महेश रस्तोगी-
पत्रकारों के लिए अगर सरकार थोड़ा ही बहुत कुछ सोच ले तो शायद ये दिन देखना न पड़े। आज भारत देश तो आजाद है। लेकिन देश के चौथे स्तंभ को दबाने का पूरा प्रयास किया जा है। जो हालात को देखकर दब जाते हैं, वो बच जाते हैं। और जो शेर की भाँति दहाड़ मारते हैं, उनको अमर रहने की सहानुभूति दे दी जाती है। समय बड़ा बलवान होता है। वक्त आने पर ये भी समय बदलेगा।
जीशान कादिर-
जिसकी कलम के हर कोई कसीदे (प्रशंसा) पढ़ा करता था। क्या मालूम था कि वही कलम उसी के लिए जहर बन जाएगी।
आखिरकार सिंडिकेट ने इसमें भी अपनी बखूबी भूमिका निभाई। निश्चित तौर पर कारिंदे तो पकड़े जाएंगे लेकिन वह जो चंद सालों में अकूत संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं, उनका क्या होगा। क्या उनको कुछ होगा… शायद नहीं। क्योंकि वो तो बहुत दूर से बैठकर जहर ही तो बोते चले आए हैं। शायद उनको पकड़ पाना अब मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा, क्योंकि वो तो कई चेहरों के पीछे सियार की खाल में ढके छुपे जो हैं।

राघव तुम अमर हो और रहोगे, तुम्हारी शहादत बेकार नहीं जाएगी। ईश्वर है, उसका दिया इंसाफ अटल है…
शिव शंकर पांडेय-
पत्रकार राघवेंद्र को कायरों ने गोली मारकर मौत की नींद सुला दी। एक और साहसी पत्रकार कर्तव्य की वेदी पर भेंट चढ़ गया। अपराधियों के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम बीच में ही नहीं छोड़ दी जाएगी।
मामला स्टांप ड्यूटी शुल्क चोरी का हो या सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार करने वाले संगठित गिरोहों के बदमाशों और उनके गुर्गों का। इन सबसे कायदे से निपटा जाएगा। साहसी पत्रकार साथी राघवेंद्र का बलिदान निर्णायक साबित होने जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, पत्रकारों को कब तक दुधारी तलवार के बीच कार्य करना पड़ेगा? पत्रकार सुरक्षा कानून यूपी में कब लागू होगा? पत्रकार साथी राघवेंद्र के हत्यारों को सबक कब सिखाया जाएगा? मुख्यमंत्री जी, कुछ करिए। पत्रकार के हत्यारों को कड़ा दंड दिलाइए।

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