Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

500 करोड़ देकर ISS पर गए शुभांशु शुक्ला, सरकार और मीडिया ने पूरे देश को उल्लू बनाया?

50 साल पहले दूसरे देश मानवों को चांद पर उतार चुके हैं – एक बार नहीं, दर्जन भर बार। आज अपनी सर्वश्रेष्ठ तकनीकी से इसरो मात्र 4000 किलो वजन (पेलोड क्षमता) चांद की कक्षा तक भेजने में सक्षम है, जबकि आज से 50 साल पहले नासा इसका 6 गुना वजन चांद नहीं, बल्कि मंगल ग्रह तक पहुंचाने में सक्षम था…

विजय सिंह ठकुराय-

पिछले महीने इंडियन एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला एक्जियम मिशन के तहत ISS पर गए थे, आज 18 दिन बाद सकुशल लौट आये। गौरतलब है कि शुक्ला जी एक प्राइवेट कंपनी के मिशन का हिस्सा थे, जिसकी टिकट 500 करोड़ रुपये में खरीद कर शुक्ला जी को स्पेस में भेजा गया था। चलिए, खरीदा तो खरीदा, भारत में पैसे की कमी थोड़े ही न है।

शुक्ला जी ने अपनी स्पेसफ्लाइट के दौरान मसल डेंसिटी, बीजों के अंकुरण, सूक्ष्मजीवों के व्यवहार इत्यादि से संबंधित कुछ 7 प्रयोग भी किये। खास बात यह है कि इन सभी प्रयोगों के निष्कर्ष जानने के लिए स्पेस में जाने की कोई खास जरूरत नहीं थी। ISS पर पहले ही 3000 से ज्यादा प्रयोग किये जा चुके हैं, जिनमें शुक्ला जी के 7 मिशन भी दर्जनों बार दोहराए जा चुके हैं। सब जानकारी पब्लिक डोमेन में मौजूद है।

जैसा प्रचारित किया जा रहा है, शुक्ला जी इस मिशन के पायलट भी नहीं थे। वास्तव में स्पेस-एक्स का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट पूरी तरह ऑटोमेटेड है, जिसे यान में फिट AI और जमीन पर मौजूद टीम मिल कर उड़ाती है, इस यान में पायलट नाम की चीज की जरूरत ही नहीं होती। वास्तव में यह कंफ्यूजन शुक्ला जी के बैकग्राउंड में पायलट होने से उत्पन्न हुआ है। वैसे भी, स्पेसफ्लाइट में पायलट होने का मतलब “कमांडर का असिस्टेंट” होना होता है, स्पेसशिप उड़ाने वाला नहीं। यानी शुक्ला जी को इस मिशन से स्पेसशिप उड़ाने का भी कोई अनुभव नहीं मिला है।

बहरहाल, इन बातों का अर्थ शुक्ला जी के उद्यम को अंडर-वैल्यू करना नहीं। वे स्पेस में गए तो कुछ न कुछ, बल्कि बहुत कुछ सीखे ही होंगे। आगे भारत के काम भी आएगा। पर जब स्वभाव से विज्ञान-द्वेषी धर्मभीरू जनता विज्ञान से ही गर्वपिपासा शांत करने के साधन ढूंढती हो तो हम वास्तव में कहां खड़े हैं – क्या खोया क्या पाया – इसकी एक विनम्र समीक्षा का नैतिक साहस अनिवार्य हो जाता है।

आज से पहले दुनिया के तमाम देश सैकड़ों स्पेसमिशन स्पेस में पहले ही भेज चुके हैं। दूसरे देशों के 50 साल पहले बनाये यान सौरमंडल की सीमाओं को तोड़ इंटरस्टेलर स्पेस में पहुंच चुके हैं। 50 साल पहले दूसरे देश मानवों को चांद पर उतार चुके हैं – एक बार नहीं, दर्जन भर बार। आज अपनी सर्वश्रेष्ठ तकनीकी से इसरो मात्र 4000 किलो वजन (पेलोड क्षमता) चांद की कक्षा तक भेजने में सक्षम है, जबकि आज से 50 साल पहले नासा इसका 6 गुना वजन चांद नहीं, बल्कि मंगल ग्रह तक पहुंचाने में सक्षम था।

स्पेस-टेक्नोलॉजी में जब हम दुनिया से 50 साल पीछे चल रहे हैं, तब एक भारतीय सरकारी खर्चे पर प्राइवेट मिशन के तहत ISS पर हो कर आने वाला 634वां व्यक्ति बन जाता है और भारतीय मीडिया “बन गए विश्वगुरु” “बज गया डंका” “उड़ा दिया गर्दा” “लहरा दिया परचम – दुनिया ने देखा दम” “अंतरिक्ष का नया बॉस भारत” टाइप के नारे लगा रही हो तो दुनिया इसे देख हमारे बारे में क्या राय बनाती होगी?

विज्ञान के मूल तत्व “विनम्रता” से कोसों दूर। विज्ञान से ज्यादा कलावा, तिलक, साड़ी और सिंदूर से आह्लादित होने वाले धर्म ग्रंथों में पूरी सृष्टि के विज्ञान का दावा और फंडामेंटल साइंस में आज तक एक सिंगल मौलिक अवधारणा के सूत्रधार नहीं। विज्ञान प्रगति के नाम पर विदेशी तकनीकों को हासिल कर उनका सस्ता संस्करण बनाने में अव्वल। एक छोटी-मोटी उपलब्धि हासिल होते ही दुनिया में डंका बजाने का बिगुल बजाने वाले।

क्या कहते होंगे विदेशी हमें देख कर? डींग मारने में विश्वगुरु?

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन