तेजिंदर गगन का जाना

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर चौबे के दिवंगत होने की खबर का अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था की खबर आई, तेजिंदर गगन नहीं रहे। मुझे याद है तेजिंदर गगन से मेरी पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी। वह एक राज्य संसाधन केंद्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम था। जिसमें वह बतौर साथी वक्ता पहुंचे थे।

वहां एक महिला वक्ता ने अपने वक्तव्य के दौरान महिलाओं को दोयम दर्जे में रखे जाने की वकालत कर रही थी और सारे श्रोतागण स्तब्ध होकर सुन रहे थे। वह महिला किसी कॉलेज में प्रोफेसर थी मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा है।

लेकिन जैसे ही तेजिंदर गगन के अपने वक्तव्य देने की बारी आई तो उन्होंने अपने वक्तव्य के प्रारंभ में ही कहा कि मेरी 62 साल की आयु में पहली बार किसी महिला को इस तरह के वक्तव्य देते हुए देखा है। यह एक दुर्भाग्य है की आज भी सार्वजनिक तौर पर ऐसी बातें कही जा रही है। वह भी एक महिला के द्वारा। उन्होंने बड़ी विनम्रता से अपनी बात को रखा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ इस प्रकार उनसे मेरा मिलने जुलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया।

प्रसंगवश बताना जरूरी है कि वे दूरदर्शन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे. तेजिंदरजी ने ‘देशबंधु’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में वे बैंक में पदस्‍थ रहे और फिर आकाशवाणी और दूरदर्शन में लंबे समय तक कार्यरत रहे. इस दौरान उन्होंने रायपुर, अंबिकापुर, संबलपुर, नागपुर, देहरादून, चैन्नई व अहमदाबाद केंद्रों में अपनी सेवाएं दीं. उनके उपन्यास काला पादरी, डायरी सागा सागा, सीढ़ियों पर चीता इत्यादि बहुचर्चित हुए।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने ‘अनटोल्ड नाम’ की एक अंग्रेजी पत्रिका प्रकाशित कर रहे थे, जो डिजिटल फार्मेट में भी उपलब्ध है। वे इस पत्रिका में वंचित समुदाय के दुख दर्द को पर्याप्त स्थान देते थे। वह रायपुर में तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय थे और लगभग हर कार्यक्रम में दिखाई पड़ते थे। उनकी बेहद सरल ढंग से अपनी बात रखने की शैली ने पाठकों और दर्शकों को प्रभावित कर रखा था। वे बहुत बड़ी बड़ी बातों को भी बहुत ही सहजता से बोलते थे।

हाल ही में उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन छत्तीसगढ़ की ओर से सप्तपर्णी सम्मान से नवाजा गया था। इसी सम्मान की श्रृंखला में इन पंक्तियों के लेखक को पुनर्नवा पुरस्कार से नवाजा गया। मुझे बेहद गर्व था कि उनके साथ मुझे भी सम्मानित किया गया क्योंकि वह एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे ।

उन्हें उनके उपन्यास काला पादरी के लिए बेहद प्रसिद्धि मिली। काला पादरी समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है। ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है। ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है। अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मे शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है।

‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है। निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है।

वह कविताएं निबंध भी लिखा करते थे उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों पर चोट तथा प्रगतिशीलता की झलक मिलती थी। फिलहाल वे संस्मरण लिख रहे थे और मुझे बताया था कि कुछ संस्मरण वे प्रकाशन के लिए भी भेज रहे हैं। इसे किताब के रूप में प्रकाशित करने की योजना भी है। गौरतलब है कि मासिक पत्रिका हंस में भी उनके संस्‍मरण प्रकाशित हुये है।

वे अक्‍सर कहा करते थे कि उन्‍हे वामपंथ एवं अंबेडकरवाद की समझ उनके नागपुर पदस्‍थापना के दौरान हुई। वे चीजों को बहुत ही गहराई से देखते थे। अपने किसी भी वकतव्‍य में इस बात का बखूबी ख्‍याल रखते की किसी को बुरा न लगे। इसलिए वे विनम्रता से अपनी बात रखते थे। मेरी उनके साथ पत्रिका अनटोल्‍ड के प्रकाशन के संबंध में कई बार सम्‍पर्क हुआ लेकिन कई कारणों से पत्रिका का सतत प्रकाशन नही हो पाया। उनका जाना साहित्‍य के लिए अपूर्णीय क्षति जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है।

लेखक संजीव खुदशाह जाने-माने दलित लेखक हैं. वे प्रगतिशील विचारक, कवि, कथाकार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं. संजीव की कई भाषाओं में ढेरों किताबों प्रकाशित हो चुकी हैं. संजीव की पहचान एक मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है. इन्हें कई पुरस्‍कारों एवं सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. संपर्क : 9977082331

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