खुशदीप सहगल-
शुभांकर मिश्रा चर्चित यूट्यूबर हैं. इनके यूट्यूब चैनल के लाखों में सब्सक्राइबर्स हैं. ज़ाहिर है यूट्यूब समेत सोशल मीडिया हैंडल्स से कमाई भी अच्छी होगी. NDTV ने अपने एक शो (कचहरी) की मेज़बानी के लिए हाल में शुभांकर मिश्रा को सलाहकार संपादक के रूप में अपने साथ जोड़ा. ये नया चलन है न्यूज़ चैनल ने ऐसे यूट्यूबर को साथ जोड़ा है जिसके अपने जुटाए अच्छे खासे सब्सक्राइबर्स हैं.
NDTV में काम करते रहने के साथ शुभांकर को यूट्यूब समेत निजी सोशल मीडिया हैंडल्स चलाने की भी छूट है. यानि किसी मुद्दे पर विवाद होने पर चैनल कह सकता है कि ये अमुक व्यक्ति के निजी विचार हैं…
शुभांकर मिश्रा ने हाल में अपने निजी यूट्यूब चैनल पर एक पॉडकास्ट में पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती से बात की. पुरी शंकराचार्य के हवाले से एक समुदाय विशेष की मुक़द्दस जगह को लेकर विवादित बातें कहीं. एक विवादित तस्वीर का भी इस्तेमाल किया गया. इस पर समुदाय विशेष के सदस्यों ने सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में आपत्ति जताई…
शुभांकर ने इसी की सफ़ाई में अपने एक ट्वीट में कहा है कि कुछ मित्रों के आपत्ति जताने पर उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए यूट्यूब और एक्स से उस हिस्से को हटा दिया गया है…
अब मेरे कुछ सवाल-
इस पॉडकास्ट की पूरी संकल्पना यूट्यूब चैनल के कर्ताधर्ता होने के नाते शुभांकर की ही होगी. फिर ऐसा कुछ विवादित कॉन्टेंट, तस्वीर इस्तेमाल ही क्यों जिसे बाद में हटाने की नौबत आई?…
मैं बताता हूं ऐसा क्यों?- कुछ यूट्यूबर्स की ओर से विवादित सामग्री, तस्वीर, भड़कता थमनेल का इस्तेमाल अधिक से अधिक व्यूज़ बटोरने के लिए किया जाता है. अधिक व्यूज़ मतलब अधिक पैसा. कुछ दिन में लाखों व्यूज़ आने के बाद विवादित हिस्सा डिलीट किया भी तो क्या, अपना उल्लू तो पहले ही सीधा कर लिया. अब ट्वीट में सब कुछ पुरी शंकराचार्य पर ही डाल दिया कि विवादित दावे उन्होंने किए, हमने तो Cross Questions में बस एक तस्वीर ही दिखाई जिस पर आपत्ति हुई तो हटा दी गई…
पॉडकास्ट के लिए गेस्ट ख़ुद होस्ट ही चुनता है, ऐसा गेस्ट आपने चुना जिन्होंने विवादित बयान दिए. ये सब उनके मुंह से निकलवाने के पीछे मंशा किसकी हो सकती है? शो का टाइटल, थमनेल, ग्राफिक्स, तस्वीर ये ख़ुद तो पुरी शंकराचार्य ने नहीं चुनी होगी…
यहां तक कि शो को फील देने के लिए उसी के मुताबिक शुभांकर ने इंटरव्यू में अपना चोला भी धारण किया…
शिवसेना फाउंडर बाल ठाकरे कहा करते थे कि पहले अपना दुश्मन चुनो, समर्थकों की जुटान ख़ुद-ब-ख़ुद पीछे आ जाएगी. यानि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है वो ख़ुद ही समर्थन देने आ जाएगा…
लगता है पिछले एक दशक में कुछ पत्रकारों, कुछ यूट्यूबर्स, कुछ चैनल्स ने अपनी रीच बढ़ाने के लिए बाल ठाकरे के उपरोक्त कथन का ही इस्तेमाल किया- दुश्मन चुनो, सपोर्टर्स ख़ुद पीछे लग जाएंगे. इस तरह की पत्रकारिता को फलने-फूलने के लिए अनुकूल माहौल भी मिला…
लेकिन क्या यही असली पत्रकारिता है. क्या बिना भेदभाव सच दिखाना पत्रकार का ‘राजधर्म’ नहीं. फूट डालने और वैमनस्य बढ़ाने को तो पहले से ही राजनीति काफ़ी है. उसी लकीर पर चलने के पीछे पत्रकारों की कौन सी मजबूरी हो सकती है? पैसे-पद का लालच या नौकरी का दबाव?
एक बात और चैनल में रहते हुए किसी व्यक्ति के लिए वो चैनल कैसे कह सकता है कि ये उसके निजी विचार हैं. हां ये संभव है कि अंदर से चैनल और उस व्यक्ति के विचार समान हो, ऊपर से दिखावे के लिए अलग हो. ये बारीक विभेद है, इसे अधिक दिन तक छुपा कर नहीं रखा जा सकता…



