नई दिल्ली: सिनेमा में रिसर्च की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है यह कहना है कि फिल्मों के प्रतिष्ठित और जाने माने पटकथा-संवाद लेखक अशोक मिश्र का जिन्हे पटकथा लेखन के लिए दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। अशोक मिश्र न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर के सितंबर चैप्टर में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम के ज़रिए वो राजधानी के सिनेप्रेमियों और फिल्मकारों से मुखातिब हुए। अशोक मिश्र द्वारा लिखित फिल्म कटहल (नेटफ्लिक्स) को इस साल बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी का नेशनल अवॉर्ड मिल रहा है।
न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन (NDFF) का ये कार्यक्रम श्री अरविंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी (SACAC), मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्किल्स काउंसिल (MESC) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स (IICS) के सहयोग से संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में फिल्ममेकर, छात्र, कलाकार और सिनेमा प्रेमियों ने भाग लिया और फिल्ममेकिंग की कला और शिल्प पर गहन व रोचक चर्चाएँ कीं।
जून, जुलाई और अगस्त चैप्टर की सफलता के बाद, जिनमें भास्कर हजारिका, सोहिनी दासगुप्ता, डॉ. सबीहा फरहत और प्रवीण जैन जैसे नाम जुड़े थे, TCOTF लगातार एक ऐसा मंच बनता जा रहा है जहाँ सिनेमा और संवाद मिलते हैं और नए विचारों को सहयोगी मिलते हैं।
क्राफ्ट एंड क्रू: सिद्धार्थ सादाशिव और सिनेमा में साउंड
इस कार्यक्रम का पहला महत्वपूर्ण सत्र रहा क्राफ्ट एंड क्रू सेशन, जिसमें साउंड डिज़ाइनर और प्रोडक्शन साउंड मिक्सर सिद्धार्थ सदाशिव ने सिनेमा में साउंड की भूमिका पर केंद्रित मास्टरक्लास दी। सिद्धार्थ ने बताया कि फिल्मों में म्यूज़िक के अलावा जो कुछ भी सुनाई देता है, उसमें साउंड रिकॉर्डिस्ट और साउंड मिक्सर की भूमिका होती है।

कनाडा, चीन और भारत में काम करने के अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाले सिद्धार्थ सदाशिव के हालिया कामों में पुष्पा 2: द रूल, इंडियन 2, लुसिफर 2: एंपुरान, TEST और आबीर गुलाल जैसी बड़ी और लोकप्रिय फिल्में शामिल हैं।
उन्होंने दुनियाभर के प्रसिद्ध साउंड मिक्सरों के साथ काम करने के अनुभव साझा किए, वैश्विक वर्कफ्लो और प्रोडक्शन साउंड व डिज़ाइन की व्यावहारिक बारीकियाँ बताईं, और कई ऑडियो-विजुअल क्लिप्स और प्रेज़ेंटेशन के ज़रिए दिखाया कि फिल्मों के एक-एक दृश्य में साउंड की क्या भूमिका होती है और उस पर किस तरह मेहनत की जाती है। उन्होंने बताया कि किस तरह सही साउंड दर्शकों की भावनाओं और फिल्म के माहौल को गहराई से प्रभावित करता है।
शंघाई वैंकूवर फिल्म स्कूल में फैकल्टी रह चुके और वर्तमान में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स से जुड़े सिद्धार्थ ने युवा फिल्मकारों को साउंड डिज़ाइन से जुड़े कई व्यावहारिक टिप्स भी दिए और अपने ब्लॉग व सोशल मीडिया से इस ज्ञान को लगातार साझा करने की बात कही।
स्पॉटलाइट: अशोक मिश्रा और स्क्रीनराइटिंग
स्पॉटलाइट इस आयोजन का दूसरा महत्वपूर्ण सेगमेंट था, जिसमें मशहूर पटकथा लेखक और दो बार के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अशोक मिश्रा मौजूद रहे। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्र रहे अशोक मिश्र का शानदार करियर फिल्म, टेलीविज़न और थिएटर की दुनियाओं में फैला हुआ है।
मिश्रा को सईद अख्तर मिर्ज़ा की फिल्म नसीम और श्याम बेनेगल की फिल्म समर के पटकथा-संवाद लेखन के लिए (राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। उन्हे श्याम बेनेगल की प्रसिद्ध सीरीज़ भारत एक खोज, और वेलकम टू सज्जनपुर, वेल डन अब्बा जैसी चर्चित फिल्मों के लेखन के लिए भी जाना जाता है। उनकी हालिया नेटफ्लिक्स फिल्म कटहल को अभी हाल ही में 71वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है, जिससे उनके करियर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है।
उन्होंने अपने सत्र में बताया कि किस तरह लेखक पर सिनेमा को संवेदनशीलता, जुनून और मकसद के साथ गढ़ने की ज़िम्मेदारी होती है, और कैसे सामाजिक यथार्थ को मनोरंजक कथाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। उन्होने लेखन में रिसर्च की भूमिका ज़ोर देते हुए अपनी तमाम फिल्मों के लिए किए लेखन और इसके रिसर्च के जीवंत अनुभव साझा किए। न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन के इस आयोजन में उनकी मौजूदगी और भी खास थी क्योंकि वे 23 सितंबर को होने वाले 71वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में भाग लेने दिल्ली आए हुए हैं।
टेक द फ्लोर: द 5-मिनट विंडो
टेक द फ्लोर: द 5-मिनट विंडो नामक इंटरैक्टिव सेगमेंट में दिल्ली के टैलेंट्स अपने क्रिएटिव प्रोजेक्ट पेश करते है। इस बार रूसी से हिंदी भाषा के जाने माने अनुवादक वेद कुमार शर्मा ने फिल्म के लिए लिखी एक कहानी पेश की। ये हिस्सी युवा फिल्ममेकरों, लेखकों और कलाकारों को एक मौका देने का मंच है।
मेक सिनेमा कैंपेन अपडेट
NDFF के संस्थापक आशीष के. सिंह ने मेक सिनेमा अभियान पर अपडेट साझा किए। इस अभियान के तहत “छोटी फिल्में, बड़ी आवाज़ें” टैगलाइन के साथ छह महीनों में छह शॉर्ट फिल्में बनाने का लक्ष्य है। उन्होंने ज़ोर दिया कि यह अभियान नए फिल्ममेकर्स को अवसर देने और यथार्थ व सामाजिक प्रासंगिकता से जुड़ी कहानियों को सामने लाने की दिशा में एक ठोस पहल है, ताकि सिनेमा को एक कला माध्यम के तौर पर और मज़बूती से स्थापित किया जा सके।
समापन टिप्पणी
सितंबर चैप्टर का समापन चिट-चैट ओवर टी एंड लाइट बाइट्स नामक नेटवर्किंग सेशन के साथ हुआ। SACAC की निदेशक सुश्री दलजीत वाधवा ने TCOTF जैसे मंचों को सहयोग देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। तो NDFF के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर (ब्रांडिंग एंड मार्केटिंग) वैभव मैत्रेय ने इस पहल के स्व-निर्भर विज़न पर प्रकाश डाला और NDFF के ट्रेज़रर हरिंदर कुमार ने मेहमानों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया।
टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के बारे में
टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर (TCOTF) NDFF की मासिक इंटरैक्टिव पहल है, जो फिल्ममेकरों, कलाकारों, विद्वानों, नीति विशेषज्ञों और सिनेमा प्रेमियों को एक साथ लाकर विचार साझा करने, प्रोजेक्ट पिच करने और प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच प्रदान करती है। ज्ञानवर्धक सत्रों, टैलेंट शोकेस और सहयोग के अवसरों के इस अनोखे मेल से TCOTF दिल्ली-एनसीआर में सार्थक सिनेमा के लिए एक सशक्त क्रिएटिव इकोसिस्टम बना रहा है।



