जै हो लोकतंत्र की… तीसरा खंभा भी आज पूरी तरह हिल गया… (पढ़ें सोशल मीडिया पर आ रहीं किसिम-किसिम की प्रतिक्रियाएं)

Urmilesh Urmil : आजादी के बाद भारत में ‘जनतंत्र’ (चाहे वह जैसा भी रहा है!) और इसकी संवैधानिक व्यवस्था के सामने पहले भी संकट आये हैं। पर आज जैसा संकट पहले कभी नहीं रहा। यह अभूतपूर्व स्थिति है। इसलिए अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आ रहे हैं! अफसोस कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था इसके बरक्स ठोस कदम नहीं उठा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने आज स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कहा कि हमें प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए बाध्य होना पड़ा ताकि भविष्य में कोई यह न कहे कि हमने आत्मा बेच दी थी! एक नागरिक के रूप में मैं सुप्रीम कोर्ट के इन चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों क्रमशः: न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ को सलाम करता हूं। उन्होंने सिर्फ न्यायपालिका के संकट पर ही नहीं, जम्हूरियत के गहराते संकट पर देशवासियों को आगाह किया है। इससे अधिक वो और क्या करते! अब देखना है, राजनीतिक दल, सिविल सोसायटी, विद्वत समाज और आम नागरिक क्या करते हैं! अगर लोग अब भी नहीं जागते तो यकीन मानिए, कुछ ही सालों के अंदर भारत के समाज और सियासत की तस्वीर पहचानने लायक नहीं बचेगी! हमारे संविधान के अनगिनत पन्ने गायब होंगे और नये अध्याय जुड़े मिलेंगे ! समाज के स्तर पर इसका जो असर होगा, उसकी कल्पना करना भी भयावह अनुभव होगा!

Samar Anarya : सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों ने ऐतिहासिक, भारत के इतिहास में पहली प्रेस कांफ्रेंस से तमाम बातें साफ़ हैं. जो सबसे बड़ी है वह यह कि मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ न्यायाधीशों के विरोध के बावजूद अमित शाह के खिलाफ सुनवाई कर रहे जस्टिस लोया की संदिग्ध मृत्यु का मामला उनका बहुत जूनियर बेंच को सौंपा! अब क्यों यह समझने के लिए विशेषज्ञता की ज़रूरत नहीं है! दूसरी यह कि जब पूछा गया कि क्या मुख्य न्यायाधीश को महाभियोग लाकर पद से हटा देना चाहिए- जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा ये फैसला जनता करे, हाँ अगर न्यायपालिका आज़ाद नहीं हुई तो लोकतंत्र नहीं बचेगा! बोले तो संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणतंत्र की संस्थाओं को ध्वस्त किये बिना संघी सपनों का भारत बन ही नहीं सकता! और आज की इस प्रेस कांफ्रेंस का असर जो भी हो- ये चार न्यायाधीश गणतंत्र बचाने के लिए लड़ी ताकतों के लिए सम्मान और प्रेरणा दोनों का पात्र होंगे!
Dilip Khan : दीपक मिश्रा का नाम कलिखो पुल के सुसाइड नोट में भी था. इल्ज़ाम था कि दीपक मिश्रा के भाई आदित्य मिश्रा ने उनसे 37 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. यूपी में मेडिकल कॉलेज में भ्रष्टाचार वाले मामले में ओडीशा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की जो गिरफ़्तारी हुई उस कॉलेज को क्लीन चिट देने वाले जज भी दीपक मिश्रा थे. फिर उसी मामले में बेंच बदल दिया. ख़ुद नई वाली खंडपीठ में फिर से शामिल हो गए. जस्टिस लोया वाले मामले में मनमाना बेंच बनाने में CJI अड़े हुए थे. लोया की हत्या में अमित शाह पर शक की सूई टिकी हुई है. दीपक मिश्रा का ट्रैक रिकॉर्ड ख़राब है. इससे पहले जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में ही कई लोगों ने सवाल उठाए थे. सवालों को सुनते नहीं और गड़बड़ी से बाज़ आते नहीं.

Anand Sharma : आप instituition की हत्या करते रहने के आदी हैं। पहले उच्च न्यायालय के फैसले की तोड़ इमरजेंसी लगा कर की, फिर उच्चतम न्यायालय का शाहबानो फैसला संसद में तोड़ा, एक भ्रस्ट जज को संसद से बरी करा, फिर दस वर्ष एक रोबोट प्रधानमंत्री बनाये रखा जिसे आप के नाती के हाथ जोड़ने में गर्व महसूस होता था जो सिक्योरिटी द्वारा धखिया दिया जाता है। आप ने मीडिया और कार्यपालिका को घुटने बिठा दिया अंततः वह भी खाऊ हो गए। आज आप ने ये चार जोकर खड़े कर दिए। ये जज हैं या एडमिनिस्ट्रेटिव अधिकारी? ये मसले सुनते हैं या ये अपने सुनने के लिए मसले खुद तय करते हैं कि कौन सा मसला इन्हें सुनना है कौन सा नही। आप देश को गर्त में भेजना चाहते हैं पर आप की ये साज़िश भी गिरेगी और साथ गिरेंगे आप। इन चार जजों के अलावा के जो उच्चतम न्यायालय में 20 जज है इन चारों की निगाह में उन्होंने अपनी आत्मा और ज़मीर बेच दी है और इन चारों ने नहीं बेची।

Chandan Srivastava : सुप्रीम कोर्ट के उन चारों जजों की समस्या क्या है, इसकी डीप जानकारी तो कल अखबार पढ के ही लगेगी और तब ही हम समझ पाएंगे कि उनके आरोपों में कितना दम है या कोई दम है भी या नहीं अथवा सीजेआई की किसी छोटी-मोटी चूक को मुद्दा बनाकर वे कोई और निशाना लगाना चाहते हैं। मेरे ख्याल से प्रथम दृष्टया आखिरी वाली सम्भावना ज्यादा सटीक लगती है। चारो जजों के कृत्य के समर्थन में कांग्रेस पार्टी आ गई है। पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने जजों के प्रेस कांफ्रेंस का समर्थन किया है। हां सीताराम येचुरी ने भी। दूसरी तरफ केटीएस तुलसी, इंदिरा जयसिंह, प्रशांत भूषण आदि भी चीफ जस्टिस के विरोध और चारो न्यायमूर्तियों के समर्थन में हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा के सीजेआई बनते ही ऐसे ही तत्वों ने रोना-गाना शुरू कर दिया था कि वे राष्ट्रवादी हैं। और मुझे लगता है कि चीफ इस प्रोपेगैंडा के दबाव में कुछ हद तक आ भी गए हैं। लेकिन वे तत्व उन्हें कुछ हद तक नहीं पूरी तरह दबाव में लेना चाहते हैं।

Pushya Mitra : न्यायपालिका खतरे में नहीं, न्यायपालिका खत्म हो चुकी है. यहां न्याय खरीदने बेचने का कारोबार होता है, वकीलों की फीस और जजों के चढ़ावे से न्याय मिलता है. यह आज की बात थोड़े ही है. यह तो न जाने कब से है. न्यायपालिका के सवालों को पर बहस हो, इसे सुधारने का इंतजाम हो. किसी एक जज को घेरने से न्यायपालिका थोड़े सुधरेगी. जजों की नियुक्ति और बेंच गठिन करने का अधिकार तो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को काफी पहले से है. और हर वक्त में जो लोग इस कुरसी पर रहते हैं अपने हिसाब से काम करते हैं. क्या यूपीए के जमाने में पोलिटिकल मुकदमों में जजों की बेंच का गठन आंखमूंद कर होता था… क्या तब सरकार का दबाव नहीं रहता था… कैसे शिबू सोरेन बेदाग छूट गये… कैसे लालूजी को आय से अधिक संपत्ति के मामले में बाइज्जत बरी कर दिया गया… यह सब हमेशा से होता रहा है. इसे ठीक कीजिये… इसके नाम पर पोलिटिकल स्टंटबाजी नहीं कीजिये… इसे मोदी को घेरने का मौका नहीं बनाइये… गंभीरता से इसपर मंथन कीजिये… व्यवस्था में बदलाव लाइये… सबडिवीजनल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक जो कदम-कदम पर भ्रष्टाचार पसरा है, न्याय को खरीदने की व्यवस्था है उसका उपाय तलाशिये… मोदी पर या दीपक मिश्रा पर हमला कर देने से इसका समाधान नहीं निकलेगा…

Rajesh Priyadarshi : पीएम की जगह जज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, जज की जगह एंकर फ़ैसला सुना रहे हैं, ब्रह्मचारी बताते हैं कितने बच्चे पैदा करो, नेता-अभिनेता के रोल की अदला-बदली पुरानी है. पत्रकार प्रवक्ता, प्रवक्ता सेलिब्रिटी हो गए, न्यू इंडिया में सीएजी की रिपोर्ट पीवीआर में रिलीज़ होगी जिसमें विपक्ष की पोल खोल दी जाएगी, मुझे कोई ताज्जुब नहीं होगा. अरे, कोई तो अपना काम करो और ढंग से करो.

Anil Jain : मी लार्ड! आपने प्रेस कांफेन्स करके अपनी घुटन का इजहार किया और लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे से देश को आगाह किया। इसके लिए आपके साहस को सलाम और शुक्रिया….. लेकिन मी लार्ड, आप से एक शिकायत भी है….पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड पर आप अपने ही आदेश को पूरी तरह लागू नहीं करा सके और बेईमान अखबार मालिकों के दलाल वकील मूंछों पर ताव देते हुए ठहाका लगाते रहे। यॉर ऑनर, लोकतंत्र के लिए ऐसा होना भी तो अच्छी बात नहीं है ना!

Sandip Naik : साढ़े तीन साल में देश के संवैधानिक प्रधानमंत्री ने कोई प्रेस वार्ता नही की जबकि मन की बात से लेकर मीडिया को पिछले दरवाज़े से ज्ञान गणित बहुत दिया । आज देश के चार योग्य, पढ़े लिखे, अनुभवी और दीर्घ कालीन प्रशासनिक अनुभव रखने वाले चार जजेस ने जो आरोप लोकतंत्र को लेकर लगाए है तो जाहिर है कि लोकतंत्र के मुखिया को हम सब आज प्रेस से खुले और मुक्त दिमाग़ से बात करते हुए देखना समझना चाहते है। यह उनके , देश और न्यायपालिका के हक़ में होगा ताकि एक गरीब आदमी की आस्था ना टूटे और भरोसा कायम रहें। यदि अब प्रधानमंत्री जी सामने आकर प्रेस के साथ बगैर पूर्वाग्रह से बात नही करते तो उन पर से भी भरोसा उठ जाएगा। यह नितांत जरूरी ही नही बल्कि आवश्यक है क्योंकि महामहिम राष्ट्रपति जी की ओर से कोई ऐसी सम्भावना नजर नही आ रही, क्योकि उनकी स्थिति से हम सब अवगत ही है। प्रेस से बात ना करना पूरी मीडिया और जनभावनाओं का सार्वजनिक अपमान है। हमें मालूम है कि रविश कुमार से बात करने की हिम्मत नही आपकी पर और लोग भी है विदेशी मीडिया भी है जिसकी समझ मे आप अवतार है ही। आज आप हिम्मत करिये और शाम को 7 बजे या कल सुबह पूरे देश के सामने प्रेस से लाइव बात करिये, यह सिर्फ जस्टिस लोया के हत्यारों को बचाने की बात नही बल्कि हम सबकी भावनाओं, आस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के अक्षुण्णता की भी बात है। यह निवेदन मैं बगैर किसी पूर्वाग्रह या विचारधारा के तहत नही बल्कि इस देश के जिम्मेदार और संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के तहत और सूचना के अधिकार कानून के तहत जानना चाहता हूँ कि आखिर क्यों ऐसी नौबत आई कि एक नही चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को जनता के सामने, मीडिया के सामने आकर 7 पृष्ठ की पीड़ा जारी करना पड़ी कि देश मे कुछ भी ठीक नही चल रहा। मैं दुखी हूँ और आहत हूँ क्योकि न्यायपालिका के निर्णयों से नीतियां प्रभावित होती है जो मेरे जीवन पर सीधा असर डालती है। आशा है आप इस नम्र निवेदन को स्वीकार करेंगें।

Vikram Singh Chauhan : रिटायर्ड जस्टिस आरएस सोढी ने मीडिया से कहा है कि इन चारों जजों के खिलाफ महाभियोग चलाए जाए। चारों जजों को अब किसी भी तरह से उनका पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। सोढ़ी का कहना है जजों को मीडिया में जाने का अधिकार नहीं है। यह कौन सी बात हुई क्या जज देश के सामने अपनी तकलीफों और चिंताओं को जाहिर नहीं कर सकते। ये जज अपने स्तर पर कोशिश कर रहे थे कि ये बातें जो गंभीर हैं वे सुप्रीम कोर्ट के अंदर ही निपट जाये और सीजेआई इस पर उचित कदम उठाये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर इन जजों पर कोई कार्रवाई सीजेआई द्वारा की जाती है या सरकार के स्तर पर कोई अप्रत्याशित बयान आता है तो आप तय मानिये भारत देश में लोकतंत्र अपनी आखिरी सांसे गिन रही है।

Paramendra Mohan : सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस पर आपकी क्या राय है? रिटायर्ड जस्टिस आर एस सोढ़ी,वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम ने आलोचना की है। सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि ये सभी जज बेहद सीनियर हैं, इनकी आलोचना नहीं की कर सकते, पीएम दखल दें, समाधान निकालें। वरिष्ठ अधिवक्ता के टी एस तुलसी और प्रशांत भूषण ने कहा है कि जरूर ऐसी वजह रही होगी, जिसके कारण चार वरिष्ठ जजों को ये कदम उठाना पड़ा। अब कुछ ही देर में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की प्रेस कांफ्रेंस होने वाली है, जिसमें अटॉर्नी जनरल भी रहेंगे। प्रधानमंत्री ने कानूनमंत्री से इस बारे में बात की है, ये खबर भी आई है। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के चार जज एक साथ मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाते हुए प्रेस कांफ्रेंस के लिए एक साथ आए हैं, तो मामला बेहद गंभीर है, इसीलिए आपकी राय जानना चाहता हूं।

Adv Swapnil Kumar Pandey : अब तो सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज भी बोल रहे हैं कि मोदी राज में लोकतंत्र खतरे में है! एक नहीं 4-4 लोग बोल रहे हैं! अब देखिएगा भक्तों द्वारा इनके ऊपर भी विपक्षियों से मिलने और सरकार को बदनाम करने की कोशिश का आरोप लगाया जाएगा क्योंकि असलियत और सच्चाई सुनना, भक्तों की समझ से परे है!

Om Thanvi : जब-जब देश में अँधेरा घना गहराता है, उजाले की किरण भी कहीं न कहीं से उभर आती है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का विद्रोह हममें गर्व भरता है और उम्मीद की डोर टूटने नहीं देता। शुक्रिया मी लॉर्ड!

Devpriya Awasthi : यदि न्यायमूर्ति दीपक मिश्र को न्यायपालिका की गरिमा की किंचित भी चिंता है तो सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की आज की प्रेस कान्फ्रेंस के बाद उन्हें प्रधान न्यायाधीश के पद से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए.

Rakesh Kayasth : लोकतंत्र का तंबू जिन चार बंबुओं पर टिका है, उनमें से दो पहले से ही रामभरोसे थे। तीसरा खंभा आज पूरी तरह हिल गया। रही बात चौथे चौथे स्तंभ की तो चम्मच होने से लेकर चम्मच चुराने तक उसके पास अपने काम के अलावा कई और दूसरे काम हैं। बात हंसने की नहीं रोने की है।

Rohit Sardana : लिहाजदारी की आख़री दीवार जजों ने ख़ुद ही गिरा दी है. कल जनता अदालतों/जजों पे ऐसे ही सवाल उठाने लगे तो उसे अदालत की अवमानना की आड़ में दबाइएगा नहीं.

Alpyu Singh : मीडिया अब समझ ले कि उस की पावर क्या है। जनता की अदालत में आज जज इंसाफ़ मांग रहे हैं।

Upendra Chaudhary : या तो सुप्रीम कोर्ट के ये चारों जज सिस्टम के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हैं, या फिर इन्हें सिस्टम के रचे जा रहे षड्यंत्र का स्पष्ट एहसास हो चला है! इसका पता सिर्फ़ नागरिक बोध से लगाया जा सकता है।

Rohit Kumar : सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पहली बार..एक गलत परिपाटी की शुरूआत. मीडिया माई-बाप नहीं है.. आपको माई-बाप बनाया गया है संविधान द्वारा… पूरी तरह असहमत इस तरीके से..

Sunil Pandey : समीक्षा तो होनी चाहिए, इससे इनकार नहीं है लेकिन यह नई शुरुआत कुछ अच्छा नहीं माना जा सकता है।

और ये भी….

Parmanand Pandey : Media Conference that was addressed by four senior most judges of India – Justice Jasti Chelameswar, Ranjan Gogoi, Madan Bhimarao Lokur and Kurian Joseph has brought mixed feelings for me. One is that it is good that these judges have brought forth the rot that has set in the judicial system of the country and when they could not clean up internally; they thought it fit it to bring it to the notice of the country. The second one is that it has seriously eroded and damaged the credibility of the Judiciary. However, I fail to understand as to how their Media Conference is going to resolve the problems?

It may be noted here that it is not for the first time that the differences among the judges of the Supreme Court have come to the fore. Earlier they have been expressing their differences through their judgments. For example; there was no love lost between Justice Bhagwati and Justice V.Y. Chandrachud. Justice Bhagwati had openly castigated the then Chief Justice Chandrachud in his historic judgement of ‘S.P. Gupta vs Union of India’. He had said that only for maintaining the dignity of the office of the Chief Justice of India that he was not asking him to file an affidavit otherwise he needed to be asked. Similarly, the Chief Justice A.N. Ray had to bear the ire of many of his brother judges for constituting a Bench for reviewing the Kesvanand Bharti case. As a result of it, he had to dissolve the Bench in a huff.

In any case, this Media Conference is certainly like volcanic eruptions. Hence, the Government and the Parliament can ill afford to ignore it. This has been an open secret that right from the time Justice Dipak Misra has become an eyesore for many Judges and Advocates. Some of the Advocates have even adopted the tactics of browbeating him which, by all means, is reprehensible.

The seven page letter, which has been written by these senior most Judges to the Chief Justice of India, does not clearly spell the reasons for mounting their attack on him. They have simply stated that certain cases of importance have deliberately not been sent to the appropriate Bench. The second point that they have raised about the Memorandum of Procedure (MoP) to be adopted for the appointment of judges but this too is not so serious a matter warranting for the Media Conference. By their letter we can simply infer that only the ashes have come out so far from the volcano but the lava is still to come out.

As an ordinary student of the constitution, I find that only two courses are left for extinguishing the fire and resolve the unprecedented controversy. One is that the Chief Justice must suo muto initiate contempt of court proceedings against all these Hon’ble Judges, who, in turn, can use the ‘truth’ as their defense, which will help the people to know the real cause of wounds. Otherwise it will be understood that these Hon’ble judges have tarnished and brought down the majesty of law in the eyes of the public by holding the Media conference.

The other one is that if the Government and the Parliament find some merit in the allegations of these Hon’ble Judges, then an impeachment proceedings should be initiated against the Chief Justice of India and let the Members of Parliament discuss threadbare to find out the cure. Justice Misra must also address the Parliament to tell his own side of story so as to help root out the corruption from the judiciary. However, if he is found guilty he must be impeached. But if he is on the right course then he must be acclaimed and awarded with the highest civilian award like Bharat Ratna.

In any case, drastic steps must be taken immediately otherwise; rumour mills will be grinding with breakneck speed to inflict incalculable damage to the judiciary and the democracy.

सौजन्य : फेसबुक

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