था से जुड़े हुए अन्य फैंसले, इन सबकी समीक्षा खुद उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।

इन सब चीजों से उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। जिस तरह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आमजन की भलाई के लिए रोज नए-नए कदम उठा रहे हैं, इन सब चीजों से आम लोगों की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली नयी सरकार से काफी उम्मीदें बढ़ गई हैं। इसी कड़ी में यूपी में अब शराबबंदी की भी मांग जोर पकड़ रही है। सबसे बड़ी बात इस आंदोलन का नेतृत्व खुद महिलाएं कर रही हैं, और शराब बिक्री के विरोध में लगातार प्रदर्शन किये जा रहे हैं। शराबबंदी की मांग की बात की जाए तो यह मांग उत्तर प्रदेश के हर जिले से उठ रही है। 

उच्चतम न्यायलय ने 15 दिसंबर 2016 को स्टेट और नेशनल हाइवे के किनारे की शराब की दुकानों को 01 अप्रैल 2017 तक बंद करने आदेश दिया था। इसके साथ ही हाइवे के किनारे के होटलों में भी शराब बिक्री पर रोक लगाई थी। उच्चतम न्यायलय ने अपने आदेश में कहा था कि नेशनल-स्टेट हाइवे के किनारे शराब की दुकानें नहीं होनी चाहिए। उच्चतम न्यायलय ने शराब की दुकानों को हाइवे से 500 मीटर दूर करने का आदेश दिया था। कोर्ट के आदेश में सरकारों से नया लाइसेंस जारी नहीं करने और न ही पुराने लाइसेंस को रिन्यू करने का फरमान सुनाया था। उच्चतम न्यायलय ने लंबी दूरी तय करने वाले वाहनों चाहे वो बस हो या ट्रक उसके ड्राइवरों के शराब पीकर गाड़ी चलाने के चलते होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के मद्देनजर यह आदेश सुनाया था।

उच्चतम न्यायलय के इस आदेश के बाद शराब की दुकानें राजमार्गों से उठकर आबादी वाले इलाकों में स्थानांतरित हो रही हैं, कहा जाए तो कुछ दुकानें स्कूलों और मंदिरों के पास भी स्थानांतरित कर दी गयीं। इन सब बातों से महिलाओं को शराब बंदी के लिए आगे आना पड़ रहा है। अगर सरकारी नियमों की बात की जाए तो नियमों के मुताबिक किसी स्कूल, कॉलेज, अस्पताल या धार्मिक स्थल से 100 मीटर के दायरे में शराब की दुकान खोलने पर प्रतिबन्ध है। लेकिन शराब विक्रेताओं द्वारा लगातार इन नियमों की अनदेखी की जा रही है। उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार के समय इस मामले में शराब विक्रेताओं को शासन और प्रशासन का संरक्षण प्राप्त था।

शराब बंदी के पक्ष में विरोध कर रही महिलाओं को उत्तर प्रदेश की नई योगी सरकार से उम्मीद है कि वो इनकी बात सुनेगी और इस मामले में कोई ठोस निर्णय लेगी। क्योंकि शराब से सबसे ज्यादा परेशानी जिनको उठानी पड़ी है वो महिलाएं हैं। आबादी वाले क्षेत्र में खुली हुई शराब की दुकानों से महिलाओं और लड़कियों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जब भी महिलाएं किसी काम के लिए इन शराब की दुकानों के आगे से गुजरती हैं, तो शराब पीने वाले मनचले उन पर अश्लील फब्तियां कसते हैं और छेड़खानी जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं। स्कूल और कॉलेज के पास खुली हुई शराब की दुकानों से लड़कियों को स्कूल या कॉलेज जाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

स्कूल और कॉलेज के लिए आने जाने में लड़कियों को उन्ही ओछी अश्लील फब्तियों और छेड़खानी जैसी समस्यायों का सामना करना पड़ता है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में स्कूल और कॉलेज के पास खुली शराब की दुकानों की वजह से माँ-बाप अपनी बेटियों का स्कूल और कॉलेज तक में जाना बंद करा देते हैं। एक नजरिए से देखा जाए तो माँ-बाप का यह कदम सही भी है, कोई भी माँ-बाप अपनी बेटियों के साथ छेड़खानी और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं चाहता है। इसलिए अब उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को शराब की दुकानों और शराबियों की वजह से महिलाओं व स्कूल और कॉलेज में जाने वाली लड़कियों के लिए बढ़ रही असुरक्षा की भावना को मद्देनजर रखते हुए कोई निर्णय लेना चाहिए।

अगर बात की जाए घरेलू हिंसा की तो, सबसे ज्यादा घरेलू हिंसा का कारण शराब बनती है। इस घरेलू हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं होती हैं। शराबी पति द्वारा पत्नी के साथ मारपीट आम बात हो गयी है। इसका सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। इसलिए शराब बंदी के पक्ष में महिलाओं का आगे आना शराब की वजह से रोज की मारपीट और घरेलू हिंसा होना भी एक बहुत बड़ा कारण है। देश में अब तक घटित हुई बलात्कार की घटनाओं में ज्यादातर आरोपियों द्वारा शराब के नशे में बलात्कार किया गया। अगर उत्तर प्रदेश सहित देश में शराब बंदी होती है तो बड़े पैमाने पर बलात्कार जैसी घटनाओं में भी भारी कमी आएगी। क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि शराब के नशे में व्यक्ति अपनी सुधबुध खो देता है। इसलिए शराब पर पूर्णतः प्रतिबन्ध जरूरी हो गया है।

बेशक गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में शराब पर पूर्णतः पाबंदी लगाई गयी हो, और वहां कि सरकारों को इसमें कामयाबी भी मिली है। गुजरात में तो शराब पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री रहते ही पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा दिया था, और तभी आज गुजरात को शराब बंदी के मामले में मॉडल राज्य के रूप में देखा जाता है। पिछले साल से बिहार में भी शराब पर पाबंदी लगाई गयी। जिसमे बिहार की नीतीश सरकार को कामयाबी भी मिली और चारों ओर नीतीश कुमार के शराब बंदी के कदम की सराहना की गयी। अगर उत्तर प्रदेश में शराब बंदी की बात की जाए तो यहां पर शराब पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगाना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं होगा,  क्योंकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शराब की बिक्री से मिलता है।

उत्तर प्रदेश के सरकारी खजाने को कुल राजस्व का 20 प्रतिशत से ज्यादा शराब की बिक्री से प्राप्त होता है। इसलिए उत्तर प्रदेश राज्य में शराब पर पूर्णतः पाबंदी लगाने के लिए एक बहुत बड़ी इच्छाशक्ति चाहिए। गुजरात और बिहार दोनों राज्य  शराबबंदी के मामले में मॉडल राज्य हैं, उन्होंने साबित कर दिखाया है कि पूर्ण शराबबंदी से भी सरकार चलाई जा सकती है। पूरे उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार से शराबबंदी के पक्ष में आवाज उठाई जा रही है, इससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सन्देश जा रहा है। अगर योगी आदित्यनाथ आने वाले समय में शराबबंदी के लिए अपनी दृढ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हैं तो योगी आदित्यनाथ जैसे सशक्त व्यक्ति के लिए शराबबंदी से होने वाले राजस्व के घाटे से पार पाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। लेकिन शराबबंदी की उत्तर प्रदेश में पूर्ण रूप से बंदी के लिए अभी तक उत्तर प्रदेश कि नवनिर्वाचित योगी सरकार द्वारा कोई भी सकारात्मक रूख नहीं अपनाया गया है और न ही भाजपा द्वारा पूर्णतः शराबबंदी को अपने चुनावी संकल्प पत्र में शामिल किया गया था।

पूरे उत्तर प्रदेश में लगातार शराब पर पूर्ण रूप से पाबंदी के लिए प्रदर्शन किये जा रहे हैं। जिसमे महिलाओं, बुजुर्गों ओर बच्चों कि अधिकतर भागीदारी देखी जा रही है। लेकिन जिस प्रकार से आगरा में पुलिस के सामने शराबबंदी के पक्ष में शराब के ठेके पर प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को शराब के ठेकेदारों ओर कर्मचारियों ने दौड़ा-दौड़ा और बाल घसीटकर पीटा, इससे साबित होता है कि शराब के ठेकेदारों को आज भी पुलिस प्रशासन ओर शासन का संरक्षण प्राप्त है। महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने वाले लोगों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।  लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने सख्त कार्यवाही करने कि जगह कहा है कि महिलाएं शराब की दुकानों पर तोड़फोड़ कर कानून हाथ में ना लें, साथ ही ऐसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। इस मामले में सरकार को महिलाओं कि स्थिति को समझना चाहिए। ऐसा क्या कारण रहा कि महिलाओं को शराब पर पूर्ण पाबंदी के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में सड़कों पर उतारना पड़ा, इस पर भी योगी सरकार को गौर करना चाहिए।    

कुछ लोग शराब पर पाबंदी लगाने से इसलिए विरोध कर रहे हैं कि इससे लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा ओर शराब बंदी को गैर कानूनी व रोजगार की आजादी के अधिकार के खिलाफ बता रहे हैं। इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने जीवन के अधिकार और रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन बनाने की बात करते हुए अपने आदेश की व्याख्या करते हुए कहा है कि शराब का कारोबार करना मौलिक अधिकार नहीं है। रोजगार की आजादी का अधिकार शराब के कारोबार पर लागू नहीं होता क्योंकि शराब का कारोबार संवैधानिक सिद्धांत में व्यापार की श्रेणी से बाहर है। इसके अलावा रोजगार का अधिकार जीवन के अधिकार के बाद आता है।

कोर्ट ने अपनी व्याख्या में कहा है कि एक तरफ लोगों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की रक्षा करना और सड़क का उपयोग करने वालों को शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों से बचाने की जरूरत है तो दूसरी ओर शराब कारोबार के व्यापारिक हितों की। कोर्ट ने कहा कि दूसरा हित पहले के बाद आयेगा। यानि पहले जीवन का अधिकार आता है और उसके बाद रोजगार का अधिकार आयेगा। कोर्ट ने कहा कि हाईवे के 500 मीटर दूरी तक शराब की दुकानों पर रोक का आदेश देकर न तो कोर्ट ने किसी नियम का उल्लंघन किया है और न ही कानून बनाने की कोशिश की है।

कोर्ट ने लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये आदेश दिया है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी मामले में जीवन के अधिकार और रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार की जो व्याख्या की है वो एकदम उचित है, क्योंकि शराब व्यक्ति के स्वास्थ्य को हानि पहुंचती है ओर कई दुर्घटनाओं का कारण भी बनती है। शराबबंदी के मामले में रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार की बात करने वाले लोगों को सुप्रीम कोर्ट की इस व्याख्या को ढंग से पढ़ना चाहिए जिससे उन्हें जीवन के अधिकार ओर रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार में अंतर समझ में आ जाएगा। कभी भी रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकार को जीवन के अधिकार से बड़ा नहीं माना जा सकता।  

शराब पर पूर्णतः पाबंदी के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सोचना चाहिए। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अवैध ओर बिना लाइसेंस के चल रहे शराब के ठेकों पर कार्यवाही के आदेश दिए हैं। लेकिन इतने भर से उत्तर प्रदेश की महिलाओं का गुस्सा ओर उग्र प्रदर्शन शांत नहीं होने वाला है। अगर शराब पर पूर्णतः पाबंदी लगाई जाती है तो इससे हत्या, बलात्कार, छेड़खानी, अपहरण और दंगे जैसी आपराधिक घटनाओं में भारी कमी आएगी। अगर प्रदेश में पूर्णतः शराबबंदी होती है तो इससे लोगों द्वारा शराब में खर्च हो रहा पैसा लोगों के पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होगा। वैसे भी पोषण, शिक्षा ओर स्वास्थ्य के मामले में उत्तर प्रदेश काफी पिछड़ा हुआ राज्य है।

शराबबंदी से कुपोषण, अशिक्षा, बीमारियों ओर अपराध पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। शराब पीना भी कई बुरी आदतों में से एक है। शराब स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है। अगर इस पर पूर्णतः पाबंदी होगी तो इससे लोगों का जीवन स्तर उंचा उठेगा और सामाजिक परिवर्तन लाने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक सात्विक ओर खुले विचार वाले व्यक्ति हैं वे पूरे उत्तर प्रदेश में शराबबंदी को लेकर हो रहे प्रदर्शनों को देख रहे हैं। आशा है कि इस दिशा में योगी आदित्यनाथ आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में एक बड़ा कदम उठाएंगे। क्योंकि 2 साल बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, और उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है। यहीं से लोकसभा में सबसे ज्यादा 73 सांसद भाजपा के हैं और उत्तर प्रदेश में शराब न पीने वाले लोग ओर महिलाओं कि संख्या बहुतायत में है। अगर योगी सरकार शराबबंदी जैसे महत्वपूर्ण मसले पर अपना ढीलापन दिखाती है तो इससे 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। इसलिए उत्तर प्रदेश की सरकार जो भी करेगी वो भविष्य को ध्यान में रखकर ही करेगी।

लेखक ब्रह्मानंद राजपूत से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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