
जयपुर। इस समय पूरे विश्व में टेलीविजन ने अपना चमकता हुआ वैभव दिया है तथा दुनिया में ओटीटी प्लेटफॉर्म एवं सोशल मीडिया के कारण आज टेलीविजन के 70% दर्शक कम हो गए हैं और सोशल मीडिया के प्रति मिनट 24 दर्शकों की बढ़ोतरी के साथ एक नया स्क्रीन युग शुरू हो रहा है।
विश्व टेलीविजन दिवस पर आज टेलीविजन के वैभव को तथा स्वर्णिम अतीत को याद करते हुए मीडिया विशेषज्ञ एवं दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ लेखक प्रो. डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू ने आज टेलीविजन विश्व पर मीडिया विशेषज्ञों के साथ बात करते हुए टेलीविजन के विश्व भविष्य को रेखांकित करते हुए विश्व टेलीविजन दिवस पर यह विचार प्रकट किए।
पिछले 45 वर्षों से टेलीविजन की दुनिया से जुड़े हुए तथा भारतीय प्रसारण सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे प्रोफेसर डा. कृष्ण कुमार रत्तू का यह भी मानना है कि आज पूरी दुनिया में जिस तरह से पिछले एक दशक में बढ़ते हुए सोशल मीडिया तथा डिजिटल क्रांति की त्वरित सूचना संप्रेषण की जबरदस्त लोकप्रियता ने पिछले 50 सालों का टेलीविजन का इतिहास ही बदल दिया है।
अब विश्व में टेलीविजन का चेहरा कैसा होगा, इसका उत्तर देते हुए प्रो रत्तू ने कहा कि टेलीविजन दुनिया का सबसे सशक्त और लोकप्रिय सूचना प्रसारण मध्य रहा है जिसको समय की सरकारों ने पूरी दुनिया में अपने-अपने सरकारी तंत्र के लिए सूचना संचार का साधन के तौर पर अपनाया।
भारत में प्रसार भारती के पहले तथा बाद में भी टेलीविजन अर्थात दूरदर्शन की दुनिया में उस तरह की स्वायत्तता नहीं देखी गई जिस तरह की स्वायत्तता के लिए टेलीविजन की भूमिका को देखा जा सकता था।
उनके अनुसार फिर भी भारत की 140 करोड़ आबादी की 96.82 प्रतिशत पॉइंट तक अभी भी टेलीविजन की सर्वाधिक पहुंच है तथा दुनिया में एक भारत ही एक अकेला देश है जहां पर सबसे सस्ता तथा त्वरित गति से फैला हुआ विश्व का सबसे बड़ा सूचना माध्यम था हालांकि इस देश में अभी भी 1100 से ज्यादा चैनल अलग-अलग भाषाओं में विभिन्न विविध विषयों पर प्रोग्राम प्रसारित करते हैं परंतु जिस तरह से पिछले 5 वर्षों में ओटीटी तथा ऑनलाइन विशेषकर कोविड के बाद सूचनाओं का आदान-प्रदान ओटीटी प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हुआ है उसने दूरदर्शन को हिला कर रख दिया है तथा इन दिनों लगता है कि दूरदर्शन ने अपना स्वर्णिम युग का वैभव कहीं खो दिया है जिसकी आगे अब कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि दुनिया भर में सूचना के माध्यमों को टेलीविजन की बजाय अब तो मोबाइल की स्क्रीन पर तथा कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखा जा सकता है।
डॉ. रत्तू ने यह भी कहा कि अब दुनिया में यह बेहद आसान संप्रेषण माध्यम भी है। पश्चिमी देशों तथा लातिनी अमेरिकी तथा अफ्रीकी देशों का तुलनात्मक रेखांकन करते हुए डॉ के के रत्तू का यह भी मानना था कि वहां पर सूचना की जिज्ञासा तथा पश्चिमी दबाव के कारण वहां की सरकारी अब सीधे ही ओटीटी एप तथा अन्य अपने सूचना माध्यमों से ऊपर जा रही है जिसका ताज़ा उदाहरण रुस एवं चीन जैसे वह देश है जहां पर वह अपने ऐप से अपने प्लेटफार्म पर वेब सीरीज तथा अपनी भाषा में अपनी संस्कृति भाषा तथा दूसरे कार्यक्रम चल रहे हैं।
टेलीविजन में रोजगार सृजन की स्थिति पर बोलते हुए डॉक्टर रत्तू ने यह भी कहा कि आज सबसे बड़ी बात यह है कि टेलीविजन के इस बदले हुए रूप में हजारों रोज़गारों का सृजन हुआ है तथा युवा पीढ़ी संपूर्ण रूप से टेलीविजन से शिफ्ट होकर ओटीटी प्लेटफॉर्म तथा वेब सीरीज एप पर चली गई है।
उन्होंने दिलचस्पी से कहा कि आने वाले दिनों में भारत में जिस तरह से सबसे सस्ते सूचना संसार का उदय हो रहा है तथा नवसृजित रोजगार के पलों में मीडिया में नौकरियों की बहार आई हुई है उससे टेलीविजन की हालत बेहद खराब हो गई है उन्होंने आशा जताई कि अभी भी समय है कि दुनिया में बंद हो रहे टेलीविजन चैनलों की गुणवत्ता को तथा विशिष्ट स्थिति को बरकरार रखा जाए ताकि सूचना का यह शक्तिशाली माध्यम शायद फिर से अपनी लोकप्रियता हासिल कर सके परंतु उन्होंने ने कहा कि इसकी संभावना कम है क्योंकि नई पीढ़ी का मिज़ाज और आज सूचना की पसंद बदल चुकी है और यह टेलीविजन के लिए कोई अच्छा समय नहीं है।
भारत में टेलीविजन का एक सुनहरा इतिहास रहा है परंतु वह अब धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। भारतीय राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन भी इसी का शिकार होकर रह गया है।



