मनीष दुबे-
अभिनेत्री से सांसद बनकर पूर्व हुईं स्मृति ईरानी आज सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रही हैं। बताया जा रहा है कि उनका सीरियल “क्योंकि सास भी कभी बहू थी” छोटे पर्दे पर एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस के केएल शर्मा से करारी हार के बाद स्मृति ईरानी ने वापस टीवी पर अपना कैरियर शुरू किया। कुछ वरिष्ठ पत्रकार भी पूर्व सांसद और अभिनेत्री ईरानी को खरी खोटी सुनाकर नई पारी की शुभकामनाएं दे रहे हैं…
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न्यूज24 के लीगल रिपोर्टर व वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर कुमार मिश्रा लिखते हैं-
मुझे तो एक बार इस ख़बर पर भरोसा ही नहीं हुआ! स्मृति ईरानी ‘तुलसी’ की किरदार में वापस लौट रही हैं! ये शो तो सुपरहिट है। शुभकामनाएं।

पूर्व वरिष्ठ टीवी पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम ने विनोद कापड़ी का ट्वीट रिपोस्ट कर एक्स पर लिखा है-
वैसे स्मृति ईरानी पिछले एक दशक की सबसे बदतमीज और बददिमाग़ बीजेपी लीडर्स में से एक रही हैं. संसद से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक, हर जगह स्मृति ने अपनी बदगुमानी की छाप छोड़ी है. संसद में उनके चीखने – चिल्लाने के वीडियो मौजूद हैं.
अमेठी की जीत का ऐसा नशा उनके माथे पर सवार हुआ कि हारने से पहले तक उनके पांव जमीन पर कभी पड़े ही नहीं. अमेठी के लोकल रिपोर्टर से पूछिए कि उनसे कैसे खौफ खाते थे सब. उनके स्वभाव की वजह से उनके खिलाफ जनता में आक्रोश था लेकिन कोई लोकल रिपोर्टर लिखने की हिम्मत नहीं करता था.
अमेठी में उनके हवाई वादों पर कोई खबर नहीं छाप सकता था. सीधे संपादक को फोन कर देती थीं. एक रिपोर्टर ने एक सवाल पूछ दिया तो उसे उसी दिन निकलवा दिया. (ये तो कैमरे पर दर्ज है). बीजेपी कार्यकर्ता तक उनके अहंकार की वजह से उनसे दूर हुए.
इंटरव्यू के दौरान अगर किसी ने उनसे कोई सवाल पूछ लिया तो उस पर भड़क गईं. उन्हें लगता था कि अब वो जहां पहुंच गईं हैं, वहां से उन्हें सिर्फ ऊपर जाना है लेकिन लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है. ऐसे अभिमानी को सबक सिखा देती है.
बाकी उनको नयी पारी की शुभकामनाएं .
इस कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार से अवॉर्ड विनिंग फिल्मकार बने विनोद कापड़ी लिख रहे हैं-
इस देश में किसी भी बात पर ट्रोल करने का एक अजीब सा नकारात्मक चलन शुरू हो गया है।
स्मृति ईरानी की राजनीति से आपको दिक़्क़त हो सकती है। कई मौकों पर मुझे भी रही। लेकिन लोकसभा चुनावों में हार के बाद टेलीविजन में उनकी वापसी पर उन्हें जिस तरह उन्हें ट्रोल किया जा रहा है, वो सही नहीं हैं। राजनीति में आने से पहले जब वो टीवी कर रहीं थीं तो एक सुपरहिट शो की मुख्य अदाकारा थीं। टीवी छोड़ कर जब राजनीति में आईं तो राहुल गांधी जैसे नेता को हराया। केंद्रीय मंत्री बनीं। ये कम उपलब्धि है क्या?
चुनाव हारने के बाद अब अगर बीजेपी उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहती तो ये उनके और बीजेपी के बीच का मामला है और ऐसे में अब वो फिर से टीवी करना चाहती हैं तो ये उनका निजी फ़ैसला है।
हर किसी के, हर फ़ैसले पर, हर कदम पर मीनमेख निकाल कर अमर्यादित टिप्पणी करने, खिल्ली उड़ाने का ये चलन पता नहीं कब और कैसे रुकेगा? हालाँकि इसकी शुरुआत स्मृति की पार्टी ने ही की थी। इसमें उनका अपना योगदान भी कम नहीं था।
अब जबकि वो दूसरी पारी शुरू कर रहीं हैं तो ये उनके लिए भी एक अवसर है – आत्मचिंतन करने का। “क्योंकि सास भी कभी बहू थी” के लिए शुभकामनाएँ smriti irani



