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ईटी की रिपोर्ट- हर 5 में से एक ट्रक कहीं-न-कहीं खड़ा है… कारण है- डीजल नहीं मिल रहा है!

सुभाष सिंह सुमन-

सरकार का दावा है देश में डीजल-पेट्रोल-गैस की कोई कमी नहीं है। सरकारी तेल कंपनियों का भी दावा है पूरे देश में डीजल-पेट्रोल की कहीं कोई किल्लत नहीं। एकाध जगह छिटपुट दिक्कतें हैं लोकल इश्यूज के कारण। इधर ट्रांसपोर्टर्स सब देशद्रोह पर उतारू हैं। कह रहे हैं डीजल नहीं मिल रहा। ईटी ने इसपर बड़ी अच्छी खबर की आज। खबर बता रही है देश में 95 लाख ट्रकों का फ्लीट मौजूद है। उनमें से 20% यानी 19 लाख ट्रक अभी जहाँ-तहाँ खड़े कर दिये गये हैं। मतलब हर 5 में से एक ट्रक कहीं-न-कहीं खड़ा है। कारण है- डीजल नहीं मिल रहा है। अब किसकी बात मानी जाए? सरकार और सरकारी तेल कंपनियों की या ट्रांसपोर्टर्स की?

अब मैं ट्रांसपोटर्स की बात नकार भी देता और भक्तों की तरह उन्हें देशद्रोही भी बता देता, लेकिन अपने अनुभव का क्या करूँ? मैं पेट्रोल भराने 4-5 किलोमीटर दूर जाता हूँ। एक किलोमीटर के दायरे में इंडियन ऑयल के दो पंप हैं, लेकिन वहाँ जब भी पेट्रोल लिया, गाड़ी की एवरेज बहुत बेकार आयी। इस कारण 5 किलोमीर दूर एचपी वाले पर जाता हूँ। जब भी जाता हूँ, पूरी टंकी भरवाता हूँ। और तभी जाता हूँ, जब आखिरी खूँटी पर मामला पहुँच जाता है। 4-5 दिन पहले यही हुआ। एचपी के जिस पेट्रोल पंप पर हमेशा जाता हूँ, वहीं गया। पंप वाले ने कहा 500 का ही दे पायेंगे। रेगुलर कस्टमर वाली रियायत के बाद हजार का पेट्रोल भराया। बोला- इससे ज्यादा भरे तो एचपी वाले टैंकर रोक लेंगे। मुझे उसकी बात पर संदेह हुआ। दोनों पड़ोस वाले इंडियन ऑयल के पंप पर भी गया। वहाँ भी 500 से ज्यादा का पेट्रोल नहीं दे रहा था। फिर एक पेट्रोल पंप संचालक मित्र को फोन घुमाये। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की। हजार का पेट्रोल 3 दिन में निपट गया। फिर पेट्रोल लेना था। लोगों ने बताया रिलायंस वाले पंप पर पूरा भर रहे हैं। वहीं गये। पूरी टंकी भरा गयी।

अब रिलायंस वाले पंप पर पेट्रोल है इंडियन ऑयल-एचपी वगैरह की तुलना में ऑलमोस्ट ढाई रुपये महँगा। कारण है कि जियो-बीपी और नायरा ने 15 मई से पहले भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाये थे। अब जितनी बार सरकारी कंपनियाँ दाम बढ़ा रही हैं, उतनी बार ये भी बढ़ा रही हैं। सरकार और सरकारी कंपनियों का दावा है कि उनके पास अब भी 60 दिनों का स्टॉक है। युद्ध शुरू होने के बाद जब पहली बार बताया था, तब भी 60 दिनों का दावा किया था। क्रूड की सप्लाई कम आ रही है, लेकिन अब भी रहस्यमई तरीके से 60 दिनों का स्टॉक बचा हुआ है। मान लेते हैं सरकार की ये बात। अब जब आपके पास स्टॉक है, फिर भी आप सरकारी कंपनियों के पंपों पर पर्याप्त पेट्रोल-डीजल उपलब्ध नहीं करा रहे हो, इसका मतलब बनता है कि आप सरकारी कंपनियों को बर्बाद कर अंबानीजी के पंप का बिजनेस बढ़ा रहे हो। दूसरी स्थिति बनती है कि आपके पास स्टॉक में पर्याप्त तेल ही नहीं है, इस कारण सरकारी पंपों पर कमी हो रही है और यह स्थिति सच है तो आप देश को झूठ बोलकर गुमराह कर रहे हो। दोनों ही स्थितियाँ देश के साथ गद्दारी हैं।

अब सरकार बहादुर क्या सोचती है, कहाँ से सोचती है, यह नहीं बताया जा सकता। लेकिन मैं सोचता हूँ कि किसी भी सरकार या सिस्टम के लिए सबसे खराब स्थिति है ट्रस्ट डेफिसिट हो जाना। आप फिस्कल डेफिसिट और ट्रेड डेफिसिट वगैरह को कुछ छोटे-बड़े उपाय से संभाल सकते हो। ट्रस्ट डेफिसिट अगर पैदा हो गया, फिर वह अपनी पूरी कीमत वसूलकर ही बैलेंस होगा। यकीन नहीं हो तो यूपीए-2 में सरकार चला रहे लोगों से बात कर लीजिए। हालाँकि बात भी करने की क्या जरूरत! अभी सरकार चला रहे लोग ही तो उसके असली डिजाइनर हैं। यूपीए-2 के लिए आम जनता के मन में जो ट्रस्ट डेफिसिट पैदा हुआ था, उसे खतरनाक दुष्प्रचार मशीनरी से डिजाइन किया गया था। कोयला घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला आदि में क्या परिणाम निकला अबतक? कितनी रिकवरी हो पायी है? 12 साल सरकार में रहकर भी कपिल सिब्बल की जीरो लॉस थियरी ही पुष्ट कर पाये। यूपीए-2 के समय जो ट्रस्ट डेफिसिट आया, वो आर्टिफिशियल था, स्पॉन्सर्ड था। अभी जो ट्रस्ट डेफिसिट पैदा हो रहा है, वो नैचुरल है, स्वत:स्फूर्त है। इसी कारण सोशल मीडिया पर आलोचना के कंटेंट हटा दिये जा रहे। मोदीजी के पुराने वीडियो भी मिनटों में सेंसर हो जा रहे हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया को नियंत्रित कर अपने हिसाब से खबरें प्लांट की जा रही हैं। उसके बाद भी ट्रस्ट डेफिसिट पैदा हो रहा है। कारण है कि सरकार में इतने डरपोक लोग बैठे हैं, जिनमें सच सुनने की हिम्मत नहीं है। सच बोलने की हिम्मत क्या ही होगी!

कई एनालिस्ट और एक्सपर्ट हैं, जो शुरू से इस सरकार पर डेटा मैनिपुलेट करने का आरोप लगाते आये हैं। मैं इस बात पर भरोसा नहीं करता था। मुझे लगता था नीच से नीच सरकार भी अपने देश के लोगों के साथ ऐसी गद्दारी नहीं कर सकती है। आज मैं कह सकता हूँ कि मेरा भरोसा गलत था। नीचता इतने पर ही नहीं रुक जाती। गडकरी ने इथेनॉल की मिलावट शुरू करने से पहले लंबे-चौड़े वादे किये थे। इथेनॉल मिलाने से पेट्रोल इतना सस्ता हो जायेगा, किसान इतने अमीर हो जायेंगे। इथेनॉल बढ़ते-बढ़ते 20% हुआ। अब 30% होने जा रहा है। आगे 85-100% की भी तैयारियाँ चल रही हैं। पेट्रोल 1 रुपये भी सस्ता नहीं हुआ। किसान कितने अमीर हुए, भगवान जानें। लेकिन गडकरी पुत्रों की अमीरी पूरा शेयर बाजार जानता है। जनता को झूठे वादे करना और बाद में जनता की बर्बादी पर बेटे को फायदा दिलाने वाले काम करना, इसे मेरे अत्यल्प शब्दज्ञान में गद्दारी छोड़ कुछ और नहीं कहा जा सकता है।

अब चलते-चलते ट्रिविया में कुछ आँकड़े चख लीजिए। जब भारत को सस्ता रूसी तेल मिल रहा था, उसे मुख्य रूप से खरीद अंबानीजी रहे थे। एक समय रोज के 5 लाख बैरल। उस समय रूस से भारत की कुल खरीद थी साढ़े 5 लाख बैरल। बैरल का गणित पिछले पोस्ट में समझाया मैंने। उस सस्ते रूसी तेल को रिफाइन करने के बाद अंबानीजी उसे भारत में नहीं बेच रहे थे। उसका सिर्फ 30% हिस्सा भारतीय बाजार में आ रहा था। बाकी 70% डीजल-पेट्रोल यूरोप जा रहा था। यूरोप की एक इंडीपेंडेंट एजेंसी है CREA. इसने मार्च में एक रिपोर्ट जारी की। उसमें बताया गया अंबानीजी की कंपनी ने बीते एक साल में सस्ता रूसी तेल खरीदकर और उससे निकले डीजल-पेट्रोल को देश से बाहर बेचकर 6,850 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। भारत पर ट्रंप ने टैरिफ डबल किया था रूसी तेल खरीदने के कारण। भारत में 90% से ज्यादा रूसी तेल खरीद रहे थे अंबानीजी। मतलब अंबानीजी को सस्ता रूसी तेल उपलब्ध कराने और हजारों करोड़ का मुनाफा कराने के लिए भारत के पूरे निर्यात पर एक्स्ट्रा 25% टैरिफ लगने दिया गया। और अब सरकारी तेल कंपनियों का बिजनेस बर्बाद कर अंबानीजी के पेट्रोल पंप बिजनेस को चमकाया जा रहा है, उन्हें सैकड़ों करोड़ों का मुनाफा कराया जा रहा है।

(जैसा मैंने कल वादा किया था, यह रही उस पोस्ट की दूसरी कड़ी। पहली कड़ी नीचे पढ़ें)


1 बैरल कच्चा तेल = 159 लीटर कच्चा तेल। 1 बैरल कच्चा तेल से निकलता है 43% पेट्रोल, 23% डीजल, 9% एटीएफ, 5% पेट कोक, बाकी 20% में मरीन फ्यूल, एस्फाल्ट और कई अन्य पेट्रोकेमिकल।

कच्चा तेल का इंडिया बास्केट है 106.26 डॉलर पर। यह भारत सरकार का दिया हुआ भाव है 22 मई का। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल आज 92 डॉलर पर गिरा हुआ है। सरकार ने अभी 22 मई के बाद का भाव अपडेट नहीं किया है। जब करेगी तो इंडिया बास्केट भी 100 डॉलर के नीचे आ जायेगा। पर अभी सुविधा के लिए 100 डॉलर ही मान लेते हैं।

अभी एक डॉलर में आ रहे हैं 95.35 रुपये। यह आज दोपहर डेढ़ बजे का भाव है। इस हिसाब से इंडिया बास्केट का एक बैरल कच्चा तेल हो जाता है 9,535 रुपये का।

लेकिन एक बैरल कच्चे तेल में 43% ही पेट्रोल आ रहा है, तो इसकी लागत निकलती है 4,100.05 रुपये। एक बैरल कच्चे तेल से पेट्रोल निकला 68.37 लीटर। यानी प्रति लीटर पेट्रोल की लागत बैठी 59.97 रुपये।

अब इसमें क्रूड को भारत लाने का खर्च जोड़ते हैं। यह खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि तेल आ कहाँ से रहा है। अमेरिका के आदेश पर हम अब वेनेजुएला वाला तेल खरीदने जा रहे हैं। उसे आने में लगेंगे 56 दिन। लागत बैठेगी करीब 15%। रूस से तेल आने में लगते हैं 36 दिन। लागत बैठती है करीब 10%। पश्चिम एशिया से आने में लगते हैं 8-10 दिन। लागत बैठती है 5% से कम। इसे औसत में 10% मान लेते हैं। यानी अब 1 लीटर पेट्रोल की लागत हुई करीब 66 रुपये। क्रूड को रिफाइन करने की लागत आती है करीब 5%। यानी अब हो गया भाव 69.30 रुपये। पेट्रोल को रिफाइनरी से टंकी तक पहुँचाने की औसत दर है 25 पैसे लीटर। पेट्रोल पंप डीलरों का औसत मार्जिन है 4 रुपये लीटर। यानी एक-एक पाई लागत जोड़ने के बाद पेट्रोल का मूल भाव बैठ रहा है 73.55 रुपये लीटर।

लेकिन अभी गणित पूरा हो नहीं पाया है। पूरे देश में पेट्रोल में अब कम से कम 20% इथेनॉल है। इथेनॉल की भारत सरकार द्वारा तय औसत कीमत है 60 रुपये लीटर। इसे मिलाने के बाद प्रति लीटर गन्ना जूस मिश्रित पेट्रोल की कीमत आ रही है 70.84 रुपये। 26 पैसे का बेनेफिट ऑफ डाउट दे देते हैं। गोल-मटोल 71 रुपये लीटर।

अब अपने-अपने शहर में पेट्रोल की कीमत देख लीजिए। 71 रुपये से ऊपर जो भी आप भर रहे हैं, वो तेल कंपनियों के मुनाफे में और केंद्र-राज्य सरकारों के खजाने में जा रहा है। जैसे हमारे यहाँ अब भाव चल रहा है 113.54 रुपये प्रति लीटर। यानी हर लीटर पेट्रोल पर हम बिहार वासी 42-43 रुपये सरकारों को और तेल कंपनियों को दे रहे हैं।

ये हो गया मोटा-मोटी गणित। अब कुछ महीने पीछे चलते हैं। इस साल जनवरी में कच्चा तेल था 60 डॉलर पर। रुपया था 1 डॉलर के बराबर 92 पर। मतलब उस समय कच्चे तेल की ढुलाई, रिफाइनिंग, टंकी तक पहुँचाने की लागत, डीलर मार्जिन, इथेनॉल 20% सबको मिलाने के बाद लागत बैठ रही थी प्रति लीटर 40-41 रुपये। उस समय हमारे यहाँ पेट्रोल मिल रहा था 105 रुपये का। यानी तब सरकारी तेल कंपनियाँ और सरकारें मिलकर हर लीटर पेट्रोल से लगभग 65 रुपये खा रही थीं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ फरवरी 2022 में। उस समय कच्चा तेल अभी की तरह ही भागा था। फिर 4-6 महीने में नीचे आ गया था। उसके बाद मार्च 2026 से पहले कभी 80 डॉलर के पार नहीं गया था। इस दौरान कई बार तो 40-50 डॉलर तक भी गिरा था। मतलब साढ़े तीन साल सरकार और सरकारी कंपनियों ने आम लोगों की जेब पर डाका डालकर हर लीटर पेट्रोल से 65 रुपये कमाये।

अभी इंडिया बास्केट का क्रूड मार्केट रेट से महँगा है, इसके लिए जिम्मेदार भी हमारी ही सरकार है। ट्रंप के आदेश के चलते रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट चला गया। अब ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला से तेल खरीदेंगे, जिसे लाने में भी खर्च अधिक बैठेगा और उसे रिफाइन करने की लागत भी अधिक बैठेगी। यदि हमने अपनी विदेशी नीति को ट्रंप के हवाले नहीं किया होता, हमारा इंडिया बास्केट अब भी मार्केट रेट से सस्ता होता। लागत बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण है कमजोर रुपया। दिसंबर में 1 डॉलर बराबर 89 रुपये था। इस महीने रुपया 97 तक गिरा। अब रिजर्व बैंक रोज 1-2 बिलियन डॉलर बेच रहा है, तो कुछ राहत मिली है और 95.35 तक आया है। लेकिन यह राहत भी चार दिनों की चाँदनी है। रुपया क्यों कमजोर हो रहा है? एससी गर्ग से पनगढ़िया तक कई ऐसे अर्थशास्त्री रुपये की कमजोरी के लिए कमजोर आर्थिक बुनियाद को कारण बता रहे हैं, जो इसी सरकार के साथ जुड़े रहे हैं। आरबीआई के पूर्व गवर्नर सुब्बाराव भी इसी तरह के कारण बता रहे हैं। कई इंडीपेंडेंट एनालिस्ट भी यही कारण गिना रहे हैं। मतलब रुपये की कमजोरी इस कारण नहीं है कि डॉलर जिम जाने लगा है। कमजोरी का वास्तविक कारण है कि रुपया कुपोषण का शिकार हो गया है। पाकिस्तानी रुपया, चीनी युआन, बांग्लादेशी टका… इन सबके सामने भी पिछले 2-4 महीने में रुपया 10-20% कमजोर हुआ है। कुपोषण क्यों आया? मोदीजी स्वयं बता चुके हैं पहले कि रुपया केंद्र सरकार की मूर्खतापूर्ण नीतियों से गिरता है।

सरल शब्दों में:- अभी भारत के लिए तेल बाकी दुनिया से महँगा होने के 2 कारण हैं। पहला इंडिया बास्केट में महँगा क्रूड, दूसरा कुपोषित रुपया। दोनों के लिए जिम्मेदार कौन? ऑफकोर्स नेहरू या मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि वही, जो 12 साल से सरकार चला रहे हैं।

अभी दाम नहीं भी बढ़ाये जाते तो सरकारी तेल कंपनियाँ और सरकारें मिलकर हर लीटर पेट्रोल से करीब 35 रुपये कमातीं। लेकिन मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने के लिए पैसे चाहिए, अपने नालायक बेटों-रिश्तेदारों को करोड़पति बनाने के लिए पैसे चाहिए, जिन पूँजीपतियों ने चुनावी चंदे दिये, उनका एहसान उतारने के लिए पैसे चाहिए। ये पैसे देगा कौन? निश्चित हमारे और आपके जैसे लोग, जो इन प्रिविलेज्ड हरामखोरों के लिए बस कॉक्रोच बराबर हैसियत रखते हैं।

(डेटा सरकारी पीपीएसी, सीसीआईएल, ओएमसीज से उठाये गये हैं। फोटो एनडीटीवी प्रॉफिट का है। कोई भक्त कुतर्क न करे। डेटारिच पोस्ट है। इसे डेटा से काट सकें तो स्वागत है। सरकारी दुमछल्ले फैक्टचेकर्स से फैक्टचेक करने का विशेष अनुरोध रहेगा। बाकी लोग इस पोस्ट को श्रद्धानुसार कॉपी-पेस्ट-शेयर करें। मुझे क्रेडिट देना-न देना आपकी श्रद्धा। नेट दो घंटे की मेहनत लगी है इसमें। अब कल इसका दूसरा हिस्सा लिखूँगा, उसमें डेटा से ही बताऊँगा किस तरह मोदी सरकार सुनियोजित तरीके से सरकारी तेल कंपनियों को बर्बाद कर एक खास पूँजीपति को बढ़ाने में लगी हुई है।)


पेट्रोल डीजल की मूल्यवृद्धि को ही लें। तेल कंपनियां अपने मुनाफे से केंद्र सरकार को लाभांश भी देती हैं। इसे डिविडेंड कहते हैं। भारत की पांच बड़ी तेल और ऊर्जा कंपनियों ने बीते चार साल, यानी 2021 से 2025 के बीच भारत सरकार को अपने मुनाफे में से 1 लाख 27 हजार करोड़ का लाभांश दिया है।

पेट्रोल डीजल पर सत्ता की बेरहम लूट के कारण तेल कंपनियों का लाभांश 42% बढ़ा है। लेकिन, चैनलों की किसी बहस, किसी यूट्यूबर्स की डिबेट में इस पर सवाल नहीं उठ रहा है कि तेल संकट के बावज़ूद ये चमत्कार कैसे हो रहा है।

अगर किसी सच्चे पत्रकार ने रविवार को मुंबई में वित्त मंत्री के एक लाख करोड़ के झटके की रुदाली के जवाब में इस डिविडेंड का सवाल पूछा होता तो क्या हेडलाइन बनती?

दरअसल, 10 रुपए का एक्साइज घटाकर मोदी सत्ता उंगली कटवाकर शहीद बनना चाहती है, जबकि 1.27 लाख करोड़ वह पहले ही तेल कंपनियों से कमा चुकी है।

दरअसल, समूचे भारत का मीडिया, जिसमें गोदी चैनल और सोशल मीडिया भी शामिल है, लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।

गोदी चैनल, जहां आम लोगों के फर्जी बजट और यूपीए बनाम एनडीए की महंगाई को नापकर बरगला रहा है, वहीं सोशल मीडिया भी गलत सवाल पूछकर या सवाल न पूछकर आम जनता तक सही जानकारियां छिपा रही है। जानकारियां छिपाना जुर्म है। सही जानकार लोगों से जुड़ें। अन्यथा केंद्र की मदारी सत्ता के इशारों पर नाचते रहेंगे।

-सौमित्र रॉय

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