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सोशल मीडिया वाली बीमारी का प्रसार न्यूज डेस्क तक हो चुका है!

रंगनाथ सिंह-

मनमाने तरीके से किसी के नाम से उसकी जाति चिपकाकर उछालने की बीमारी सोशल मीडिया से अब डिजिटल मीडिया तक पहुँच चुकी है। पत्रकारिता का बुनियादी नियम है कि किसी व्यक्ति का नाम वैसे ही लिखना चाहिए जैसे वह खुद लिखता है।

हम लोगों को बचपन में माँ-बाप ने सिखाया था कि किसी का नाम नहीं बिगाड़ना चाहिए। मगर कुंदरकी से चुनाव जीतने वाले रामवीर सिंह के नाम के आगे जिस तरह उनकी जाति चिपकायी गयी है उससे जाहिर है कि सोशलमीडिया वाली बीमारी का प्रसार न्यूजडेस्क तक हो चुका है। ऐसा भी नहीं है कि वह पहले व्यक्ति हैं जिसके साथ ऐसा किया जा रहा है मगर अब साफ हो गया है कि रोका-टोका न गया तो यह बीमारी और बढ़ेगी।

जाति उछालने के पीछे एक सामान्य प्रवृत्ति ये है कि दबंग जातियाँ अपनी जाति उछालना चाहती हैं। दुर्भाग्य ये है कि जो जातियाँ सामूहिक प्रयास और संवैधानिक उपचार से सबल बनीं वे भी सबल बनते ही जाति उछालने की पुरानी सामंती प्रवृत्ति की शिकार हो गयीं। स्थिति ये है कि जिस गली में पहले चार दबंग थे अब आठ हो गये हैं। इस प्रक्रिया से सभी सबल हो जाते तो इसे स्वीकार किया जा सकता था मगर इसकी सीमा संख्याबल पर जाकर खत्म हो जाती है।

जिस इलाके में जिस जाति की बहुलता है वह उस इलाके में दूसरों का जीना दूभर कर देगी यानी शोषित और पीड़ित एक इलाकाई परिघटना बनकर रह जाएगी। इसीलिए जातीय उत्थान का समर्थन करने के साथ ही सामंतवादी मिजाज का विरोध करते रहना चाहिए।

जाति एक भौतिक सचाई है। जैसे पैरों में पड़ी चप्पल भौतिक सच्चाई है मगर उसे सिर पर रखकर नहीं चला जा सकता। उसी तरह उम्मीदवार की जाति बतानी हो तो उसे कॉपी में उचित जगह पर बताया जा सकता है। अगर कोई सामुदायिक समीकरण दिखाना हो तो उसे भी कॉपी में दिखाया जा सकता है। मगर “जातिवाद का नंगा नाच” लगने वाली हेडिंग देने से बचना चाहिए। मीडिया संस्थानों को इससे जरूर बचना चाहिए।

जाति या क्लैन दुनिया के हर देश में पाए जाते हैं। परिवार के बाद क्लैन समुदाय निर्माण का दूसरा प्रमुख आधार है। जो समाज जितना कॉस्मोपोलिटन होता है वहाँ क्लैन उतना कमजोर होता है क्योंकि विभिन्न सामाजिक समूहों की परस्पर निर्भरता उन्हें जुड़ने के लिए बाध्य करती है। एक समय यह मान्यता थी कि भारत के गाँव जाति व्यवस्था के रक्षक हैं और शहरीकरण उनका भक्षक बनेगा। आज स्थिति ये है कि गाँवों में मौके-बेमौके ही जातीय गोलबन्दी होती है बाकी समय लोग गाँव या जवार की पहचान को प्राथमिकता देते हैं।

दूसरी तरफ आधुनिक शहरी संस्थानों में साल के 365 दिन चौबीसों घण्टे जातीय लामबन्दी चलती रहती है!

समाचार का बुनियादी नियम है कि वह वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। विचार व्यक्ति सापेक्ष होता है। समाचार व्यक्ति निरपेक्ष होता है। यदि मीडिया सम्पादकों को लगता है कि चुनाव जीतने वालों की जाति उनके नाम के साथ लिखनी चाहिए तो वह इसके लिए एक मानक बना लें और हर उम्मीदवार के साथ जाति लगाकर लिखना शुरू कर दें। तब एक तुक बनेगा कि इनकी यही स्टाइलशीट है। जबतक यह स्टाइलशीट नहीं बन जाती तबतक खबरों की कवरेज में एक मानक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। मनमाने तरीके से जाति उछालने और छिपाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।

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