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उत्तर प्रदेश

यादवों-मुस्लिमों के जमीन कब्जा प्रकरण में संयुक्त निदेशक का निलंबन कई सवाल छोड़ गया है!

ज्ञानेंद्र शुक्ला-

राजकाज की सबसे दिलकश बात होती है खुद को बचाकर मातहत की गर्दन तराश देना!!

पंचायती राज महकमे में कल तूफ़ान मच गया जब जाति-मज़हब विशेष से जुड़ा आदेश वायरल हुआ, मामला सत्ताशीर्ष के संज्ञान में आ गया, सीएम के कड़े तेवर देख आनन-फ़ानन में संयुक्त निदेशक एस एन सिंह निलंबित कर दिए गए, पर सवाल तो अब भी मौजूद हैं-

  1. क्या किसी निदेशालय में संयुक्त निदेशक खुद से ही वृहत्तर प्रभाव वाला नीतिगत आदेश जारी कर सकते हैं?
  2. संयुक्त निदेशक सरीखे ज़िम्मेदार पद पर तैनात अफसर क्या इतना विवादास्पद आत्मघाती कदम उठाने की हिमाक़त कर सकेगा??
  3. निदेशक से लेकर प्रमुख सचिव की ज़िम्मेदारी क्या पर्यवेक्षण की नहीं थी? थी तो २९ जुलाई का जो आदेश जिले तक पहुंच गया उन्हें भनक क्यों नहीं लगी? क्या ये पर्यवेक्षण में शिथिलता नहीं है?
  4. नीतिगत फ़ैसले शासन से प्रमुख सचिव से होते हुए निदेशालय तक पहुंचते हैं, इस मौजूदा मामले से जुड़ी पत्रावली सामने लाई जाए, पता चल जाएगा कि अनुमोदन किसने-किसने किया?
  5. इस गंभीर प्रकरण को सरकार की छवि धूमिल करने की सोची समझी साज़िश क्यों न माना जाए? इसमें बड़ा नेटवर्क शामिल हो सकता है, जिसकी गहनता से उच्चस्तरीय जाँच होनी चाहिए।

मूल खबर…

यादवों और मुस्लिमों द्वारा कब्जा की गई जमीनें मुक्त कराने का आदेश! देखें लेटर

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