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सियासत

इस एक अकेली महिला से गोरमेंट को डर लगता है!

सत्येंद्र पीएस-

तीस्ता सीतलवाड़ के होने का मतलब एक बहादुर औरत का पब्लिक स्फीयर में होना है, जिससे देश की साम्प्रदायिक ताकतों और उनके सबसे बड़े आका को डर लगता है। तीस्ता को बर्बाद करने के लिए सरकार ने जितनी ताकत झोंक रखी है, वही तो तीस्ता होने का मतलब है।

खौफ ऐसा होना चाहिए कि आधी आबादी जिसे ईश्वर समझे बैठी हो, वह एक अकेली महिला से कांपता नजर आए। भले ही उसकी जेब मे आईबी सीबीआई, सीआरपीएफ हो और वह डेल्टा सिक्योरिटी के घेरे में रहता हो।

ये वही तीस्ता सेतलवाड़ हैं जिनके बाबा एमसी सेतलवाड़ देश के पहले अटॉर्नी जनरल थे।

ये वही तीस्ता सेतलवाड़ हैं जिनके परबाबा चिमणलाल हरिलाल सेतलवाड ने जालियावाला बाग में 400 हिंदुस्तानियों को मार देने वाले जनरल डायर के खिलाफ ब्रिटिश अदालत में मुकदमा लड़ा और डायर को कोर्ट मार्शल कराया, उसे डिमोट कराया। इनके परबाबा डा. भीमराव आंबेडकर के बहिष्कृत हितकारिणी सभा के फॉऊंडिंग प्रेसिडेंट थे!

ये वही तीस्ता हैं जो दंगो में मारे गए सैकड़ो हिंदुओ के न्याय की लड़ाई ही नहीं लड़तीं, बल्कि दर्जनों की शिक्षा दीक्षा का काम भी देखती हैं। मुम्बई बम ब्लास्ट 1993 में मारे गए “हिंदुओ” की लड़ाई भी तीस्ता ही लड़ीं, सरकार से मदद दिलाई। उन्हें ये सावरकर के समर्थक गुंडे हिन्दू नहीं मानते क्योंकि ब्लास्ट में मरने वाले ठेले खोमचे वाले और आम नागरिक थे।

पूरा परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी आम लोगों की लड़ाई लड़ता रहा है। तीस्ता के पिता भी जाने माने बैरिस्टर थे और जनहित के मुद्दों पर लड़ने के लिए जाने जाते हैं।

ये लोग देश भक्ति का ढोंग नहीं करते, इनकी तीन पीढ़ी आम लोगों के लिए गोरे अंग्रेजों से लड़ी है और स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी काले अंग्रेजों से लड़ रही है।

समस्या यह है कि इस समय गद्दारों और वादा माफ गवाह बनने वाले सावरकर के भक्तों की सरकार है।अंग्रेजों के पेंशन पर पलने वालों की मानस औलादों, भीख मांगकर, मन्दिर के नाम पर चंदा मांगकर जिंदगी बिताने वालों को लगता है कि हर कोई सिर्फ पैसे के लिए काम करता है। हर किसी को डराया जा सकता है।

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