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‘सितारे ज़मीन पर’: ये फिल्म बुद्धिमान दर्शकों के लिए नहीं है!

ओम थानवी-

रात ‘सितारे ज़मीन पर’ देखी। बच्चों और उनके बच्चों के साथ। हॉलीवुड हो, चाहे बॉलीवुड या लॉलीवुड, विशुद्ध रूप से बाज़ार के लिए बनने वाली फ़िल्मों में, अन्य डिस्क्लेमरों के साथ, यह भी लिख देना चाहिए — “बुद्धिमान दर्शकों के लिए नहीं”।

सुबह दोनों पौत्र (8/6) फ़िल्म पर लम्बी चर्चा करके गए हैं। मुख्यतः बड़े के सवालों के जवाब में यही कहता रहा कि फ़िल्म बनाने वाले जानते हैं क्या दिखाने पर आप हँसेंगे, रोएँगे, भावुक होंगे और अपने दिमाग़ पर बोझ नहीं डालेंगे।

बच्चों के सवाल: ओवरलोड लिफ़्ट चली कैसे; कोच सुनील को समझाता क्यों नहीं कि पंखे ऐसे नहीं गिरते; सुनील का हैलमेट हर बार नए रंग में कैसे; टूटी अँगुली सीधी कैसे हुई; दोनों टीमें समान श्रेणी की क्यों नहीं आदि।

इनमें मेरे सवाल भी अगर जोड़ लें: कहानी निपट दिल्ली-मुंबई की है, यह महानगरीय आग्रह क्यों; हिंदी फ़िल्म का नायक सदा उच्च वर्ग (उसका घर, रहन-सहन देखिए!) से क्यों; नायक अरोड़ा, खलनायक पासवान क्यों; किरदारों में हिंदू, सिख, पारसी प्रमुखता से हैं, दोनों मुसलिम किरदार विकलांग क्यों; जज की मेज़ पर जातिसूचक (मंडल) तख़्ती क्यों?

फ़िल्म स्पानी फ़िल्म “कंपेओनिस” पर आधारित है। उस पर अँगरेज़ी में “चैम्पियंज़” बनी। हिंदी में ऐसी प्रेरणा-प्राप्त फ़िल्मों (और गानों) का लंबा इतिहास है।

इतना ही है कि हिंदी फ़िल्म में गाने-बजाने, लड़ाई-झगड़े, दारू-पुलिस, पति-पत्नी तनाव और (अब) माँ के बावर्ची के साथ दिल लगाने के फ़ार्मूलों के साथ आप “विकलांगता में सकारात्मकता” का संदेश देंगे तो फ़िल्म ब्लॉकबस्टर भले न हो, लोग देख तो आएँगे ही।

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