
संजय कुमार सिंह
आज के अखबार : पार्ट-2
हिन्दी अखबारों में जनसत्ता में भी तमिलनाडु के करुर की य खबर लीड है और समूह के अंग्रेजी अखबार में भी। दोनों ने 38 मरे बताये हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की तरह हिन्दुस्तान में भी यह खबर लीड है और दोनों जगह 36 लोगों के मरने की खबर है। बेशक, 39 लोगों की मौत की खबर बड़ी है लेकिन दिल्ली के ही कई अखबारों में यह लीड नहीं है तो लीड बनाने वालों के पास उसका कारण होगा और उसपर अटकल लगाई जा सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के अखबार में बरेली के सांप्रदायिक विवाद और लेह जैसे मामले को छोड़कर तमिलनाडु की खबर छपेगी तो पत्रकारीय निष्पक्षता पर उंगली उठेगी और मैं वही कर रहा हूं। यह इसलिये भी जरूरी है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी यह सब करती-करवाती दिख रही है। यह सब दबाब में किया जा रहा हो या विज्ञापनों के लिए – अनुचित है। रेखांकित करने योग्य है। अब इस खबर के राजनीतिक पहलू पर आता हूं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में अप्रैल-मई 2026 तक होने की उम्मीद है। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में एक लोकप्रिय अभिनेता की रैली में हादसे के राजनीतिक उपयोग किये जा सकते हैं और भाजपा की सेवा करने वाले हिन्दी के अखबारों में अगर तमिलनाडु की खबर पहले पन्ने पर हो तो उसके मायने हैं। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ऐसी राजनीति करती है। यह अब स्पष्ट हो चला है और इसका पता उपराष्ट्रपति चुनाव से भी चलता है। आप जानते हैं कि भाजपा ने हाल में 67 साल के सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनवाया है। वे तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले से हैं और तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं। वे कोयंबतूर से दो बार (1998, 1999) संसद चुनाव जीत चुके हैं। बताया जाता है कि 16-17 साल की उम्र से आरएसएस से जुड़े हुए हैं। उन्हें 2014 से लेकर अब तक राज्यसभा में नहीं लाया गया लेकिन अब अचानक राज्यसभा का सभापति बना दिया गया है। भले ही इसमें कुछ अनुचित नहीं हो, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जुड़ता है। इसका संबंध तमिलनाडु चुनाव को लेकर भाजपा की गंभीरता से तो है ही।
आप जानते हैं कि भाजपा के लिए तमिलनाडु हमेशा एक चुनौती रहा है और चुनाव के पहले ऐसे समय में आरएसएस से लंबे समय से जुड़े नेता को इतना महत्वपूर्ण और ऊंचा पद देना निश्चित रूप से तमिलनाडु के लोगों को आमतौर से और उनकी जाति व समाज के लोगों को खासतौर से अच्छा लगेगा। भाजपा इसके बदले वोट मांग सकती है और उपराष्ट्रपति अपनी पार्टी को वोट देने की अपील कर सकते हैं। वैसे तो उपराष्ट्रपति का पद पार्टी की राजनीति से ऊपर होता है लेकिन भाजपा के लिए खुल कर काम करने वाले जगदीप धनखड़ के साथ जो सब हुआ उसके बाद यह पद स्वीकार करने वाले को यह सब बताया नहीं गया हो तो भी इसका अनुमान तो होगा ही। वैसे भी वे पर्याप्त वरिष्ठ हैं। इसके बाद, दिल्ली के हिन्दी मीडिया में अगर अभिनेता विजय और उनकी रैली को महत्व मिला है तो यह उसी क्रम में हो सकता है और हादसा इसके लिए सबसे अच्छा मौका कहा जा सकता है। किसी और कारण से उन्हें पहले पन्ने पर स्थान देना पर्याप्त मुश्किल होता है और आज की तरह जबरन दे भी दिया जाता तो खबर पढ़ी नहीं जाती, बात नहीं बनती। पहले पन्ने पर खबर होने से उत्तर भारत के कई लोग उन्हें जान जाएंगे। अभिनेता से नेता बने दक्षिण भारतीय विजय की ख्वाहिश हो सकती है कि उनके बारे में उत्तर भारत के मीडिया में चर्चा हो और आज मौका मिलते ही उसकी शुरुआत हो गई। कम से कम मुझे उनके बारे में आज ही पता चला। अगर मेरी नजर आज गई है तो मैं समझ सकता हूं कि अभी तक उनके, उनकी पार्टी और राजनीति के बारे में कितने लोग जानते होंगे।
इस लिहाज से यह बताना ठीक रहेगा कि अभिनेता थलापति विजय ने 2 फरवरी 2024 को अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके) लॉन्च की और वह इसके अध्यक्ष हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और सामाजिक न्याय की स्थापना के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया है। उन्होंने अपनी फिल्मोग्राफी से ब्रेक ले लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वह 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मदुरै पूर्व सीट से चुनाव लड़ेंगे। 2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सभी 234 सीटों पर लड़ेगी। जुलाई 2025 में विजय को टीवीके का आधिकारिक मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया गया। वे कहते हैं, “मैं पैसे कमाने के लिए नहीं, सेवा के लिए आया हूं।” टीवीके ने अपनी विचारधारा को “धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय” बताया है और जो वाम-केंद्रित मूल्यों के साथ तालमेल में लगता है। पार्टी अंबेडकरवाद, पेरियारवाद और के. कामराज की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करती है। वे समानता, धर्मनिरपेक्षता, समतावाद, दो-भाषा नीति और लोकतंत्र का समर्थन करते हैं। उन्होंने पेरियार, बीआर अंबेडकर और के. कामराज के साथ-साथ महिला नेताओं वेलु नाचियार और अंजलाई अम्माल को भी अपनी पार्टी के वैचारिक स्तंभों के रूप में नामित किया है। विजय ने स्पष्ट किया कि वह पेरियार के नास्तिक रुख से सहमत नहीं हैं, बल्कि उनके महिला शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को अपनाएंगे। विजय ने बीजेपी को अपना “वैचारिक दुश्मन” घोषित किया है।
विजय ने स्पष्ट कहा है कि टीवीके कभी भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेगी—न प्रत्यक्ष, न परोक्ष। अगस्त 2025 के मदुरै रैली में उन्होंने कहा, “शेर हमेशा शेर रहता है। भाजपा या द्रमुक से कोई गठबंधन नहीं।” सितंबर 2025 के नामक्कल भाषण में उन्होंने डीएमके पर बीजेपी के साथ ‘गुप्त सौदे’ का आरोप लगाया: “द्रमुक का वोट भाजपा को जाता है। भाजपा-अन्ना द्रमुक गठबंधन लोगों को स्वीकार्य नहीं।” विजय की फिल्म मर्सल में भाजपा की स्वास्थ्य नीतियों (जैसे जीएसटी) की आलोचना की गई थी। इस पर भाजपा ने हमला बोला था। विजय ने कहा, “मैं हिंदुत्व या उत्तर भारत-विरोधी नहीं हूं, लेकिन भाजपा लोकतंत्र की हत्या कर रही है।” यह उनके भाजपा विरोधी रुख का प्रतीक बना। विजय ने सत्ताधारी द्रमुक को अपना “राजनीतिक विरोधी” कहा है। उन्होंने द्रमुक सरकार और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और चुनावी वादे पूरे न करने को लेकर तीखा हमला बोला है। इन और ऐसी कई खबरों से भाजपा के लिए उनकी उपयोगिता समझना मुश्किल नहीं है। इसके बिना आज इस खबर को दिल्ली में लीड बनने का अर्थ समझना मुश्किल है। फिल्म पत्रकार जॉर्ज के अनुसार, डीएमके और उसके समर्थकों ने रजनीकांत और कमल हासन को बीजेपी की ‘बी’ टीम बताकर लोगों को उन्हें खारिज करने पर मजबूर कर दिया! फ़िलहाल वे थलपति विजय के ख़िलाफ़ यही हथकंडा अपना रहे हैं। क्योंकि विजय और बीजेपी के बीच कड़वाहट भरा रिश्ता है। (समाप्त)
इसके पहले का पार्ट पढ़ें – लद्दाख हिन्सा के लिए भाजपा जिम्मेदार है – खरगे का आरोप पहले पन्ने पर नहीं है। https://www.bhadas4media.com/laddakh-hinsa-ke-liye-bjp-jimmedaar-hai/
लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है.


