चंद्र भूषण-
तंत्र का पहला ग्रंथ… तंत्र की शुरुआत कहां से हुई थी, यह सवाल ही बेकार है। अपने इर्दगिर्द देखें तो संसार के लगभग हर समाज में अलग-अलग ढंग से काम करने वाले ओझा-सोखा और तांत्रिकों के गुप्त या अर्धगोपन ढांचे मिलते हैं। अमेरिकी लेखक डैन ब्राउन ने अपना लोकप्रिय उपन्यास ‘दा विंची कोड’ तांत्रिक समुदायों जैसे ही पश्चिम के संगठित मूलगामी ढांचे ‘इल्युमिनाटी’ पर लिखा। भारत की तंत्र परंपराओं की ओर से इस सवाल का जवाब मिथकीय शब्दावली में मिलता है। ‘शिव (या देवी, विष्णु अथवा किसी आकाशीय बुद्ध) ने मनुष्यों के कल्याण के लिए इसका सृजन किया और वक्ता-श्रोता युग्मों में चलती रहने वाली अनादि-अनंत वार्ता की तरह इसका अस्तित्व सदैव बना रहेगा।’
ज्यादा कारगर सवाल यह होगा कि सबसे पुराना तांत्रिक ग्रंथ कौन सा है। जवाब में कुछ लोग सीधे अथर्ववेद का उल्लेख करते हैं, जो कोई दूर की कौड़ी भी नहीं है। स्वप्न-विचार और दीर्घजीवन से लेकर मारण, मोहन, उच्चाटन तक के जंतर-मंतर वाले ऐसे कई जुगाड़ इस ग्रंथ में हैं, जिनकी अपेक्षा तांत्रिकों से की जाती रही है। आगे तैत्तिरीय उपनिषद में भी ऋतु की पहली जुताई के वक्त हल के फाल को घी, दूध और शहद से अभिमंत्रित करने का जिक्र आता है, जो तंत्र के काफी करीब है।
प्राचीन भारतीय चिंतन पद्धतियों के महत्वपूर्ण अध्येता देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपने प्रतिष्ठित ग्रंथ ‘लोकायत’ में तंत्र को स्त्रियों द्वारा खेती की शुरुआत की प्रक्रिया और दुनिया भर में पाई जाने वाली मातृदेवियों से जोड़ते हैं, हालांकि आगे वे तंत्र के इर्दगिर्द फैले बहुत सारे रहस्यों को सुलझाते हुए इसकी जटिलता में भी प्रवेश करते हैं।
उनके काम पर अभी सकारात्मक या नकारात्मक, कैसी भी टिप्पणी किए बगैर हम फिलहाल इतना ही मानकर आगे बढ़ें कि तंत्र मुख्यतः एक अवैदिक कर्मकांड है। इसकी क्रियाएं प्रायः गुप्त होती हैं और गुरु-शिष्य की जोड़ियों में ही इसका विस्तार होता है। इसके मूल तत्वों की शिनाख्त हम आगे, थोड़ा बाद में करेंगे और परिभाषा जैसी कोई धारणा भी तभी बनाएंगे।
ज्यादा ठोस और कारगर सवाल यह है कि पूरी तरह तंत्र को समर्पित सबसे पुराना ग्रंथ अभी तक कौन-सा खोजा जा सका है? उसका मकसद क्या है, कौन उसके केंद्र में है? यह ग्रंथ पिछली सदी में खोजा गया और इसका काल निर्धारण और संपादन आश्चर्यजनक रूप से नया है। ताड़पत्रों पर लिखी ‘निश्वासतत्वसंहिता’ को आचार्य हरप्रसाद शास्त्री ने काठमांडू के शाही पुस्तकालय में मिली पांडुलिपियों के कैटेलॉग में दर्ज किया था।
इसकी लिखाई ईसा की नवीं सदी में होने का नतीजा भी काफी पहले निकाल लिया गया था। लेकिन दक्षिण भारत में मिले इसी ग्रंथ के एक हिस्से की मदद लेते हुए इसका संपादन और कालनिर्धारण पॉन्डिचेरी में अभी कुछ ही साल पहले, 2015 से 2018 के बीच फ्रांसीसी भाषिक पुरातत्वविद डोमिनिक गुडाल और अन्य विद्वानों ने किया और साबित किया कि यह छठीं सदी ईसवी की रचना है।
इस ग्रंथ का संबंध तांत्रिक शैवधर्म से है और इंडोलॉजी के क्षेत्र में अभी सक्रिय दो शीर्ष नामों एलेक्सिस एंडरसन और जूडिट त्योरजोक की भी राय यही है कि भारतीय तंत्र को लेकर इससे पुराना कोई और ग्रंथ अबतक नहीं खोजा जा सका है। ज्यादा ठोस ढंग से कहें तो यह पाशुपत पंथ से निकली हुई रचना है और इसे बाद में सामने आई कुल तीन शैव तांत्रिक धाराओं में से एक, ‘शैव-सिद्धांत’ का मूलग्रंथ कहा जा सकता है। पाशुपत पंथ के बारे में विस्तृत बातचीत कहीं अलग से होगी, लेकिन एक-दो बातें इसपर यहीं कह देना जरूरी है।
इस गृहत्यागी शैवपंथ को लेकर ईसा की दूसरी सदी से कुछ-कुछ सूचनाएं मिलती आ रही हैं। एक तो इसके संस्थापक लकुलीश नाम के व्यक्ति हैं, जिन्हें शिव का 28वां अवतार कहा गया। एक हाथ में पकड़े सोंटे और दूसरे में चकोतरा नींबू से इनकी मूर्तियों की पहचान होती है। इसके अलावा पहली नजर में ही ये अपने ऊर्ध्वलिंग से पहचाने जाते हैं, जो भारत तो क्या दुनिया की किसी भी मूर्ति में नहीं दिखता।
गुप्तवंश के पांचवें सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और सातवें स्कंदगुप्त के शासनकाल में बनवाई गई लकुलीश की मूर्तियां मथुरा और अन्य जगहों पर मिलती हैं और उनकी लंबी शिष्य परंपरा के शिलालेख भी मिलते हैं। लेकिन यह परंपरा गृहत्यागी भिक्षु संन्यासियों की रही है, गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान कराने वालों की नहीं। शिष्यों का गुरु के प्रति समर्पण पाशुपत पंथ के मूर्ति-चित्रण में शुरू से दिखता रहा है लेकिन शिष्य की ‘दीक्षा’, उसकी ‘शुद्धि’ के कर्मकांड और अनुष्ठानों की गोपनीयता इस ग्रंथ की नई बातें हैं, जिनका कोई संदर्भ गुप्तकालीन पाशुपत पंथ से नहीं जुड़ता।
हम जानते हैं कि ईसा की छठीं सदी पुराने भारत के सबसे प्रतापी राजवंश, गुप्तवंश के पराभव की है। ऊपरी तौर पर यह लगातार जारी हूणों के हमलों से मुकाबले के क्रम में हुआ, लेकिन कोई भी राजवंश 300 साल में तो अपने वजन से ही टूटने-बिखरने लगता है। अंदाजे पर चलें तो तंत्र का सिलसिला पाशुपत पंथ की परंपरा में ही शुरू होने का सीधा संबंध देश में सबसे देर तक चली राज्य-व्यवस्था के अंतिम सांसें गिनने से जोड़ा जा सकता है। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें यह पक्का करना होगा कि भारत का पहला तांत्रिक ग्रंथ निश्वासतत्वसंहिता ही है। और यह हो जाए तो यह कैसे साबित करेंगे कि कोई और मौखिक, गुप्त तंत्र परंपरा इस ग्रंथ से पहले नहीं चल रही थी!
बहरहाल, नेपाल में मिली पांडुलिपि में तंत्र के अलग-अलग पहलुओं पर केंद्रित पांच अलग-अलग किताबें हैं। निश्वासमुख, मूलसूत्र, उत्तरसूत्र, नयसूत्र और गुह्यसूत्र। इनमें एकसूत्रता जरूर है लेकिन इनका स्वरूप कुछ ऐसा है कि इन्हें एक ही ग्रंथ के अलग-अलग खंड नहीं माना जा सकता। फिर भी, उत्तरसूत्र में इस ग्रंथमाला का महत्व इस रूप में बताया गया है-
अनधित्यथ निश्वासम् निश्वसंति पुनः पुनः।
अधीत्वा चैव निश्वासम् न पुनर्निश्वसंति ते।।
निश्वासेव विख्यातस सर्वतंत्रसमुच्चयः।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जंतुः संसारभवबंधनात।।
‘निश्वासतत्वसंहिता न पढ़ने वाले निराशा में बार-बार सांस छोड़ते हैं लेकिन इसका अध्ययन कर लेने के बाद फिर कभी निराशा वाली सांस नहीं छोड़नी पड़ती। निश्वासतत्वसंहिता सभी तंत्रों के समुच्चय के रूप में विख्यात है और इसे जान लेने वाले जंतु संसार और भवबंधन से मुक्त हो जाते हैं।’ यानी इस ग्रंथमाला की प्रस्तुति सांसारिक निराशाओं से मुक्ति के अलावा भवबंधन यानी जन्म-मरण से मुक्ति दिलाने वाले बौद्ध (या मोक्ष) विमर्श को भी संबोधित करते हुए की गई है।



