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आयोजन

श्रीकांत वर्मा स्मृति कार्यक्रम से दुखी लौटे मुकेश कुमार ने एफबी पर पीड़ा जाहिर की तो आयोजक अभिषेक वर्मा और वक्ता ओम थानवी जी ने जवाब में क्या लिखा, पढ़ें

Tribute poster for Sw. Shrikant Verma Ji's 40th death anniversary, featuring a portrait, floral border, and Hindi event details

मुकेश कुमार-

बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल….

श्रीकांत वर्मा जहाँ कहीं होंगे विलाप कर रहे होंगे…

उनके पुत्र शिवसेना के नेता बनकर अपने पिता के निधन के चालीसवें वर्ष पर इतराते फिर रहे थे।

क्या वे श्रीकांत वर्मा के वारिस हैं…..क्या वे यही विरासत उनके लिए सौंपकर गए हैं…

हम भी गए थे कार्यक्रम में। सोचा था अशोक वाजपेयी, ओम थानवी जी को सुनेंगे। मगर कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही निकल आए।

मैं और पापोरी दोनों इसलिए निकल आए क्योंकि मंच से सावरकर का ज़िक्र किया जा रहा था और हाल शिवसैनिकों से खचाखच भरा हुआ था।

थानवीजी माफ़ करेंगे। ऐसी आवाजाही मुझे नहीं जमती।

शिवसैनकों को श्रीकांत वर्मा से क्या मतलब…यहाँ तक कि उनके पुत्र की मंशा भी उन्हें भुनाने की थी। वे अपने दिवंगत पिता का राजनीतिक दोहन कर रहे थे।

श्रीकांत वर्मा जी हमें माफ़ करना। हम कृतघ्न हिंदीभाषी आपको इस घृणित राजनीति से नहीं बचा पाए।


वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार जी की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर कार्यक्रम के आयोजक डॉ अभिषेक वर्मा और कार्यक्रम के वक्ता ओम थानवी जी की प्रतिक्रियाएं पढ़ें-

डॉ अभिषेक वर्मा- मुकेश जी, आज का आयोजन विश्व हिंदी परिषद ने किया था और श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट ने सिर्फ़ लेखकों को आमंत्रित किया था।

आमंत्रण सार्वजनिक था – सोशल मीडिया पर डाला था १० दिन पहले – और हॉल के अंदर आने जाने पर कोई रोक टॉक नहीं थी – कोई भी आ सकता था, और आए दूर दूर से लोग।

कुछ लोग श्रीकांत जी के लिए आये थे और कुछ नंबर बढ़ाने के लिए आये थे। मैं क्या करूँ और किसको कैसे रोकूँ ?

मैंने तो ट्रस्ट की योजनाओं के बारे में अवगत कराया और श्रीकांत जी के न्यूयॉर्क में निधन के बारे में बोला – ना तो कोई राजनीतिक वक्तव्य दिया ना ही कोई मेरी मंशा थी।

आप क्या यह चाहते हैं कि में अपने पिता के इवेंट्स में भी शरीक नहीं होऊँ ?

अपनी जानकारी के लिए बता दूँ कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के द्वारा थोपे गए सन 2012 के सारे केस में बरी हो चुका हूँ, और एक भी “दलाली” का आरोप नहीं हैं।

मेरी कंपनियों में हाई टेक्नोलॉजी इक्विपमेंट मैन्युफैक्चर किया जाता है हिंदुस्तान में – ना की कोई दलाली होती है जब यह समान बिकता है – क्या अब मैनुफैक्चरिंग भी बंद कर दूँ मैं और हज़ारों कर्मचारियों को भुका छोड़ दूँ- और ख़ुद संन्यास ले लूँ हिमालय में ?

वैचारिक और राजनैतिक मतभेद हों तो कोई बात नहीं – यह तो उदार भाव से मैं ग्रहण करता हूँ – लेकिन personal आक्षेप मुझ पर लगाना आपके द्वारा शोभा नहीं देता आपको।

श्रीकांत जी ने अपने एक लेख में सावरकर जी के बारे में 1985 मे लिखा था और वह अरविंद त्रिपाठी जी द्वारा संकलित – आठ खंडों की श्रीकान्त वर्मा रचनावली में यह लेख और डायरी का अंश 1997 में छपा था – और वही बात आज बिपिन कुमार जी (विश्व हिंदी परिषद) ने बोली थी मंच से की श्रीकांत जी कांग्रेस और लेफ्ट की विचारधारा रखते हुए भी – सावरकर की अपने लेख में तारीफ़ करी थी। बिपिन जी ने बोला था श्रीकांत जी की उदार विचारधारा के संदर्भ में।

आज आप ठीक से बिपिन जी का वक्तव्य सुनते तो शायद आपको ऊपर यह सब लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

प्रोग्राम में किसी भी मैं एक शब्द भी राजनीतिक बातें नहीं करीं थी, ना ही मैंने। यह तक मैंने कहा था स्टेज से की आज का आयोजन सांस्कृतिक और समरांजलि है।

खैर गुस्सा मत करिए श्रीकांत जी के आयोजन पर, ना ही किसी लेखक या पत्रकार पर जो हमारे लिए सम्मानित अतिथि और मेरे पिता के मित्र रहे हैं।

कुछ स्पष्टीकरण मुझसे चाहें तो मुझे संपर्क कर लें।

सादर
अभिषेक वर्मा
S/o स्व श्रीकांत वर्मा जी
फ़ोन 011-35550001
email
[email protected]

ओम थानवी- मैं श्रीकांत वर्मा के नाम पर गया, क्योंकि उनकी पत्रकारिता विशिष्ट थी। उनका साहित्य और चिंतन भी। हिंदी में इतनी छुआछूत किस काम की कि श्रीकांत वर्मा के लिए हुए आयोजन में अन्य के विचार देख बिदक जाऊँ? मैं अपनी बात कह कर आया। “अंधभक्ति” के दौर पर टीका भी की। कहने पर कोई रोक-टोक होती तो न जाता। श्रीकांत वर्मा तो कांग्रेस के नेता थे। उनके बेटे या अन्य की राजनीति देखकर जाना न जाना तय हो, यह क्या संघ वाली मानसिकता ही न होगी कि करे कोई भरे कोई? मुझे नहीं मालूम कि सावरकर की बात किस वक्ता ने की? आपने नाम नहीं लिखा। आप चले गए थे, पर मैंने तो सब वक्ताओं को सुना। अशोक वाजपेयी, विनोद भारद्वाज ने संस्मरण सुनाए। रवींद्र त्रिपाठी और अदिति राजपूत ने पत्रकारिता की बात की। संघ-सावरकर की कोई बात नहीं हुई। श्रोताओं में ज़रूर किसी समुदाय या विचार के लोग होंगे। मगर उस पर हमारा क्या बस। दुनिया को हम इतना संकीर्ण बनाएँगे या बनने देंगे तो अपनी बात अपने लोगों में ही कहते रह जाएँगे। अपने भी कितने अपने!

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